पार्टी ने की दगाबाजी तो पदों से मोह त्याग गए सिंधिया

कांग्रेस आलाकमान से नाराज चल रहे नेताओं की फेहरिस्त में एक नाम ज्योतिरादित्य सिंधिया का भी है. जो हिन्दी पट्टी के प्रदेशों में पार्टी के बड़े नेताओं में से एक हैं. सिंधिया मध्यप्रदेश में सीएम की दौड़ में पिछड़ जाने के बाद से ही मुख्यमंत्री कमलनाथ से या यूं कहें कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से नाराज चल रहे हैं. पहले पत्र-प्रसंग के जरिए कमलनाथ सरकार की खूब आलोचना करने की वजह से सुर्खियों में छाए हुए थे अब एक और का

पार्टी ने की दगाबाजी तो पदों से मोह त्याग गए सिंधिया

भोपाल: सिंधिया ने अपने ट्विटर अकाउंट से पार्टी की सभी पदों को हटा दिया है. ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अब अपना ट्विटर प्रोफाइल बदला और नया अपडेट किया. खुद को जनता का समाज सेवक और क्रिकेट प्रेमी बताया. इससे पहले पार्टी के तमाम युवा प्रकोष्ठ से लेकर तमाम पदों से सजे हुए ट्विटर प्रोफाइल पर अब सिर्फ चार शब्दों में दो गैर-राजनीतिक पदों का ही जिक्र किया है. ऐसे में यह संदेह जाता है कि क्या सिंधिया को अंदरूनी तौर पर यह सारे पद दबाव बना रहे थे या वे पार्टी को इस तरह से कुछ संदेश देना चाहते हैं. 

सिंधिया ने दी सफाई

हालांकि, सिंधिया  ने ट्विटर पर लिखा कि उन्होंने यह प्रोफाइल तकरीबन 1 महीने पहले ही बदली है. लोगों ने कहा  कि आपकी प्रोफाइल बहुत लंबी है. इस वजह से उसे छोटा कर दिया था. इस संबंध में जो कुछ भी अटकलें लगाई जा रही हैं, उनका कोई आधार नहीं है. सब निराधार है. हालांकि, फिर भी उन्होंने पार्टी के पदों को क्यों हटाया, इसका कोई जवाब नहीं दिया. 

मध्यप्रदेश में सिंधिया के सपनों पर फिरा पानी

दरअसल, सिंधिया का कांग्रेस से मोहभंग मध्यप्रदेश चुनाव के बाद मुख्यमंत्री चुने जाने की खींचतान से शुरू हुआ. सिंधिया और उनके समर्थकों को भरोसा था कि पार्टी किसी भी शर्त पर युवा नेतृत्व को अहमियत देगी और ज्योतिरादित्य सिंधिया को मुख्यमंत्री चुना जाएगा. लेकिन मुख्यमंत्री तो दूर की बात है सिंधिया को उपमुख्यमंत्री भी नहीं बनाया गया. इससे पहले राजनीतिक हलकों में यह खबर थी कि ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस युवराज राहुल गांधी के करीबी हैं लेकिन युवा नेता होने के नाते प्रतिद्वंदी भी. पार्टी कतई नहीं चाहेगी कि कांग्रेस में राहुल गांधी के अलावा कोई और नया विकल्प उभरे. इसलिए उन्हें मध्यप्रदेश में कोई भी पद नहीं सौंपा गया और ना ही सरकार में ही कोई हिस्सेदारी या मंत्रालय ही मिली.

कमलनाथ सरकार से छत्तीस का आंकड़ा

इसके अलावा मुख्यमंत्री कमलनाथ के सामने ज्योतिरादित्य सिंधिया की एक न चल सकी. वे दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के समय के नेता हैं और कांग्रेस के पुराने वफादारों में से एक हैं. ऐसे में सिंधिया पर भरोसा जताने के विषय में पार्टी ने सोचा भी नहीं. यहीं कारण है कि पिछले कुछ दिनों से सिंधिया प्रदेश में घूम-घूम कर अपनी ही सरकार की आलोचना करते रहे और कभी किसानों को तो कभी पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए कमलनाथ सरकार को पत्र पर पत्र लिखते रहे. यह अलग बात है कि मुख्यमंत्री कमलनाथ ने उनके किसी भी पत्र का जवाब देना उचित न समझा और सिंधिया को नजरअंदज करते रहे.

झारखंड चुनाव में स्टार प्रचारक के तौर पर होने वाली थी वापसी

हालांकि, इतने समय बाद सिंधिया के लिए एक राहत वाली बात यह थी कि पार्टी ने झारखंड में चल रहे विधानसभा चुनाव के लिए बतौर स्टार प्रचारक उनका नाम भी शामिल किया था. ज्योतिरादित्य सिंधिया हरियाणा और महाराष्ट्र में कांग्रेस की ओर से कुछ खास प्रचार-प्रसार नहीं कर सके थे. इसके पीछे की वजह तो उन्होंने नहीं बताई थी लेकिन उस दौरान वे अपनी ही सरकार की आलोचना में लगे हुए थे. अब जबकि पार्टी ने उन्हें प्रचार के लिए बुलाया तो सिंधिया ने कांग्रेस के तमाम दिए हुए पदों को मिट्टी के भाव समझकर उससे किनारा करना शुरू कर दिया, इसके क्या मायने हो सकते हैं, यह तो सिंधिया ही जानें.

बुआ से नजदीकी के बाद क्या बदल गए तेवर ?

पिछले दिनों सिंधिया ने अपनी बुआ और राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से सालों बाद मुलाकात की. इस दौरान वे काफी नजदीकी दिखे. यह इस बात की ओर संकेत करता है कि कहीं सिंधिया के दिमाग में कांग्रेस के अलावा कोई और विकल्प तो नहीं सूझ रहा. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में भी सिंधिया को लेकर अच्छी राय है, बावजूद इसके कांग्रेस आलाकमान की रवैये से त्रस्त हो चुके ज्योतिरादित्य सिंधिया अब क्या गुल खिलाने के मूड में हैं, कोई नहीं जानता.