तेजस के ‘दिमाग’ की कहानी; जब भारत ने खुद बनाया फाइटर जेट का कंट्रोल सिस्टम, CAIR के पूर्व डायरेक्टर ने खोला राज

Tejas Control Law (CLAW): भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमान तेजस के कंट्रोल सिस्टम की कहानी बहुत खास है. इसे Control Law (CLAW) कहा जाता है. दरअसल तेजस का दिमाग है. यह तय करता है कि विमान आसमान में कैसे संतुलन बनाए रखना है. कब दुश्मन पर वार करना है.

Written by - Sachendra Singh | Last Updated : Nov 8, 2025, 06:34 AM IST
  • तेजस का कंट्रोल सिस्टम भारत ने खुद बनाया
  • डॉ. कलाम ने आत्मनिर्भर मिशन की नींव रखी
तेजस के ‘दिमाग’ की कहानी; जब भारत ने खुद बनाया फाइटर जेट का कंट्रोल सिस्टम, CAIR के पूर्व डायरेक्टर ने खोला राज

Tejas Control Law (CLAW): भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमान तेजस के कंट्रोल सिस्टम की कहानी बहुत खास है. इसे Control Law (CLAW) कहा जाता है. दरअसल तेजस का दिमाग है. यह तय करता है कि विमान आसमान में कैसे संतुलन बनाए रखना है. कब दुश्मन पर वार करना है.

इसी सिस्टम पर कई सवाल भी उठे. DRDO की लैब Centre for Artificial Intelligence and Robotics (CAIR) के पूर्व डायरेक्टर एम. विद्यसागर ने तेजस से जुड़ी कुछ बातें शेयर की हैं. उन्होंने सोशल मीडिया पर इस सिस्टम के बनने की असली कहानी बताई है. कैसे भारत ने विदेशी कंपनी पर निर्भरता छोड़कर खुद यह तकनीक बनाई थी. अब वही आत्मनिर्भर सोच कमजोर पड़ती दिख रही है.

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कहानी शुरू हुई साल 1989 में
साल 1989 में जब एम विद्यसागर CAIR के डायरेक्टर बने. तब भारत तेजस प्रोजेक्ट पर शुरुआती काम कर रहा था. उस वक्त भारत ने विमान का कंट्रोल सिस्टम अमेरिकी कंपनी Martin Marietta को दिया था. जल्द ही भारतीय वैज्ञानिकों को समझ आ गया कि कंपनी सिर्फ रिपोर्ट दिखा रही है. असली डिजाइन नहीं दे रही. इससे भारत पूरी तरह अमेरिका पर निर्भर हो गया था.

फिर आए डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम
साल 1992 में जब डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम DRDO के प्रमुख बने. उन्होंने बड़ा फैसला किया कि कंट्रोल सिस्टम भारत खुद बनाएगा. उन्होंने इसके लिए प्रो. रॉडम नरसिंहा से एक रिपोर्ट मांगी. इसमें पूछा गया कि क्या भारतीय वैज्ञानिक यह कर सकते हैं? एक महीने में जवाब आया कि हां, कर सकते हैं. इसके बाद कलाम ने CLAW को पूरी तरह भारत में विकसित करने की मंजूरी दे दी.

तकनीकी मुश्किलें और बड़ी जीत
अमेरिका ने भारत को टेस्टिंग के लिए जरूरी हाई-टेक कंप्यूटर देने से मना कर दिया. इसके बाद भारत ने ब्रिटेन की BAE Systems की मदद से टेस्टिंग की. वहां भारतीय टेस्ट पायलटों ने पाया कि तेजस का कंट्रोल सिस्टम Eurofighter Typhoon से भी ज्यादा तेज और एडवांस्ड है. अमेरिका की CALSPAN लैब में हुए टेस्ट में भी यह सिस्टम पूरी तरह सफल रहा. यह दुनिया का पहला डिजिटल फ्लाई-बाय-वायर सिस्टम था. जिसमें quadruplex redundancy यानी चार-गुना सुरक्षा और 32-बिट प्रोसेसर था. यह उस समय के अमेरिकी F-16 से भी आगे की तकनीक थी.

जब देश ने खुद पर भरोसा किया
प्रो. विद्यसागर ने बताया कि यह कामयाबी तभी मिली. जब सरकार, वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने खुद पर भरोसा किया. उनके मुताबिक आज वही आत्मनिर्भर सोच कमजोर पड़ रही है.उन्होंने लिखा कि अगर हम रिसर्च में निवेश नहीं करेंगे. सारा पैसा दूसरी जगहों पर खर्च करेंगे. तब हम कभी वर्ल्ड-क्लास तकनीक नहीं बना पाएंगे.

एम विद्यसागर ने कहा कि भारत को अपने वैज्ञानिकों पर भरोसा करना होगा. उन्हें सम्मान और संसाधन देने होंगे. यही वो रास्ता है जिससे भारत फिर से रक्षा तकनीक में आत्मनिर्भर बन सकेगा. जैसे तेजस ने दो दशक पहले उड़ान भरकर दिखाया था.

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About the Author

Sachendra Singh

सचेंद्र सिंह का ताल्लुक उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ से है. इन्होंने अपनी पढ़ाई-लिखाई 'संगम नगरी' प्रयागराज में स्थित इलाहाबाद विश्वविद्यालय से की है. पढ़ने और लिखने में इनकी ऐसी रूचि रही कि इन्होंने पत्रकारिता जगत से जुड़कर अपना करियर बनाने की ठान ली. फिलहाल सचेंद्र ज़ी मीडिया समूह से जुड़कर 'ज़ी भारत : ZEE Bharat' के डिजिटल प्लेटफॉर्म में अपना योगदान दे रहे हैं. ...और पढ़ें

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