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देर से आई NCRB की रिपोर्ट क्या दुरुस्त आई ? जानिए 7 मुख्य बातें

राष्ट्रीय अपराध अन्वेषण ब्यूरो के आंकड़े सरकार की ओर से जारी किए गए सबसे विश्वसनीय आंकड़े माने जाते हैं और अब जब कि ये आ गया है तो ये सवाल उठाया जा रहा है कि क्या ये मुक्कमल रूप में आया है. क्यों कहा जा रहा है ऐसा और क्या है इस रिपोर्ट की मुख्य बातें, आइए देखते हैं.  

देर से आई NCRB की रिपोर्ट क्या दुरुस्त आई ? जानिए 7 मुख्य बातें

नई दिल्ली: सोमवार को सरकारी संस्था NCRB(नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो) ने 2017 में दर्ज किए गए आपराधिक मामलों के आंकड़े जारी किए. दो साल की देरी से जारी किए गए आंकड़ों में मॉब लिंचिग, खाप पंचायत और धार्मिक मामलों से जुड़े अपराधों को नहीं जोड़े जाने के बाद इसे आधा-अधूरा ही कहा जाने लगा. हालांकि एनसीआरबी के जारी आंकड़ों में कुछ डाटा बड़े महत्वपूर्ण हैं. फिर चाहे वो फेक न्यूज से जुड़े मामले हों या महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध. साल 2016 के मुकाबले साल 2017 में राज्य के खिलाफ आपराधिक मामलों में 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. 

राष्ट्रीय अपराध अन्वेषण ब्यूरो की रिपोर्ट में आपराधिक मामलों से जुड़े कुछ ऐसे पहलू हैं जिनपर न सिर्फ केंद्र सरकार को बल्कि राज्य सरकार को भी संज्ञान लेना होगा, खासकर महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध के मामलों पर. एनसीआरबी के रिपोर्ट के कुछ अहम बातें हैं. 

उन पर एक नजर डाल उसको समझने की कोशिश करते हैं :-

  •  2017 में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध के कुल 3,59,849 मामले दर्ज किए गए हैं जिसमें उत्तरप्रदेश में सर्वाधिक 56,011 केस दर्ज हुए. इसके बाद महाराष्ट्र में 31979 केस तो वहीं पश्चिम बंगाल में 30,002 केस दर्ज किए गए. महिलाओं के विरूद्ध आपराधिक मामलों में 27.9 फीसदी मामले घरों में पति या रिश्तेदारों के प्रताड़ना से संबंधित हैं. इसके अलावा 21.7 फीसदी मामले महिलाओं की लज्जा पर हमला करने के खिलाफ तो 20.5 फीसदी मामले अपहरण और 7 फीसदी मामले रेप से जुड़े हैं. 
  •  इसके अलावा दंगों से जुड़े अपराध के मामलों में काफी इजाफा हुआ है. 2017 में दर्ज किए गए 58,880 मामलों में से अकेले बिहार में 11,698 केस दर्ज किए गए थे जो अब तक का सबसे अधिक है. बिहार के बाद उत्तरप्रदेश में 8,990 केस, महाराष्ट्र में 7743 केस दर्ज हुए हैं. दंगों से जुड़े अपराध के मामलों में 723 मामले सांप्रदायिक हिंसा से, 183 मामले सेक्टेरियन हिंसा से जुड़े, 805 जाति विवाद से जुड़े तो 1909 मामले राजनीतिक कारणों से प्रेरित मिले हैं. ऐसा पहली बार हुआ है जब बिहार दंगों से जुड़े आपराधिक मामलों में टॉप पर हो.
  • NCRB के जारी किए गए आंकड़ों में पहली बार फेक न्यूज और अफवाहों से उपजे आपराधिक मामलों को साथ समेटा गया है. इस लिस्ट में मध्यप्रदेश में सर्वाधिक 138 मामले, उत्तर प्रदेश में 32 तो केरल में 18 मामले सरकारी फाइलों में दर्ज किए गए हैं. 
  •  इसके अलावा 2017 के राष्ट्रीय अपराध अन्वेषण ब्यूरो की रिपोर्ट में स्टेट (अनुच्छेद 12 के हिसाब से राज्य की परिभाषा नियम और कानून बनाने वाले व्यक्ति या संस्था के रूप में की गई है) के खिलाफ अपराध के मामलों में पिछले साल के मुकाबले 30 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है. 2016 में जहां 6986 मामले दर्ज किए गए हैं वहीं 2017 में बढ़कर 9,013 पर आ गए थे. सबसे ज्यादा हरियाणा(2576) के बाद उत्तर प्रदेश में 2,055 मामले आधिकारिक तौर पर दर्ज किए गए है. ज्ञात हो कि राजद्रोह (धारा 124 A), देश के मूल्यों के खिलाफ जंग छेड़ने की साजिश और सरकारी संपत्ति का नुकसान राज्य के खिलाफ अपराध के मामलों में गिना जाता है. 
  •  NCRB के आंकड़ों में एक नई कैटेगरी को जोड़ा गया है जिसे 'एंटी नेशनल एलिमेंट' का नाम दिया गया है. इसमें सबसे ज्यादा 652 अपराधिक मामले लेफ्टविंग कट्टरपंथियों के दर्ज किए गए हैं. इसके बाद 421 मामले उत्तर-पूर्वी उग्रवादियों के तो 371 मामले आतंकवादी गतिविधियों से जुड़े पाए गए हैं. 
  •  साल 2017 में अपहरण के मामलों में साल 2016 के मुकाबले 9 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई. 2016 में जो आंकड़े 88,008 पर थे, 2017 में बढ़कर 95,893 पर पहुंच गए. इसमें से 63,349 बच्चे 2017 में लापता पाए गए तो उसी साल 70,440 लापता बच्चों को ढ़ूंढ़ निकाला भी गया. 
  •  हालांकि, हत्या के मामलों में साल 2017 के आंकड़े 2016 के आंकड़ों की तुलना में कुछ बेहतर जरूर हैं. 2017 में हत्या के कुल 28,653 मामलों की आधिकारिक पुष्टि की गई जबकि 2016 में ये 30,450 पर था. यानी इसमें तकरीबन 6 फीसदी की कमी पाई गई है. विवाद से जुड़े हत्या के 7,898 मामले तो निजी दुश्मनी के 4,660 मामले दर्ज किए गए. 

राष्ट्रीय अपराध अन्वेषण ब्यूरो के वार्षिक रिपोर्ट की दिलचस्प बात तो ये है कि इसमें एंटी-नेशनल एलिमेंट्स को तो जोड़ा गया पर मॉब लिंचिग और सायबर क्राइम से जुड़े आपराधिक मामलों को नजरअंदाज कर दिया गया. इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक एनसीआरबी के एक अधिकारी का कहना है कि इससे जुड़े मामलों के आंकड़े भी निकाले तो जरूर गए हैं लेकिन उन्हें रिपोर्ट में जगह नहीं दी गई. क्यों इसकी जानकारी उन्हें नहीं है.