सबरीमालाः जानिए, कैसे अदालत की दहलीज तक पहुंचा दक्षिण भारत का यह तीर्थ

मंदिर में विराजमान भगवान अयप्पा को ब्रह्मचारी माना जाता है. इसलिए सिर्फ 10 साल तक की बच्चियां और 50 साल से अधिक की बुजुर्ग महिलाएं ही यहां जा सकती हैं. कई दशकों से यहां सभी उम्र की महिलाओं को जाने की अनुमति के लिए कानूनी लड़ाई चल रही है.

सबरीमालाः जानिए, कैसे अदालत की दहलीज तक पहुंचा दक्षिण भारत का यह तीर्थ

नई दिल्लीः गुरुवार को पूरे देश की निगाहें एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे पर थीं. क्योंकि आज एक बार फिर इस दरवाजे से धार्मिक स्थल से जुड़ा न्याय बाहर आने वाला था. मामला था सबरीमाला मंदिर का, जहां महिलाओं के प्रवेश की लड़ाई कई दशकों से लड़ी जा रही है. हालांकि निगाहें जमी रहीं, फैसला नहीं आया. एक जानकारी बाहर आई, जिसके तहत सबरीमाला का यह फैसला बड़ी बेंच को भेजा गया है. पांच जजों की बेंच सीजेआई रंजन गोगोई की अध्यक्षता में इस मामले की पुनर्विचार याचिका पर फैसला देने वाली थी. इस मंदिर के इतिहास से लेकर विवाद तक की कहानी पर डालते हैं एक नजर

एक कथा, मान्यता और मंदिर दर्शन का तरीका

केरल के पठनामथिट्टा में बना सबरीमाला मंदिर तकरीबन 800 साल पुराना है. भगवान अयप्पा को समर्पित यह मंदिर दक्षिण भारत का प्रसिद्ध तीर्थ है. कहते हैं कि अयप्पा भगवान शिव और भगवान विष्णु के स्त्री स्वरूप मोहिनी के पुत्र हैं. इसिलए अयप्पा को हरिहरन नाम से भी जाना जाता है. इन्हें इसके अलावा अयप्पन या मणिकांत प्रभु भी कहते हैं. मान्यता है कि अयप्पन दक्षिण के पाप हर लेते हैं. इस मंदिर में दर्शन का विधान काफी कठिन है. यहां जाने के लिए श्रद्धालु को हर तरह से शुद्ध होना होता है. इस शुद्धिकरण के लिए 41 दिन पहले से तैयारी करनी होती है. 41 दिनों का यह पूरा विधान मंडलव्रतम कहलाता है. इसमें श्रद्धालुओं को प्रतिदिन दो बार नहाना होता है, यौन संपर्क से बचना होता है, तामसी भोजन (मांस-मछली) नहीं करना होता है. बाल-दाढ़ी-नाखून नहीं कटाने होते, अपशब्द नहीं बोलने होते हैं, काले-नीले कपड़े पहनने होते हैं, किसी समारोह शादी आदि में नहीं जा सकते है. मंदिर जाते समय सिर पर एक गठरी होनी अनिवार्य है, जिसमें गुड़, नारियल व चावल आदि होते हैं. इस गठरी को पल्लिकेट्ट कहते हैं.

...तो किस बात की है लड़ाई

बात यह है कि मंदिर में विराजमान भगवान अयप्पा को ब्रह्मचारी माना जाता है. इसलिए सिर्फ 10 साल तक की बच्चियां और 50 साल से अधिक की बुजुर्ग महिलाएं ही यहां जा सकती हैं. उम्र के इस बंधन को तोड़ते हुए कहें तो सीधी बात है कि मासिक धर्म वाली उम्र में महिलाएं इस मंदिर में नहीं जा सकती हैं. मासिक धर्म वाली महिलाएं अशुद्ध मानी जाती हैं और अयप्पा के मंदिर में जाने की पहली शर्त मान्यता के अनुसार शुद्धता ही है. रोक-टोक को लेकर कोई मामला तो सामने नहीं आया था, लेकिन साल 1950 में एक घटना हो गई. यहां मंदिर में आग लग गई. इसके बाद मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया और कई कायदे बनाए गए. इनमें सबसे खास नियम रखा गया कि अब से महिलाएं इस मंदिर में नहीं जा सकेंगी. बस जैसे ही रोक लगाने वाली बात को घोषित किया गया, विवाद ने जन्म ले लिया. कहा जाता है कि 19वीं सदी में मद्रास सरकार ने जो दस्तावेज छापे थे, उनके अनुसार दो सदी से यहां महिलाओं को प्रवेश की अनुमति नहीं थी. 1891 और 1901 में छपे ब्रिटिश लेखकों के कुछ शोध बताते हैं कि बच्चियों और बुजुर्ग महिलाओं को मंदिर जाने की अनुमति थी.

