देश भर में घुसपैठियों की पहचान करने के लिए मोदी सरकार उठाएगी यह कदम

मोदी सरकार 2.0 का पहला शीतकालीन सत्र 18 नवंबर से शुरू होने जा रहा है. यह सत्र मात्र 25 दिनों तक ही चलने वाला है. इस दौरान सरकार कई अहम विधेयकों को पास कराने और कई अहम विधेयकों में संशोधन करने की तैयारी में है. नागरिक संशोधन विधेयक उनमें से एक है. 

देश भर में घुसपैठियों की पहचान करने के लिए मोदी सरकार उठाएगी यह कदम

नई दिल्ली: 2019 के लोकसभा चुनाव में बहुमत के साथ लौटी एनडीए-II की सरकार ने अपने पहले मॉनसून सत्र में खासी ऊर्जा दिखाई. वह सत्र देश के अब तक के संसदीय इतिहास का सबसे सफल सत्र रहा था. अब सरकार की नजर शीतकालीन सत्र पर है, जिसकी शुरूआत 18 नवंबर से हो जाएगी.  मात्र 25 दिन चलने वाले इस सत्र में कई अहम अध्यादेशों को बिल में तब्दील करना है और उन्हें पास भी करा लेना है. इन अहम बिलों की सूची में नागरिक संशोधन बिल भी है, जिसमें कुछ बदलाव करने का पूरा-पूरा मन सरकार बना चुकी है. नागरिकता बिल में संशोधन के लिए मोदी सरकार ने पिछली बार भी जनवरी में शीतकालीन सत्र के दौरान इसे पेश किया था, लेकिन 8 जनवरी को संसद के निचले सदन में इसके पास हो जाने के बाद सरकार ने इसे राज्य सभा में भेजे जाने से रोक लिया. 

एनआरसी को लेकर गंभीर है मोदी सरकार

राज्यसभा में इस बिल को ना भेजे जाने का फैसला इसलिए लिया गया क्योंकि सरकार इस दफा इस विधे़यक में बदलावों को लेकर काफी सजग है. राज्यसभा में उस वक्त तक सरकार के पास बहुमत नहीं था. उपरी सदन में विधेयक पेश करने का मतलब था कि अगर इस बार यह बिल पास न हो सका तो अगली बार फिर से इसे दोनों सदनों में पास कराना होगा. नागरिकता विधेयक क्यों जरूरी है, इसके पीछे भी सबके अपने-अपने तर्क हैं. दरअसल, एनडीए सरकार एनआरसी को लेकर काफी गंभीर है. उत्तर-पूर्वी राज्यों में अप्रवासियों की बढ़ती संख्या से होने वाली परेशानियां एक बड़ी मुसीबत बनी हुईं हैं. असम में इसको लेकर मामला पहले से ऊबाल ले रहा है. इस बिल के कुछ प्रावधान ऐसे हैं जो असम एनआरसी और असम एकॉर्ड के प्रावधानों के खिलाफ नजर आते हैं. सरकार इसलिए इसे जल्द से जल्द पारित कराने की तैयारी में है. 

बिल में संशोधन के बाद लगातार हो रही है आलोचना

नागरिकता विधेयक में यह पहला मौका नहीं है जब संशोधन किया जा रहा हो. इससे पहले भी कई बार इस विधेयक में सरकारें स्थितियों के हिसाब से बदलाव करती आईं हैं. नागरिकता विधेयक सबसे पहली दफा 1955 में संसद के दोनों सदनों से पारित हो कर एक विधेयक बना. इसके बाद इसमें 1986, 1992, 2003, 2005 और 2016 में संशोधन किए गए. 2016 के संशोधन के बाद कई दफा विवाद भी हुए. इसके बाद 2019 में जब इस विधेयक में संशोधन कर लोकसभा से पास कराया गया तो विवाद और भी गहराता चला गया. दरअसल, संशोधन में यह प्रस्ताव जोड़ा गया था कि भारत के जितने भी पड़ोसी देश हैं, जैसे आफगानिस्तान, पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, म्यांमार और मालदीव, उन सभी देशों के अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता का अधिकार हो सकता है. हालांकि, यह अधिकार गैर-मुस्लिम समुदायों को ही दिया गया है, जिसकी आलोचना हो रही है. कई जगह तो इसे सेक्टेरियन बिल का दर्जा भी दिया जा रहा है. दिलचस्प बात यह है कि अब इसके आलोचना का बड़ा कारण एनआरसी मामला है.

क्या है नागरिकता संशोधन विधेयक ? 

नागरिकता संशोधन विधेयक में अन्य देशों के बाशिंदों को भारत की नागरिकता दिलाने में मदद करता है. हालांकि, इसका कुछ आधार बनाया गया है और इसकी कुछ शर्तें भी हैं. भारतीय संविधान के मुताबिक अनुच्छेद 5 से 11 तक भारत की नागरिकता से संबंधित बातें दी हुई हैं. भारतीय नागरिकता हासिल करने की कुछ शर्तें हैं जिसमें देश के राजनीतिक क्षेत्र के अंदर पैदा होने वालों को या जिनके पूर्वज भारतीय रहे हों उनको नागरिकता मिल जाती है. इसके अलावा रजिस्ट्रेशन के माध्यम से या फिर भारत सरकार के अधीन प्रक्रियाओं को मानते हुए देसीकरण जिसे नागरिकीकरण भी कहा जाता है, उसके तहत भी भारतीय नागरिकता दिए जाने का प्रावधान है. इसी बिल में नागरिकता को छीने जाने का भी प्रावधान है. यदि कोई भारतीय नागरिक अपनी स्वेच्छा से भारतीय नागरिकता का परित्याग कर दे या अगर कोई व्यक्ति भारतीय नागरिकता को छोड़ किसी और देश की नागरिकता हासिल कर ले तो वैसी स्थिति में उसकी भारतीय नागरिकता खत्म हो जाती है. 

शीतकालीन सत्र में और अहम मुद्दों पर रहेगी नजर

शीतकालीन सत्र में जहां सरकार कई अहम बिल और पुराने बिलों के संसोधन को लेकर कुछ रणनीतियां बना रही है वहीं विपक्ष में बैठी पार्टियां सरकार को आर्थिक मामलो और जम्मू कश्मीर पुनर्गठन बिल पर घेरने की योजना बना रही हैं. इसके अलावा इस सत्र मेंसत्र में सरकार दो अहम अध्यादेशों को बिल में बदलने की फिराक में है. मोदी सरकार देसी विनिर्माण वाली कंपनियों पर कॉरेपोरेट दर को घटाए जाने को लेकर काफी सजग दिख रही है. सरकार का मानना है कि इससे अर्थव्यवस्था में आई मंदी से ग्रसित कई कंपनियों को बाहर निकाल अर्थव्यवस्था को बेहतर स्थिति में लाया जा सकता है. वही दूसरी ओर ई-सिगरेट के बेचने और बनाने पर लगाए गए प्रतिबंध के बाद सरकार इससे संबंधित कोई बिल लाने की कोशिश कर सकती है.