महाराष्ट्र में मंत्रिमंडल का फॉर्मूला तय! NCP के खाते में डिप्टी सीएम, कांग्रेस के हाथ खाली

महाराष्ट्र में मंत्रिमंडल और विधानसभा अध्यक्ष को लेकर फॉर्मूला तय हो गया है. एनसीपी के खाते में एक डिप्टी सीएम का पद गया है, जबकि कांग्रेस को विधानसभा अध्यक्ष और सिर्फ 12 मंत्री पद से संतोष करना पड़ रहा है.

महाराष्ट्र में मंत्रिमंडल का फॉर्मूला तय! NCP के खाते में डिप्टी सीएम, कांग्रेस के हाथ खाली

नई दिल्ली: महाराष्ट्र में गैर बीजेपी मोर्चा महाविकास अघाड़ी के तहत शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी ने मिलकर सरकार भले ही बना ली हो लेकिन सरकार में तीनों दलों की एक समान हिस्सेदारी नहीं हो पाई. शिवसेना और एनसीपी ने अपने हिस्से में मंत्री तो ज्यादा रखे हैं, लेकिन कांग्रेस को सिर्फ 12 मंत्रालय से ही संतोष करना पड़ रहा है.

तो क्या कांग्रेस के साथ हुई नाइंसाफी?

सरकार में 56 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी शिवसेना है. लिहाजा सरकार में सीएम समेत 15 कैबिनेट मिनिस्टर की हिस्सेदारी शिवसेना ने ले ली. शिवसेना के बाद 54 सीटों के साथ सरकार में दूसरी बड़ी पार्टी एनसीपी है. लिहाजा, एनसीपी ने भी सरकार में बढ़ चढ़ कर हिस्सेदारी ली. सरकार में एनसीपी के हिस्से 16 मंत्रालय आए. इसके साथ ही उप मुख्यमंत्री के पद पर भी एनसीपी ने कब्जा जमा लिया है. अब इसके बाद नंबर आया कांग्रेस का, जो 44 सीटों के साथ सरकार में तीसरे और आखिरी नंबर की पार्टी है. लिहाजा कांग्रेस, सरकार में तीनों दलों के बराबर-बराबर हिस्से के लिए खुलकर बोल नहीं पाई. इसी वजह से कांग्रेस को महज 12 मंत्री पद से ही संतोष करना पड़ा.

कांग्रेस के खाते में विधानसभा अध्यक्ष

कांग्रेस की ओर से सरकार में 2 डिप्टी सीएम का पद रखने की मांग की गई. लेकिन बताया जा रहा है कि एनसीपी ने पहले कांग्रेस की बात मान ली. लेकिन बाद में शरद पवार 2 डिप्टी सीएम वाले फॉर्मूले का विरोध करने लगे. और गठबंधन में कांग्रेस को विधानसभा अध्यक्ष का पद ऑफर किया गया. आखिरकार कांग्रेस को विधानसभा अध्यक्ष के पद से ही संतोष करना पड़ा. रविवार को कांग्रेस कोटे से नाना पटोले महाराष्ट्र विधानसभा के अध्यक्ष चुने गए.

मोदी के खिलाफ खोला था मोर्चा

नाना पटोले भारतीय जनता पार्टी छोड़कर कांग्रेस में आए हैं. पटोले भाजपा से सांसद रह चुके हैं. पार्टी में रहते हुए उन्होंने ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ सबसे पहले मोर्चा खोला था. उन्होंने मोदी पर तानाशाही का आरोप लगाते हुए सांसद पद से इस्तीफा दे दिया था. और बीजेपी छोड़कर कांग्रेस में चले गए थे. अब मोदी की मुखालफत का इनाम सोनिया ने उन्हें विधानसभा अध्यक्ष बनाकर दिया है.

आखिर कांग्रेस, सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाते हुए भी सबसे नुकसान में क्यों रही? आखिर कांग्रेस की ऐसी क्या मजबूरी थी उसने शिवसेना और एनसीपी से कम मंत्री पद और कम मलाईदार विभागों से संतोष किया. जबकि खुद NDA के साथ गठबंधन में बीजेपी के 105 सीटों के मुकाबले महज 56 सीटें लाने वाली शिवसेना सीएम पद लेने पर अड़ी थी.

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उसी शिवसेना ने जब महाविकास अघाड़ी गठबंधन बनाया. तब खुद को सबसे बड़ी पार्टी बताते हुए सीएम पद पर दावा किया. शिवसेना की 'चित भी मेरी, पट भी मेरी' नीति पर कांग्रेस और एनसीपी दोनों ने ही सवाल नहीं उठाए. इसके पीछे वजह ये हो सकती है कि एनसीपी को विपक्ष में बैठने के बजाय सरकार में शामिल होने का मौका मिल रहा था. और कांग्रेस किसी भी कीमत पर महाराष्ट्र में गैर भाजपा सरकार चाहती थी.

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