बजने लगे अलग सुर, एनसीपी नेता ने सरकार से भीमा कोरेगांव मामले में केस वापसी की मांग की

कांग्रेस-एनसीपी जैसे विरोधी विचारधारा वाले दलों के साथ शिवसेना का गठबंधन डांवाडोल की स्थिति से गुजरने लगा है. कयास थे कि कॉमन मिनिमम प्रोग्रॉम के बाद भी तीनों दलों का साझा विचार के साथ सरकार बनाना मुश्किल होगा. भीमा कोरेगांव मामले में केस वापस लिए जाने की मांग इस मतभेद की पहली किश्त की चुगली कर रहा है.

बजने लगे अलग सुर, एनसीपी नेता ने सरकार से भीमा कोरेगांव मामले में केस वापसी की मांग की

मुंबईः महीने भर की रार के बाद महाराष्ट्र विधानसभा को सरकार नसीब हुई है. उद्धव को सीएम बने चार दिन नहीं बीते हैं कि विचारधारा का टकराव सामने दिखने लगा है. एनसीपी नेता ने महाराष्ट्र के सीएम को पत्र लिखकर संबोधित किया है और उनसे भीमा कोरेगांव हिंसा के प्रदर्शनकारियों पर हुए केस वापस लेने की मांग की है. अभी तक शिवसेना इस मसले पर विरोध रुख अपनाती आई है. हालांकि तब वह सत्ता में नहीं थी और विचारधार वाली पार्टी थी. आज शिवसेना अपने मुख्यमंत्री पद के साथ सत्ता में है, जो कि तीन पायों पर टिकी है. ऐसे तीन पाए जिन पर टिकना असंभव सा है.

धनंजय मुंडे ने लिखा पत्र
महाराष्ट्र सरकार ने नाणार परियोजना और आरे जंगल काटे जाने के विरुद्ध प्रदर्शन करने वाले आंदोलनकारियों पर दर्ज मुकदमे वापस लेने के लिए मंगलवार को समिति गठित कर दी. इसी बीच वरिष्ठ एनसीपी नेता धनंजय मुंडे ने सीएम उद्धव ठाकरे को पत्र लिखकर भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में प्रदर्शनकारियों पर दर्ज केस वापस लेने की मांग की है.

मुंडे ने सीएम उद्धव ठाकरे को मराठी में पत्र लिखकर यह मांग की है. उन्होंने अपना पत्र ट्वीट करते हुए सीएम से अपील की कि वह बीजेपी सरकार के अत्याचार से पीड़ित कार्यकर्ताओं और प्रदर्शनकारियों के साथ न्याय करें. 

विधायक जितेंद्र भी कर चुके हैं मांग
मुंडे के पत्र लिखने से पहले एनसीपी के विधायक जितेंद्र अव्हाड़ ने भी सीएम ठाकरे से भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में गिरफ्तार आरोपियों को रिहा करने की मांग की थी. उन्होंने अपने ट्विटर हैंडल पर इसे लेकर ट्वीट किया था, जिसमें सीएम ठाकरे और कैबिनेट मंत्री जयंत पाटिल को टैग किया गया था. भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में गिरफ्तार आरोपियों की रिहाई का समर्थन करने वालों पर शिवसेना हमेशा से हमलावर रही है.

पार्टी के मुखपत्र सामना में कई बार ऐसे लोगों के खिलाफ तीखी टिप्पणी की जा चुकी है. ऐसे में सीएम ठाकरे के लिए एनसीपी की इस मांग पर फैसला लेने में मुश्किल जरूर हो सकती है. 

क्या है भीमा कोरेगांव मामला
पुणे के नजदीक एक जनवरी को भीमा-कोरेगांव युद्ध के 200 साल पूरा होने के मौके पर आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान दो समूहों के बीच संघर्ष में एक युवक की मौत हो गई थी और चार लोग घायल हुए थे. इस हिंसा में एक व्यक्ति की मौत हो जाने के बाद इसकी आंच महाराष्ट्र के 18 जिलों तक फैल गई. 

एक जनवरी सन 1818 में कोरेगांव में भीमा नदी के तट पर पेशवाओं और अंग्रेजों के बीच युद्ध हुआ था. जिसमें अंग्रेजों की छोटी सी टुकड़ी ने 28000 सैनिकों वाले पेशवाओं को शिकस्त दे दी थी. खास बात यह है कि यह देश का इकलौता युद्ध है जिसमें अंगेजों की जीत का जश्न मनाया जाता है. 

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