JNU को 'सियासी अड्डा' बनाने पर क्यों उतारू है 'टुकड़े-टुकड़े गैंग', नहीं आती है शर्म?

अपनी मागों के नाम पर गुंडागर्दी करने वाले उग्र छात्रों ने देश के सबसे नामचीन विश्वविद्यालय को कलंकित कर दिया है. जेएनयू में में पढ़ रहे कुछ छात्रों के चलते पूरा विश्वविद्यालय और उसमें पढ़ रहे छात्रों की बदनामी होती है. लेकिन सवाल ये है कि इसके पीछे कौन जालसाज या साजिशकर्ता है?

JNU को 'सियासी अड्डा' बनाने पर क्यों उतारू है 'टुकड़े-टुकड़े गैंग', नहीं आती है शर्म?

नई दिल्ली: पूरा देश जिस संस्थान में पढ़ने के लिए तरसता है, हर किसी का सपना होता है कि काश इस विश्वविद्यालय में दाखिला मिल जाता, तो जीवन में कामयाबी के शिखर तक पहुंचने से कोई नहीं रोक पाता. वो जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) राजनीति के अड्डे में तब्दील हो चुका है. अपने हुडदंग से कुछ तबका सुर्खियां बंटोर ही लेता है. हॉस्टल फीस में बढ़ोतरी को लेकर तथाकथित छात्रगणों ने मोर्चा खोल दिया.

मांग या छिनैती के लिए प्रदर्शन?

जेएनयू के छात्र बंधु जब अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरते हैं, तो ये समझना मुश्किल हो जाता है कि वो अपने हक की लड़ाई लड़ने के लिए मैदान में आए हैं या फिर अपने सियासत की दुकान चमकाने के लिए माथापच्ची करने को निकले हैं. कभी किसी से भिड़ जाते हैं तो कभी किसी जगह तोड़फोड़ शुरू हो जाती है. अब ये समझ नहीं आता कि छात्र यहां पढ़ने के लिए सस्ती ये कह लें कि लगभग मुफ्त की पढ़ाई करने आते हैं, या फिर अपने दंगाई प्रवृत्ति को निखारने और संवारने का लक्ष्य लेकर इस संस्थान में दाखिला लेते है.

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दरअसल, हॉस्टल की शुल्क वृद्धि को पूरी तरह से वापस लेने की मांग करते हुए कुछ छात्रों ने पहले तो उस वक्त जुलूस निकाला जब कैंपस में धारा 144 लगा था. इतने से मन नहीं भरा तो उन्होंने जुलूस निकालकर पुलिसवालों के बैरिकेड्स से रोके जाने पर बखेड़ा खड़ा कर दिया. इतना तक भी ठीक था, उपद्रवियों छात्र इस बीच पुलिस से भिड़ भी गए. सोमवार को छात्र संसद भवन तक जाने की कोशिश किए. कैंपस के अंदर तो अंदर अब जेएनयू के छात्रों का बवाल और उनका हुड़दंग दिल्ली के सड़कों पर भी आ चुका है. जानकारी के अनुसार संसद भवन तक जाने की कोशिश वो वो सभी छात्र अन्य रास्तों के इस्तेमाल की भी रणनीति बना रहे हैं. इसके लिए उस वक्त तुरंत तीन मेट्रो स्टेशन को बंद कराना पड़ा. ट्रेनें नहीं रुकी, लेकिन एंट्री और एग्जिट गेट बंद कर दिया गया था.

 

ऐसा पहली बार नहीं है, बार-बार दिखता है नजारा

सबसे बड़ा सवाल ये है कि जेएनयू में पढ़ाई राष्ट्र के निर्माण के लिए की जाती है या फिर देश को बदनाम करने के लिए की जाती है. आखिर बार-बार मामला इतना तूल क्यों पकड़ लेता है, कि जिससे पूरे देश की व्यवस्था सवालों के घेरे में खड़ी हो जाती है.

ये कोई पहली बार नहीं लेकिन पिछले 10 सालों में कई बार एसे नजारे देखने को मिले जिसके बाद हर कोई अपनी नाराजगी जाहिर करता है.

  1. साल 2010 की बात है जब राजस्थान के दंतेवाड़ा में जवानों की शहादत पर यहां उत्सव मनाया गया था.
  2. इसके बाद अक्टूबर के महीने में साल 2011 में यहां महिषासुर दिवस मनाकर मां दुर्गा के खिलाफ अपशब्द कहे गए थे.
  3. गणतंत्र दिवस के मौके पर 26 जनवरी, 2015 को नक्शे में कश्मीर को भारत से अलग देश दिखाया गया था.
  4. फरवरी, 2016 की घटना किसी से छिपी नहीं है जब टुकड़े-टुकड़े गैंग ने ये नारा दिया था कि 'अफजल हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल जिंदा हैं'
  5. 11 नवंबर 2019 को छात्रों ने सारी सीमाएं लांघते हुए महिला प्रोफेसर के साथ बदसलूकी की और बंधक बनाने की कोशिश की.
  6. बाल दिवस और नेहरू जयंती 14 नवंबर, 2019 के मौके पर संस्कृति के महानायक स्वामी विवेकानंद का अपमान किया गया था.

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अब ऐसे में एक और बड़ा सवाल ये भी है कि इस शिक्षा के मंदिर में कौन अपनी गंदगी फैला रहा है. यानी JNU को 'हाईजैक' कौन कर रहा है? दरअसल, जेएनयू में बार-बार उग्र आंदोलन होते रहते हैं, इसे आखिरकार कौन करवाता है?

  • टुकड़े-टुकड़े गैंग
  • तथाकथित वामपंथी
  • कांग्रेस और वामपंथी दल
  • छात्रों का वामपंथी संगठन
  • विदेशी फंडिंग से चलने वाले NGO

जिस शिक्षा के मंदिर में हर कोई अपने जिंदगी के सबसे स्वर्णिम पल को बिताकर भविष्य संवारना चाहता है, उसे आजकल ऐसे उग्र छात्र खोखला करने पर उतारू हो गए हैं. अब ऐसे में हर कोई ये जानना चाहता है, कि जेएनयू को राजनीति का अड्डा बनाने वालों से कब छुटकारा मिलेगा?