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अयोध्या विवाद का 'सुप्रीम अंजाम'! यहां पढ़ें: कब-कब क्या हुआ? पूरा घटनाक्रम

सबसे पुराने केस में सबसे बड़ा फैसला आ चुका है, सदियों से चल रहे अयोध्या विवाद पर देश की सबसे बड़ी अदालत अपना फैसला सुना चुकी है. लेकिन इस विवाद की शुरुआत कब और कैसे हुई, कब क्या-क्या हुआ? सारी महत्वपूर्ण जानकारी इस रिपोर्ट में पढ़ें-

अयोध्या विवाद का 'सुप्रीम अंजाम'! यहां पढ़ें: कब-कब क्या हुआ? पूरा घटनाक्रम

नई दिल्ली: हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी अदालत ने आजाद भारत का सबसे बड़ा फैसला सुना दिया है. 70 साल के इंतजार के बाद आखिरकार फैसला रामलला के पक्ष में आया. यानी अब तय हो गया है कि मंदिर वहीं बनेगा. जिसे हिन्दू भगवान राम की जन्मभूमि मानते रहे हैं. 

आ गया ऐतिहासिक फैसला

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अगुवाई वाली 5 सदस्यीय पीठ ने विवादित जमीन को रामलला विराजमान के नाम करने का निर्णय किया. संविधान पीठ ने एक सुर में ये फैसला सुनाया. अब विवादित रही जमीन पर सिर्फ राम मंदिर बनेगा. मस्जिद के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड को अयोध्या में ही कहीं और 5 एकड़ की जमीन दी जाएगी. जो केंद्र और राज्य सरकार तय करेगी.

इस बीच इस फैसले की अहमियत इसलिये भी बढ़ जाती है क्योंकि ये विवाद एक-दो साल नहीं बल्कि 491 साल पुराना था. जिसका फाइनल निपटारा सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कर दिया है. अब आपका यहां ये भी जानना अहम हो जाता है कि इस विवाद की शुरुआत कब और कैसे हुई. इस मामले में कब क्या हुआ? इसके हर एक पहलू को नीचे पढ़ें-

1528: मुगल बादशाह बाबर के कमांडर मीर बाकी ने बाबरी मस्जिद का निर्माण कराया.

1885: महंत रघुबीर दास ने फैजाबाद जिला अदालत में याचिका दायर कर विवादित ढांचे के बाहर शामियाना तानने की अनुमति मांगी. अदालत ने याचिका खारिज कर दी.

1949: विवादित ढांचे के बाहर केंद्रीय गुंबद में रामलला की मूर्तियां स्थापित की गईं.

1950: रामलला की मूर्तियों की पूजा का अधिकार हासिल करने के लिए गोपाल सिंह विशारद ने फैजाबाद जिला अदालत में याचिका दायर की.

1950: परमहंस रामचंद्र दास ने पूजा जारी रखने और मूर्तियां रखने के लिए याचिका दायर की.

1959: निर्मोही अखाड़ा ने जमीन पर अधिकार दिए जाने के लिए याचिका दायर की.

दिसंबर 1961: उत्तरप्रदेश सुन्नी केंद्रीय वक्फ बोर्ड ने स्थल पर अधिकार के लिए याचिका दायर की.

1984: विश्व हिंदू परिषद ने बाबरी मस्जिद के ताले खोलने और राम जन्मभूमि को आजात कराने के साथ-साथ एक विशाल मंदिर के बनवाने के लिए बड़ा अभियान शुरू किया.

1 फरवरी 1986: फैजाबाद स्थानीय अदालत ने विवादित स्थल पर हिदुओं को पूजा की इजाजत दे दी. दोबारा ताले खोले दिये गए. जिससे नाराज मुस्लिमों ने विरोध में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का गठन किया.

जून 1989: भारतीय जनता पार्टी ने वीएचपी को समर्थन देकर मंदिर आंदोलन को नया रूप दे दिया.

1 जुलाई 1989: भगवान रामलला विराजमान नाम से पांचवा मुकदमा दाखिल हुआ.

25 सितंबर 1990: भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी ने गुजरात के सोमनाथ से उत्तर प्रदेश के अयोध्या तक रथ यात्रा निकाली, जिसके बाद साम्प्रदायिक दंगे हुए.

नवंबर 1990: लालकृष्ण आडवाणी को बिहार के समस्तीपुर में गिरफ्तार कर लिया गया. जिसके बाद बीजेपी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह की सरकार से समर्थन वापस ले लिया.

अक्टूबर 1991: उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह सरकार ने बाबरी मस्जिद के आस-पास की 2.77 एकड़ जमीन को अपने कब्जे में ले लिया.

6 दिसंबर 1992: हजारों की संख्या में कारसेवकों ने अयोध्या पहुंचकर बाबरी मस्जिद ढाह दिया. जिसके बाद सांप्रदायिक दंगे हुए. और जल्दबाजी में एक अस्थायी राम मंदिर बनाया गया.