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1990 में याचिका, 2006 में एक गंभीर दावा

1990 के साल में कोर्ट में एक व्यक्ति एस. महेंद्रन जनहित याचिका दाखिल की. उन्होंने महिलाओं को मंदिर में प्रवेश को लेकर बात की थी. 1991 में कोर्ट ने याचिका पर फैसला सुनाया कि महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जाएगी. 2006 में मंदिर के प्रमुख ज्योतिषी उन्नीकृष्णन ने दावा किया कि भगवान अयप्पा अपनी शक्तियां खो रहे हैं. उन्होंने संकेत दिए व आशंका जताई कि शायद किसी महिला ने मंदिर में प्रवेश किया है. इसी साल कन्नड़ अदाकार जयमाला ने दावा किया कि 1986 में वह अपने पति प्रभाकर के साथ सबरीमाला मंदिर के अंदर गई थीं और वहां धक्का लगने की वजह से गर्भगृह तक भी पहुंची थीं. जयमाला ने दावा किया कि उन्होंने भगवान की मूर्ति के पैर छुए थे और पुजारी ने उन्हें प्रसाद में फूल दिए थे. इस दावे के बाद जयमाला पर धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने का आरोप लगा. उन पर केस भी दर्ज हुआ, लेकिन मामला कोर्ट में जाने के बाद शांत हो गया. जयमाला अब कर्नाटक में महिला-बाल विकास मंत्री हैं. उन्होंने दावे के साथ ही प्रायश्चित करने की इच्छा भी जताई थी.

फिर खटखटाया गया सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा

28 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने कोर्ट के पिछले फैसले को खत्म करते हुए महिलाओं के हक में फैसला सुनाया. इस बेंच में चार जज महिलाओं को प्रवेश देने के पक्ष में थे, जबकि बेंच की इकलौती महिला जज इंदु मल्होत्रा महिलाओं को न जाने देने के पक्ष में थीं. उनका तर्क था कि धार्मिक मामलों में अदालत को दखल नहीं देना चाहिए. वहीं महिलाओं को अनुमति देने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले में कहा गया, हमारी संस्कृति में माता का सम्मानित स्थान है. यहां महिलाओं को देवी की तरह पूजा जाता है. मंदिर में उन्हें प्रवेश से रोका जाए, इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता है.

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...लेकिन महिलाओं को झेलना पड़ा भीड़ का गुस्सा

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जब 18 अक्टूबर 2018 को मंदिर के कपाट खुले, तो तमाम महिलाएं भगवान अयप्पा के दर्शन के लिए पहुंचीं. उस समय माहौल बेहद तनावभरा था, क्योंकि मंदिर का बोर्ड सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी महिलाओं को प्रवेश देने के लिए तैयार नहीं था. ऐसे में मंदिर के पास भारी पुलिसबल भी तैनात था. 18 अक्टूबर को मंदिर के रास्ते में हिंसा हुई, महिला पत्रकारों पर हमले किए गए, मीडिया की गाड़ियां तोड़ी गईं, पथराव-लाठीचार्ज हुआ और लोगों को गिरफ्तार भी किया गया. महिलाओं को मंदिर से 20 किमी पहले से रोक लिया गया था और कई महिलाओं को आधे रास्ते से लौटा दिया गया था. 2 जनवरी को दो महिलाओं बिंदु और कनकदुर्गा ने दावा किया कि उन्होंने तड़के मंदिर में भगवान के दर्शन किए. सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद से कई महिला श्रद्धालु और महिला सामाजिक कार्यकर्ता मंदिर जाने की कोशिश कर चुकी थीं, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली. इन दोनों महिलाओं के मंदिर में जाने के बाद 'मंदिर की शुद्धि' का हवाला देते हुए दरवाजे बंद कर दिए गए, जिन्हें दोपहर 12 बजे के आसपास दोबारा खोल दिया गया. केरल के मुख्यमंत्री पी. विजयन ने भी मंदिर में महिलाओं के जाने की पुष्टि की और कहा कि जो भी महिला मंदिर जाना चाहती हैं, उन्हें सुरक्षा दी जाए.