भारत के गांवों में बढ़ती गरीबी के हैं ये तीन असली कारण

भारत की आजादी के बाद से ही गरीबी उन्मूलन का नारा बुलंद किया जाता रहा है. देश में गरीबी रेखा के नीचे आने वाले तकरीबन 27 फीसदी लोग हैं. वर्तमान सरकार की नीतियां लोगों को गरीबी रेखा से खींचकर बाहर नहीं ला पा रही हैं. ऐसा हम नहीं एनएसओ की रिपोर्ट कह रही है, जिसमें यह कहा गया कि भारत के गांवों में गरीबी दर हाल के दिनों में बढ़ी है. क्यों बढ़ी है, इसके पीछे भी कई कारण हैं.    

भारत के गांवों में बढ़ती गरीबी के हैं ये तीन असली कारण

नई दिल्ली: लगभग सभी चुनावों में चाहे वह आम चुनाव हो या विधानसभा चुनाव गरीबी को कम ही नहीं इसका खात्मा करने के बड़े-बड़े वादे मंच से किए जाते हैं. एक नहीं सभी पार्टियां करती हैं और सभी उम्मीदवार भी अमूमन कर ही लेते हैं. चुनाव जीतने के बाद नेताजी की गरीबी तो खत्म हो जाती है लेकिन जनता जिसे लोकतंत्र में मालिक का दर्जा दिया गया है, और बस दर्जा ही दिया गया है, माना नहीं गया, वह दरिद्र की दरिद्र ही रहती है.

तभी तो एनएसओ की ताजा रिपोर्ट में पिछले कुछ सालों से गरीबी दर को बढ़ता हुआ दिखाया जा रहा है. बिहार हो या झारखंड और ओडिशा इन राज्यों की स्थिति तो जैसे सुधरने की बजाए और बिगड़ते ही जा रही है. ना ही लोगों की जीवन दशा सुधरी है और ना ही रोजगार ही मिल सके हैं.

राष्ट्रीय सांख्यिकी संगठन का दावा गांवों में गरीबी दर में उफान

एनएसओ की रिपोर्ट में यह दर्शाया गया है कि साल 2011-12 में ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी की दर लगातार उफान ही लेती आई है. इन सालों के दौरान ग्रामीण गरीबी दर 4 फीसदी तक बढ़ गई थी जो 2017-18 में बढ़कर 23 फीसदी तक पहुंच गई है. यह वाकई चिंता का विषय है. हालांकि, शहरी गरीबी दर में 5 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई थी.

फीसदी के हिसाब से भले यह संख्या कुछ खास बड़ी न लग रही हो लेकिन नंबर के हिसाब से देखें तो यह 3 करोड़ के आसपास है. राष्ट्रीय सांख्यिकी संगठन यानी एनएसओ रिपोर्ट के मुताबिक पिछले आधे दशक यानी कि पांच साल में ग्रामीण गरीबी ने रफ्तार पकड़नी शुरू कर दी है. 

बिहार में रिकॉर्ड 50 फीसदी की दर से बढ़ी गांवों में गरीबी

बात करें अगर उत्तरी और उत्तरी-पूर्वी क्षेत्रों की तो यहां पर भी गरीबी दर में बढ़ोत्तरी ही दर्ज की गई है जबकि दक्षिणी राज्यों में गरीबी दर नीचे ही आई है. कर्नाटक इसमें अपवाद है, जहां दो वक्त की रोटी भी न पाने वाले लोगों की संख्या पिछले कुछ सालों में बढ़ी है.

बिहार की स्थिति और भी बिगड़ती ही जा रही है जहां गरीबी दर साल 2011-12 की तुलना में 2017-18 में 17 फीसदी से बढ़ कर 50.47 फीसदी तक पहुंच गई है. वहीं झारखंड और ओडिशा में भी गरीबी दर 8 फीसदी से ऊपर ही गई है. दोनों राज्यों में तकरीबन 40 फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे आते हैं. 

ये हैं तीन कारण 

पलायान कर रही आबादी है असल वजह

एनएसओ रिपोर्ट के अनुसार एक खबर ऐसी भी है जो थोड़ी राहत जरूर पहुंचा सकती है. शहरी गरीबी दर में थोड़ी कमी आई है. 2017-18 के आंकड़ों के मुताबिक शहरी क्षेत्रों में छोटी-छोटी नौकरियों में ही सही लोग रोजगार पा कर कम से कम अपने लिए दो वक्त की रोटी जुटा पाते हैं. राज्यों में ग्रामीण गरीबी दर की वजह से शहरों की ओर बड़ी आबादी का पलायान हुआ है. ऐसे में शहरी क्षेत्रों पर आबादी का बढ़ता दबाव और ग्रामीण इ्लाकों में बेरोजगारी की समस्या बहुत विकराल होती चली जा सकती है. 

ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ी काम न करने वाली आबादी भी है समस्या

भारत में गरीबी उन्मूलन को योजनाओं की कोई कमी नहीं है. मनरेगा से लेकर पीडीएस राशन वितरण जैसी सरकारी सहायताओं की जद को बढ़ाया गया है. लेकिन बावजूद इसके आखिर गरीबी दर पर नियंत्रण क्यों नहीं पाया गया, यह एक चिंता का विषय है.

हालांकि, ऐसा माना जा रहा है कि बिहार, झारखंड और ओडिशा के लोग पलायान पर ज्यादा यकीन करते हैं. ज्यादातर आबादी बड़े शहरों में व्यापार और नौकरी की तलाश में भटकने चली जाती है. ऐसे में गांवों में सिर्फ वैसे लोग बच जाते हैं जो 40-45 की उम्र से अधिक के हों या उन्हें काम करने में अक्षम लोग कह सकते हैं. ऐसे में जाहिर है कि ग्रामीण आबादी के गरीबी दर में बढ़ोत्तरी तो होनी ही थी. 

किसानी से ज्यादा मजदूरी की ओर भाग रहे लोग

इसके अलावे ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की कृषि पर कम होती निर्भरता भी बड़ा कारण है. लोग कृषि छोड़कर मजदूरी करने को उतारू होते जा रहे हैं. कारण कि खेती करने के लिए तकनीक, पैसे, खर्च और मेहनत से लोग ज्यादा अच्छा किसी काम में मजदूरी कर के हाथों-हाथ पैसे कमाना पसंद करने लगे हैं.