Jyotiba Phule Jayanti: जब प्रेस की आजादी के लिए वायसराय से भिड़ गए ज्योतिबा

ज्योतिबा ने ब्राह्मण-पुरोहित के बिना ही विवाह-संस्कार आरंभ कराया और इसे मुंबई हाईकोर्ट से भी मान्यता मिली.

Written by - Zee Hindustan Web Team | Last Updated : Apr 11, 2021, 09:13 AM IST
  • आज भी प्रासंगिक हैं ज्योतिबा फुले
  • विधवा विवाह के समर्थक थे ज्योतिबा फुले
Jyotiba Phule Jayanti: जब प्रेस की आजादी के लिए वायसराय से भिड़ गए ज्योतिबा

नई दिल्लीः भारत की महान व्यक्तित्वों की परंपरा में ऐसे कई नाम हैं, जिन्होंने इसकी मिट्टी को अपने अथक प्रयासों से सींचा और इसे विश्वभर में महान बनाया. इन्हीं कड़ियों में एक नाम है महात्मा ज्योतिबा फुले.

आने वाले 14 अप्रैल को संविधान निर्माता डॉ. आंबेडकर की जयंती है. अपनी पुस्तक शूद्र कौन हैं? की प्रस्तावना में वह लिखते हैं, जिन्होंने हिन्दू समाज की छोटी जातियों को उच्च वर्णों के प्रति उनकी गुलामी के सम्बन्ध में जागृत किया और जिन्होंने विदेशी शासन से मुक्ति पाने से भी सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना को अधिक महत्वपूर्ण माना, उस आधुनिक भारत के महानतम शूद्र महात्मा फुले को सादर समर्पित.

ज्योतिबा आज भी प्रासंगिक
आज वर्तमान पर नजर डालें तो राजनीतिक पार्टियों में फुले को अपना बताने की होड़ लगी रहती है. उधर, भाजपा ने महात्मा ज्योतिबा फुले की जयंती से बाबा साहब की जयंती तक टीका उत्सव मनाने का ऐलान किया है. आखिर , आजादी के इतने सालों बाद भी ज्योतिबा क्यों इतने प्रासंगिक हैं.

इतिहास के पन्ने पलटें तो भारत की आजादी की लड़ाई के बीच कई पन्ने ऐसे मिलते हैं, जहां देश अपने ही लोगों के बीच संस्कृति और सामाजिकता के ज्वार-भाटों के बीच उथल-पुथल की स्थिति में डोलता दिखता है.

इस स्थिति में जो चेहरे नजर आते हैं वह हैं पंडिता रमाबाई सरस्वती, सावित्रिबाई फुले, राजा राम मोहन राय और इनके ही साथ बाबा ज्योतिबा फुले.


महात्मा ज्योतिबा फुले का जन्म 11 अप्रैल,1827 को पुणे में हुआ था. उनका परिवार कई पीढ़ी पहले सतारा से पुणे आकर फूलों के गजरे आदि बनाने का काम करने लगा था. इसलिए माली के काम में लगे ये लोग 'फुले' के नाम से जाने जाते थे. ज्योतिबा को समझने के लिए उनका एक किस्सा बेहद खास है.

1876 से 1880 तक भारत का वायसराय था लॉर्ड लिटन. 1878 में ब्रिटिश शासन ने वर्नाक्युलर ऐक्ट पास करके प्रेस का गला घोंटने की कोशिश की.

इस कानून के तहत देसी भाषा में छपने वाले समाचारपत्रों पर कुछ रोक लगा दी गई और उनकी आजादी छीन ली गई. सत्यशोधक समाज का हिस्सा रहे दीनबंधु समाचार पत्र की ओर से प्रेस की आजादी छीनने के प्रतिबंध का काफी विरोध हुआ था.

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इस प्रतिबंध के 2 साल बाद 1880 में लिटन पूना (अब पुणे) का भ्रमण करने वाला था. पूना नगरपालिका का तत्कालीन अध्यक्ष लॉर्ड लिटन का भव्य स्वागत करना चाहता था.

इसके लिए वह एक हजार रुपये खर्च करना चाहता था और पूना नगरपालिका के सदस्यों से खर्च के अपने प्रस्ताव को पारित करने में मदद करने का आग्रह किया था.

ज्योतिबा फुले को यह बात काफी नागवार गुजरी कि कर दाताओं का पैसा लिटन जैसे क्रूर आदमी पर खर्च किया जाए. वह बिल्कुल डरे नहीं और पूरे साहस के साथ प्रस्ताव रखा कि लिटन की बजाय उस पैसे को पूना के गरीब लोगों की शिक्षा पर खर्च किया जाए.

वह अपने रुख पर अडिग रहे और जब खर्च वाला प्रस्ताव वोटिंग के लिए आया तो उन्होंने प्रस्ताव के विरोध में वोट किया. पूना नगरपालिका में उस समय 32 नामित सदस्य थे जिनमें से अकेले ज्योतिबा फुले थे जिन्होंने प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया.

लड़कियों को पढ़ाने के लिए जब कोई योग्य अध्यापिका नहीं मिलीं तो इस काम के लिए उन्होंने अपनी सावित्री फुले को इस योग्य बनाया.

उच्च वर्ग के लोगों ने आरंभ से ही उनके काम में बाधा डालने की कोशिख की लेकिन जब फुले आगे बढ़ते ही गए तो उनके पिता पर दबाब डालकर पति-पत्नी को घर से निकालवा दिया.

इससे कुछ समय के लिए उनका काम रुका जरूर लेकिन शीघ्र ही उन्होंने एक के बाद एक बालिकाओं के तीन स्कूल खोल दिए.

दलितों और निर्बल वर्ग को न्याय दिलाने के लिए ज्योतिबा ने 1873 में 'सत्यशोधक समाज' की स्थापना की.

उनकी समाजसेवा देखकर 1888 ई. में मुंबई की एक विशाल सभा में उन्हें 'महात्मा' की उपाधि दी गई.

ज्योतिबा ने ब्राह्मण-पुरोहित के बिना ही विवाह-संस्कार आरंभ कराया और इसे मुंबई हाईकोर्ट से भी मान्यता मिली. वे बाल-विवाह विरोधी और विधवा-विवाह के समर्थक थे.

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