क्या अमूल्य जीवन का महत्व भूलते जा रहे हैं भारतीय?

भारत में आत्महत्या करने वालों की संख्या चिंताजनक हो गई है. ताजा आंकड़ों के मुताबिक भारत में हर घंटे 15 लोग अपना जीवन समाप्त कर रहे हैं. यह स्थिति सचमुच गंभीर है. लेकिन अच्छी बात ये है कि खुदकुशी करने वालों की संख्या में मामूली ही सही लेकिन कमी आई है. 

Last Updated : Nov 20, 2019, 07:05 PM IST
    • भारत में आत्महत्या करने वालों की संख्या चिंताजनक
    • अवसाद ले रहा है भारतीयों की जान

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क्या अमूल्य जीवन का महत्व भूलते जा रहे हैं भारतीय?

नई दिल्ली: भारतीयों में आत्महत्या की प्रवृत्ति देखी जा रही है. आधुनिक जीवन शैली और विकास की होड़ जैसी कई वजहों ने भारतीयों को अपने जीवन के प्रति निराश कर दिया है.   

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भारत में हर चार मिनट किसी एक शख्स के लिए जानलेवा साबित होता है. इन्हीं क्षणों में वह अपने हाथों से अपनी जिंदगी समाप्त कर लेता है. इस हिसाब से हर घंटे में 15 लोग खुद को मौत के मुंह में धकेल रहे हैं. ये आंकड़े साल 2016 के हैं. जो कि बेहद चिंताजनक हैं. आत्महत्या करने वालों में पुरुषों की संख्या ज्यादा(68 फीसदी) है. 
बुरा तो ये है कि दक्षिण एशिया में सबसे ज्यादा आत्महत्या करने वाले लोग भारत में ही हैं. 

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क्या है जीवन से निराशा की वजह?
आंकड़े बताते हैं कि भारतीयों की आत्महत्या की मुख्य वजहें पारिवारिक समस्याएं और बीमारी हैं. पारिवारिक समस्याओं की वजह से 29.2 फीसदी लोग मौत को गले लगा लेते हैं. जबकि 17.1 फीसदी लोग बीमारी के कारण जबकि 5.3 फीसदी लोग विवाह और दूसरे कारणों से आत्महत्या करते हैं, वहीं 4 फीसदी लोग नशीले पदार्थों के प्रभाव में आकर सुसाइड कर लेते हैं. 

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आत्महत्या के आंकड़ों में मामूली गिरावट
एनसीआरबी ने जो आंकड़े जारी किए हैं, वह साल 2016 के हैं. वर्ष 2015 के मुकाबले 2016 में आत्महत्या के मामलों में दो फीसदी की कमी आई है. साल 2015 में प्रति एक लाख आबादी पर आत्महत्या की दर 10.6 थी जो 2016 में घटकर 10.3 प्रति एक लाख पर आ गई है. लेकिन फिर भी स्थिति चिंताजनक है. क्योंकि पूरे दक्षिण-एशिया क्षेत्र में भारत में आत्महत्या की दर सबसे ज्यादा है.

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शहरों में आत्महत्या ज्यादा
गांवों की अपेक्षा शहरों के लोग जीवन से ज्यादा निराश होते हुए दिख रहे हैं. क्योंकि आंकड़े बताते हैं कि साल 2016 में खुदकुशी का राष्ट्रीय औसत 10.3 था. जबकि शहरों में खुदकुशी करने वाले लोग 13 फीसदी थे. यानी राष्ट्रीय औसत से 2.7 फीसदी ज्यादा. ये बताता है कि शहरों में जीवन की होड़ गांव से ज्यादा होने की वजह से आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ जाती है.  

दक्षिण एशिया में भारत में ज्यादा आत्महत्याएं
भारत में आत्महत्या की दर 16.5 प्रति एक लाख है. इसके बाद श्रीलंका का नंबर आता है. जहां प्रति लाख 14.6 लोग आत्महत्या करते हैं. जबकि थाईलैंड में प्रति लाख 14.4 लोग आत्महत्या करते हैं. पूरी दुनिया में हर साल लगभग आठ लाख लोग आत्महत्या कर लेते हैं. यह युद्ध में मारे गए लोगों की संख्या से भी ज्यादा है. 

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