German Aip Submarines: भारतीय नौसेना की पनडुब्बी ताकत में बड़ा फेरबदल तय हो गया है. रक्षा मंत्रालय (MoD) ने फ्रांसीसी मूल की तीन नई स्कॉर्पीन सबमरीनों की खरीद को रद्द कर दिया है. वजह इनकी कीमत बहुत अधिक थी. मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) ने हर नई स्कॉर्पीन पनडुब्बी की कीमत करीब 12000 करोड़ रुपये बताई थी. ये लागत जर्मन कंपनियों के ऑफर जितनी ही थी. लेकिन जर्मन डिजाइन अधित मॉडर्न और एडवांस्ड टेक्नोलॉजी से लैस हैं.
अब सरकार का फोकस प्रोजेक्ट-75I पर है. इसके तहत करीब 70000 करोड़ रुपये खर्च की जाएगी. और छह नई जर्मन डीजल-इलेक्ट्रिक स्टेल्थ सबमरीन्स बनाई जाएंगी. इनमें एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) सिस्टम होगा. इससे पनडुब्बियां 21 दिन तक पानी के अंदर रह सकती हैं.
क्यों रद्द हुआ स्कॉर्पीन प्रोजेक्ट?
MDL ने कोशिश की थी कि मौजूदा स्कॉर्पीन डिजाइन को बढ़ाकर उसमें AIP सिस्टम लगाया जाए. पुरानी कक्षा की सबमरीनों को नई तकनीक के बराबर लाया जा सके. इसके लिए 5-6 मीटर लंबा हुल (hull) बढ़ाने का प्लान था. लेकिन ऐसा करने में लागत बहुत बढ़ गई. इस प्लान के तहत तीन नई स्कॉर्पीन बननी थीं. इसकी कुल कीमत 36000 करोड़ रुपये तक पहुंच गई थी. जबकि शुरुआती कलवरी क्लास सबमरीन्स की लागत इससे तीन गुना कम थी.
MDL की AIP लगाने की योजना टेक्निकली तो ठीक थी. इसमें जोखिम और खर्च दोनों ज्यादा थे. वहीं, जर्मन कंपनी ThyssenKrupp Marine Systems (TKMS) की पेशकश में AIP पहले से इनबिल्ट है. ये सिस्टम पहले से कई देशों की नौसेनाओं में सफल साबित हो चुका है.
जर्मन सबमरीन्स बेहतर क्यों?
TKMS की Type-212/214 सबमरीन्स में ईंधन सेल आधारित AIP सिस्टम है. जो पानी के नीचे 21 दिन तक ऑपरेशन करने में सक्षम बनाता है. इसके साथ बेहतर सेंसर, स्टेल्थ डिजाइन और हाई-एंड मिसाइल सिस्टम भी हैं. भारत में इन जर्मन सबमरीन्स को मझगांव डॉक में ही बनाया जाएगा. इसमें Larsen & Toubro (L&T) भी पार्टनर होगी. इस प्रोजेक्ट में 60% से ज्यादा देसी कंपोनेंट्स और तकनीक का इस्तेमाल होगा. स्टील SAIL से लिया जाएगा. इस पनबुड्डियों का बनाने का काम 2026-27 में शुरू होगा. पहली पनडुब्बी 2032-33 तक नौसेना को मिलने की उम्मीद है.
दोनों पनडुब्बियों में फर्क
प्रति यूनिट लागत: स्कॉर्पीन की एक पनडुब्बी की कीमत करीब 12,000 करोड़ रुपये थी. जबकि जर्मन P-75I सबमरीन की कीमत ₹1,000 से 12,000 करोड़ रुपये के बीच है.
AIP सिस्टम: स्कॉर्पीन में AIP सिस्टम बाद में जोड़ा जाना था.जबकि जर्मन सबमरीन में यह फ्यूल-सेल AIP पहले से इनबिल्ट है. पनडुब्बी को 21 दिन तक पानी के अंदर रहने की क्षमता देता है.
वजन: स्कॉर्पीन का वजन 1600 से 1800 टन के बीच है. जबकि जर्मन P-75I सबमरीन 1800 से 2000 टन की होगी.
हथियार प्रणाली: स्कॉर्पीन में टॉरपीडो और SM-39 मिसाइलें थीं. वहीं जर्मन सबमरीन टॉरपीडो, क्रूज और एंटी-शिप मिसाइलों से लैस होगी.
इंडिजिनाइजेशन: स्कॉर्पीन में देसी सामग्री का हिस्सा 60-70% तक था. जबकि जर्मन प्रोजेक्ट में 60% से अधिक लोकल कंटेंट होगा. 15 साल में इसे पूरी तरह देसी बनाने का लक्ष्य है.
डिलीवरी टाइमलाइन: स्कॉर्पीन की डिलीवरी 2030 के बाद मुमकिन थी. नई जर्मन सबमरीन्स का निर्माण 2026-27 में शुरू होगा. पहली डिलीवरी 2032–33 तक होने की उम्मीद है.
वर्तमान में भारतीय नौसेना के पास 16 ऑपरेशनल सबमरीन्स हैं. जबकि जरूरत 24 की है. नई जर्मन पनडुब्बियां इस कमी को पूरा करेंगी. इसके साथ भारत हिंद महासागर में अपनी ब्लू वॉटर यानी गहरे समुद्री ऑपरेशन क्षमता को और मजबूत करेगा.
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