महाराष्ट्रः शिवसेना-कांग्रेस कितनी दूर साथ चलेंगी, बताएगी 6 दिसंबर की तारीख

कुर्सी की चाहत क्या न करवाए. इसी चाहत में शिवसेना किस ओर बढ़ गई है उसे नहीं पता. सरकार बनाने के लिए शिवसेना ने एनसीपी-कांग्रेस का साथ ले ही लिया है. यह वही कांग्रेस है जिसका शिवसेना हमेशा से विरोध करती आई है. न तो कभी दोनों के विचार मिले हैं और न ही विचारधारा. सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा तो अयोध्या मामला व 6 दिसंबर की तारीख रही है. दोनों पार्टियों के सामने यह तारीख फिर से आ रही है. दोनों दल इससे कैसे नजरें मिलाएंगे. 

महाराष्ट्रः शिवसेना-कांग्रेस कितनी दूर साथ चलेंगी, बताएगी 6 दिसंबर की तारीख

मुंबईः आज से दिसंबर लग गया है. यानी कि जाते हुए साल का आखिरी महीना आज से शुरू है. इसी महीने की शुरुआती हफ्तों में एक खास दिन आने वाला है. वह दिन जिसे देखने, सुनने, समझने का नजरिया अब तक बिल्कुल अलग रहा है. जनता की तरफ से सोचें तो शायद उनकी बहुत रुचि नहीं रही होगी. वह तो उस रोज भी हमेशा की तरह सुबह उठेगी, कुआं खोदेगी, पानी पिएगी और सो जाएगी. लेकिन पिछले 27 सालों से भारत की राजनीति उन्हें इस दिन जगाती आई है. मसला ही इतना बड़ा था. इसलिए दिन बड़ा हो गया. यानी छह दिसंबर का दिन.

इस दिन की बात हम पांच दिन पहले क्यों कर रहे हैं
आज इस बारे में बात करने का बहुत बड़ा कारण है. अव्वल तो यह है कि अभी-अभी महाराष्ट्र में सरकार बनी है. महीने भर के तमाशे के बाद शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे सीएम कुर्सी पर बैठे हैं और शनिवार को ठोंक-पीट कर फ्लोर टेस्ट भी हो गया है. अब वो इस कुर्सी पर क्या-क्या दांव लगा कर बैठे है, किसी से छिपा नहीं है. कुर्सी नहीं स्टूल कह लीजीए. जिसमें एक पाया एनसीपी, दूसरा शिवसेना और तीसरा पाया है कांग्रेस. आज तक हम कांग्रेस और शिवसेना को दो ध्रुवों पर खड़ा देखते आए हैं.

मतलब गणित में जो 36 है, वही शिवसेना और कांग्रेस हैं. आज एक दिसंबर को छह दिसंबर की बात इसलिए कर रहे हैं क्योंकि इस दिन को दोनों अलग-अलग तरीके खुद भी देखते आए हैं और जनता को भी दिखाने की कोशिश करते आए हैं.

6 दिसंबर, इतना बड़ा बना कैसे
इस तारीख का इतिहास 27 साल पहले लिखा गया था. अभी नौ नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले पर फैसला सुनाया है. 1992 में दिसंबर के छठवें रोज अयोध्या में करीब डेढ़ लाख लोगों की भीड़ जुटी और रामलला विराजमान की जमीन पर खड़े एक विवादित ढांचे को गिरा गई. भूगोल-विज्ञान 21 जून को सबसे बड़ा दिन बताते हैं, लेकिन इस इतिहास के कारण 6 दिसंबर भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा दिन बन गया. इस हर साल हर राजनीतिक धड़ा अलग-अलग तरीके से इसे याद दिलाता रहा है.

शिवसेना इसे अन्य हिंदूवादी दलों के साथ मिलकर शौर्य दिवस के रूप में मनाती आई है. जबकि कांग्रेस व अन्य वामपंथी दल इसे काला दिवस के तौर पर याद करते हैं. तर्क देते हैं कि ढांचा गिरने के कारण दंगे हुए थे. 

तिपाई सरकार के भविष्य का लिटमस टेस्ट है 6 दिसंबर
कांग्रेस और शिवसेना किसी बैटरी के प्लस-माइनस जैसी रही हैं. धरती के ओर-छोर जैसी इनकी विचारधार रही है. मतलब शिवसेना जो कहे, वो कांग्रेस को ना और कांग्रेस जो कहे वह शिवसेना को नहीं पसंद. ऐसे में सवाल उठता है कि आने वाले 6 दिसंबर को शिवसेना और कांग्रेस दोनों का रुख कैसा रहेगा. क्या इस दिन शौर्य दिवस मनेगा या फिर कांग्रेस शोक में दो मिनट का मौन रखवाएगी. जब एनसीपी-कांग्रेस से शिवसेना के गठबंधन की बात शुरू हुई थी तब कांग्रेस ने शिवसेना से सॉफ्ट हिंदुत्व का रुख अपनाने के लिए बात रखी थी.

अब कॉमन मिनिमम प्रोग्रॉम में क्या तय हुआ है, यह छह दिसंबर को दिख ही जाएगा. साथ ही यह भी कयास लग जाएंगे कि यह तिपहिया गाड़ी कितनी दूर तक जाएगी. 

शिवसेना जिंदा मक्खी निगलने जा रही है

गडकरी पहले बता चुके हैं, इस गठबंधन में वैचारिक तालमेल नहीं 
नितिन गडकरी महाराष्ट्र की राजनीति के माहिर खिलाड़ी रहे हैं. उन्होंने कुछ दिन पहले कहा कि वैचारिक तालमेल न होने के कारण यह गठबंधन टिकेगा नहीं. इसके आगे जोड़ा था कि शिवसेना और बीजेपी का गठबंधन न होना देश, विचारधारा, हिंदुत्व और महाराष्ट्र के लिए हानिकारक है.

इसे ऐसे समझा जाना चाहिए कि शिवसेना जिस विचारधारा पर चलती है, कांग्रेस उसका पूरी तरह से विरोध करती है. कांग्रेस जिस विचारधारा पर चलती है, उसका शिवसेना विरोध करती आई है. यहां तक की एनसीपी के विचार शिवसेना से बेहद अलग हैं. इसलिए इनका मिलना महाराष्ट्र में स्थिरता सरकार देने के लक्षण हैं ही नहीं. 

शिवसेना की छवि तय करेगी तारीख छह दिसंबर
शिवसैनिक और भाजपा का लंबा अलायंस इसलिए भी रहा है क्योंकि वैचारिक आधार पर दोनों दल एक जैसी सोच रखते आए हैं. हिंदुत्व की प्रखर विचारधारा के तौर पर महाराष्ट्र का नाम सबसे आगे हैं. वहीं शिवसेना वीर शिवाजी और मराठा वीरों को अपना प्रेरक मानती है. भाजपा की हिंदुत्ववादी छवि और शिवसेना का हिंदुत्ववाद मिलकर एक हो जाते हैं. इसी आधार पर मराठा मानुष ने इस गठबंधन को वोट किया था. शिवसेना बीते 27 सालों से आंदोलन और अभियान की तरह इस तारीख को मनाती है.

इसकी तैयारियां भी पहले से शुरू हो जाती थीं. अब जब शिवसेना अपने ही विरोधी यानी कि कांग्रेस के साथ सरकार बना चुकी है तो मराठी मानुष इसे सीधे तौर पर धोखे की तरह देख रहे हैं. कांग्रेस की ओर से मिली कट्टर हिंदुत्व छोड़ने की शर्त से शिवसेना की छवि को चोट पहुंच रही है.

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