क्या आर्थिक फायदे के लिए सबरीमाला विवाद को बढ़ावा दिया गया ?

सबरीमाला विवाद देशव्यापी स्तर पर उछला, जो लोग इस मंदिर या वहां स्थापित अयप्पा स्वामी के बारे में नहीं भी जानते थे, वह उनसे अच्छी तरह वाकिफ हो गए. जिसका नतीजा ये रहा कि मंदिर से होने वाली कमाई लगभग दोगुनी हो गई. ऐसे में लगता है कि कहीं केरल सरकार ने राजस्व के चक्कर में तो नहीं इस विवाद को बढ़ने दिया ?   

क्या आर्थिक फायदे के लिए सबरीमाला विवाद को बढ़ावा दिया गया ?

नई दिल्ली: सबरीमाला के पट दो महीने के लिए सोमवार को खुले. पहले ही दिन भारी मात्रा में श्रद्धालु भगवान अय्यप्पा के दर पर पहुंचे. लेकिन सवाल यह उठता है कि पिछले कुछ दिनों से जो मामला गले की हड्डी बन गया था, वह अचानक थम सा क्यों गया ? ना ही कोई विवाद की खबरें आईं और ना ही राज्य सरकार या किसी भी पक्ष की ओर से मंदिर में महिलाओं की एंट्री को लेकर ही कुछ विरोध प्रदर्शन देखने को मिला. इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट के पुरान फैसले के बाद स्टे लगा दिया था. फिर सवाल यह उठता है कि सबरीमाला मंदिर विवाद के मामले को केरल सरकार तूल पकड़ने देने के लिए क्यों छोड़ती गई ? क्या कारण रहा ? 

तो इसलिए खुश है राज्य सरकार

दरअसल, सबरीमाला मंदिर को विवादों में आने से पहले बहुत ज्यादा लोग नहीं जानते थे. लेकिन जब से इसे राजनीतिक पार्टियों, एनजीओ, महिला संगठनों और कोर्ट के दरवाजे पर पहुंचाया गया है, तब से राज्य सरकार के लिए यह एक एसेट बन गया है. यह बिना तर्क के नहीं, कुछ आंकड़े इस बात की पुख्ता वकालत कर रहे हैं. सोमवार को दो महीने के लिए मंदिर का पट खुला. पहले ही दिन करीब 70 हजार श्रद्धालु भगवान अय्यप्पा के दर पर दर्शन करने पहुंचे. दान-दक्षिणा और मंदिर परिसर के आस-पास की सारी कमाई मिलाकर कुल 3.28 करोड़ पर पहुंच गई.

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राज्य सरकार के राजस्व में मोटी कमाई

दिलचस्प बात यह है कि यह कमाई पिछले साल के मुकाबले 1.28 करोड़ रुपए ज्यादा है. इतना ही नहीं मंदिर और पुलिस प्रशासन इतनी बड़ी भीड़ को अच्छे से मैनेज भी नहीं कर पा रही. श्रद्धालुओं की असुविधा को लेकर शिकायतें भी लगातार उसी तेजी से बढ़ी हैं. देखा जाए तो राज्य सरकार का राजस्व इस बार मोटी कमाई करता हुआ दिख रहा है. मंदिर परिसर में हो रही प्रसाद और पूजा के सामानों की बिक्री राज्य सरकार प्रायोजित देवस्थान ट्रस्ट के माध्यम से बढ़ रही है. केरल सरकार इस बात से खुश होगी कि आस्था और मान्यता की बदौलत ही सही राज्य में टूरिज्म का एक और केंद्र अब उठ खड़ा हुआ है जिससे राजस्व को बड़ा फायदा होता दिख रहा है. 

अदालत ने कहा आस्था और मान्यता पर नहीं होगा फैसला 

अयोध्या मामले के बाद सबरीमाला मंदिर पर अब धीरे-धीरे  विवाद गहराता जा रहा है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इतना जरूर स्पष्ट किया कि इसपर फैसला किसी आस्था या पूर्वानुमान  से बंध कर नहीं किया जाएगा. पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के रिटायर होने से पहले इस मामले पर फैसले की उम्मीद जताई जा रही थी, लेकिन हुआ यह कि इसे 5 बेंचों की पीठ के पास से 7 बेंचों की पीठ के पास भेज दिया गया. तब तक के लिए सबरीमाला मामले में  28 अक्टूबर को दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को होल्ड पर रखा गया. यानी यह कि 10-50 वर्ष की महिलाएं मंदिर में प्रवेश कर सकती हैं.

मंदिर विवाद के पीछे की राजनीतिक कलह

एक बात यह भी है कि सबरीमाला मामले में भी राजनीति की बू आती है. केरल की वामपंथी सरकार हो या केंद्र की दक्षिणापंथी सरकार या फिर केंद्र की विपक्षी लिबरल पार्टी कांग्रेस सबके विचारों में भिन्नता है. जाहिर है होगी भी.क्योंकि पार्टियों के राजनीतिक सिद्धांत अलग हैं.

भाजपा भगवान अय्यप्पा के सबरीमाला मंदिर में रजस्वाला महिलाओं के प्रवेश को लेकर आस्था और मान्यता को धक्का के नजर से देख रही है तो वहीं केरल सरकार पुरुष और महिलाओं में भेदभाव किए बिना सबके प्रवेश की बातें कर रही है. वहीं कांग्रेस का तो इसपर मिली जुली प्रतिक्रिया आ रही है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी तो कई दफा अपने विचारों पर ही खड़े नजर नहीं आते.

मंदिर विवाद पर फैसले का सबको इंतजार

केरल की सरकार ने तो स्पष्ट यह भी कह दिया है कि इस बार वह किसी भी प्रकार से सबरीमाला विवाद को आंदोलन में बदलने का मौका नहीं देगी. राज्य सरकार देवस्थली भूमि से जो बड़ा राजस्व कमा रही है, उस विवाद को शुरुआती दिनों में फलने-फूलने से रोकने की बजाए खुद भी उसमें अपने विचार देकर शामिल हो गई थी. अब यह देखना है कि सबरीमाला मंदिर विवाद मामले पर सुप्रीम कोर्ट की 7 सदस्यीय बेंच का क्या फैसला आता है और इसके बाद भी अदालत के फैसले की आलोचना करने का जो नया ट्रेंड चल गया है, उस पर लोगों का और राजनीतिक पार्टियों व एनजीओं सहित तमाम पक्षों का क्या रिएक्शन आता है.