क्यों बगावती तेवर में नजर आ रही हैं पंकजा मुंडे, जानिए तीन कारण

महाराष्ट्र के महाड्रामा का अंत या यूं कहें कि कोई ओर-छोर ही नहीं मिल रहा है. पहले सरकार बनाने को लेकर खींचतान देखने को मिल रही थी, फिर शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस के अंदर जिच की खबरें मिली लेकिन खींचतान की खबरें पाला बदलकर भाजपा के खेमे में आ गई है. पार्टी सत्ता में नहीं आ पाई तो पुराने से लेकर नए नेता भी नाराज होने लगे. बगावती तेवर भी दिखने शुरू हो गए. शुरुआत हुई है पंकजा मुंडे से.

क्यों बगावती तेवर में नजर आ रही हैं पंकजा मुंडे, जानिए तीन कारण

मुबंई: सियासी ड्रामे में भाजपा की जीत कर भी हार ही हुई. अब जबकि शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस की सरकार बन गई है तो पंकजा मुंडे ने भी भाजपा का दामन छोड़ने का मन बना लिया है. पराली से चुनावी मैदान में उतरीं और हारीं पंकजा मुंडे ने अपने ट्विटर प्रोफाइल से भाजपा के तमाम पद हटा लिए हैं. यहीं नहीं पंकजा मुंडे ने यह भी कहा है कि "राज्य में बदले राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए यह सोचने और निर्णय लेने की आवश्यकता है कि आगे क्या किया जाना है. मुझे खुद से बात करने के लिए आठ से 10 दिन की आवश्यकता है." खबरें यह आ रही हैं कि पंकजा मुंडे शिवसेना में शामिल हो सकती हैं. 

पराली से हारीं तो पार्टी को ही बताया जिम्मेदार

दरअसल, महाराष्ट्र के पराली विधानसभा क्षेत्र से अपने ही भाई धनंजय मुंडे के हाथों चुनाव में शिकस्त झेलने के बाद पंकजा मुंडे ने पार्टी को उनकी हार का जिम्मेदार बताया. इसके अलावा यह भी कहा कि उन्हें षडयंत्र के तहत हराया गया है.

हालांकि, पंकजा मुंडे ने फिर भी महाराष्ट्र में चल रहे सियासी ड्रामें के अंत तक रूक कर सब कुछ नजदीक से देखा और अब जबकि इसका अंत उद्धव ठाकरे की जीत के साथ हुआ है तो उन्होंने भाजपा को एक अलग ही मुश्किल में डालने का मन बना लिया. पंकजा शिवसेना के काफी नजदीकी भाजपा नेताओं में से एक रही हैं. ऐसे में उद्धव ठाकरे से उनकी नजदीकी का फायदा तो उन्हें मिल ही सकता है. 

शिवसेना नेता ने कहा पार्टी में पंकजा का स्वागत है 

उधर शिवसेना के नेता अब्दुल सत्तार ने कहा कि "पंकजा मुंडे 12 दिसंबर को बता देंगी कि उनका अगला फैसला क्या होगा. अगर वह शिवसेना में शामिल होना चाहती हैं तो उनका स्वागत है. दिवंगत गोपीनाथ मुंडे और बालासाहेब ठाकरे एक दूसरे के बहुत करीबी नेता रहे हैं. यह रिश्ता आगे भी यूं ही बना रहेगा."

मालूम हो कि पंकजा मुंडे दिग्गज भाजपा नेता गोपीनाथ मुंडे की पुत्री हैं. पराली विधानसभा क्षेत्र उनकी पैतृक सीट रही है. लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि पंकजा मुंडे अपनी पुरानी पार्टी छोड़ने का मन बना रही हैं.

पंकजा मुंडे की भाजपा से नाराजगी के तीन कारण 

 पंकजा मुंडे उस वक्त की नेता हैं जब पार्टी में उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की प्रतिद्वंदी नेताओं में माना जाता है. गोपीनाथ मुंडे के बाद पंकजा मुंडे को राजनीतिक वारिस बनाए जाने के बाद भाजपा में उनके बढ़ते कद से मुख्यमंत्री की प्रतिद्वंदिता बढ़ने लगी थी. लेकिन केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी से लेकर एकनाथ खड़से    तक की चुनौतियों को पार पाने वाले देवेंद्र फडणवीस के लिए उतना मुश्किल नहीं रहा पंकजा मुंडे की प्रतिद्वंदिता को खत्म कर देना.

दरअसल, पंकजा मुंडे पर चिक्की खरीद घोटाला मामले में नाम आने के बाद धीरे-धीरे उनका कद घटने लगा. पंकजा इस बात को लेकर आशंकित हैं कि उनका कद घटाने के लिए फडणवीस सरकार  ने घोटाले की फाइलें खुलवाई थी.

पार्टी पर दबाव बनाने की फिराक में हैं पंकजा 

 इसके अलावा पंकजा मुंडे की नाराजगी का एक कारण यह भी हो सकता है कि वह किसी तरह से केंद्रीय स्तर पर अपनी जगह को लेकर किसी तरह का दबाव बनाने की कोशिश कर सकती हैं. पराली विधानसभा सीट से अपने ही भाई से हारने के बाद पंकजा मुंडे फिलहाल बेरोजगार हो गईं हैं. न ही पार्टी की ओर से विधायक हैं और     न ही कोई पद पर हैं. ऐसे में उनकी नजर केंद्रीय मंत्री या किसी पद पर है. दबाव बनाने के लिए यह तरीका काफी काम आ सकता है. 

ओबीसी नेताओं की हो रही है पार्टी से छंटनी !

पंकजा मुंडे को इस बात का डर सताने लगा है कि पार्टी में उनकी हैसियत को कम किया जा सकता है. चुनाव हारने के बाद से पंकजा लगातार आवाज भी उठा रही हैं. ओबीसी आरक्षण के मसले पर अपनी ही सरकार को घेरने की कोशिश भी कर चुकी थीं. दरअसल, उनका मानना है कि भाजपा महाराष्ट्र में ओबीसी नेताओें को  हाशिए पर लाने की फिराक में है.

पहले भी एकनाथ खड़गे को अलग-थलग कर के राजनीतिक करियर खत्म कर दिया गया है. राम शिंदे के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. अब अगला नंबर उनका न हो, इस वजह से वह पार्टी से दूरी बनाने की तैयारी में हैं. क्योंकि पंकजा का मानना है कि उन्हें जानबूझ कर जबरदस्ती चुनाव में लॉबी के तहत हराया गया है. 

खैर यह तो था पंकजा मुंडे के भाजपा छोड़ने के कारणों के पीछे का तर्क, लेकिन जो ट्विटर के जरिए पार्टी के ऊपर दबाव बनाने की ट्विटर पॉलिटिक्स है, वह आजकल कुछ ज्याद ही सक्रिय होती जा रही है. पहले कांग्रेस की ओर से ज्योतिरादित्य सिंधिया ने तो अब भाजपा की पंकजा मुंडे यह तरीका आजमा चुकी हैं. अब देखना यह है कि पंकजा आखिर 12 दिसंबर को अपनी चुप्पी के बाद जब कुछ बोलेंगी तो क्या बड़ा धमाका होगा.