16 दिसंबर 1992: मस्जिद की तोड़-फोड़ की जिम्मेदार स्थितियों की जांच के लिए लिब्रहान आयोग का गठन हुआ.

3 अप्रैल 1993: विवादित स्थल में जमीन अधिग्रहण के लिए केंद्र ने ‘अयोध्या में निश्चित क्षेत्र अधिग्रहण कानून’ पारित किया. अधिनियम के विभिन्न पहलुओं को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में कई रिट याचिकाएं दायर की गईं. इनमें इस्माइल फारूकी की याचिका भी शामिल. उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 139ए के तहत अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर रिट याचिकाओं को स्थानांतरित कर दिया जो उच्च न्यायालय में लंबित थीं.

जनवरी 2002: तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने कार्यालय में एक अयोध्या विभाग शुरू किया, जिसका काम विवाद को सुलझाने के लिए हिंदुओं और मुसलमानों से बातचीत करना था.

अप्रैल 2002: अयोध्या के विवादित स्थल पर मालिकाना हक को लेकर उच्च न्यायालय के तीन जजों की पीठ ने सुनवाई शुरू की गई.

मार्च-अगस्त 2003: इलाहबाद उच्च न्यायालय के निर्देशों पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने अयोध्या में खुदाई की. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का दावा था कि मस्जिद के नीचे मंदिर के अवशेष होने के प्रमाण मिले हैं.

जुलाई 2009: लिब्रहान आयोग ने गठन के 17 साल बाद उस वक्त के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपनी रिपोर्ट सौंपी.

28 सितंबर 2010: सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहबाद उच्च न्यायालय को विवादित मामले में फैसला देने से रोकने वाली याचिका खारिज करते हुए फैसले का रास्ता साफ किया.

30 सितंबर 2010: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 2:1 बहुमत से विवादित क्षेत्र को सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला के बीच तीन हिस्सों में बांटने का आदेश दिया. इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने विवादित जमीन को तीन हिस्सों में बांटा जिसमें एक हिस्सा राम मंदिर, दूसरा सुन्नी वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़े में जमीन बंटी.

9 मई 2011: उच्चतम न्यायालय ने अयोध्या जमीन विवाद में उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगाई.

26 फरवरी 2016: सुब्रमण्यम स्वामी ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर विवादित स्थल पर राम मंदिर बनाए जाने की मांग की.

जुलाई 2016: बाबरी मामले के सबसे उम्रदराज वादी हाशिम अंसारी का निधन हो गया.

21 मार्च 2017: CJI जे एस खेहर ने संबंधित पक्षों के बीच अदालत के बाहर समाधान का सुझाव दिया

19 अप्रैल 2017: सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद गिराए जाने के मामले में लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती सहित बीजेपी और आरएसएस के कई नेताओं के खिलाफ आपराधिक केस चलाने का आदेश दिया.

7 अगस्त 2017: उच्चतम न्यायालय ने तीन सदस्यीय पीठ का गठन किया जो 1994 के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करेगी.

8 अगस्त 2017: उत्तर प्रदेश शिया केंद्रीय वक्फ बोर्ड ने उच्चतम न्यायालय से कहा कि विवादित स्थल से उचित दूरी पर मुस्लिम बहुल इलाके में मस्जिद बनाई जा सकती है.

8 फरवरी 2018: सिविल याचिकाओं पर उच्चतम न्यायालय ने सुनवाई शुरू की.

14 मार्च 2018: सुप्रीम कोर्ट ने स्वामी की याचिका सहित सभी अंतरिम याचिकाओं को खारिज किया.

6 अप्रैल 2018: राजीव धवन ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर 1994 के फैसले की टिप्पणियों पर पुनर्विचार के मुद्दे को बड़े पीठ के पास भेजने का आग्रह किया.

6 जुलाई 2018: यूपी सरकार ने उच्चतम न्यायालय में कहा कि कुछ मुस्लिम समूह 1994 के फैसले की टिप्पणियों पर पुनर्विचार की मांग कर सुनवाई में विलंब करना चाहते हैं.

20 जुलाई 2018: उच्चतम न्यायालय ने फैसला सुरक्षित रखा.

29 अक्टूबर 2018: उच्चतम न्यायालय ने मामले की सुनवाई उचित पीठ के समक्ष जनवरी के पहले हफ्ते में तय की जो सुनवाई के समय पर निर्णय करेगी.

4 जनवरी 2019: उच्चतम न्यायालय ने कहा कि मालिकाना हक मामले में सुनवाई की तारीख तय करने के लिए उसके द्वारा गठित उपयुक्त पीठ दस जनवरी को फैसला सुनाएगी.

8 जनवरी 2019: उच्चतम न्यायालय ने मामले की सुनवाई के लिए पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ का गठन किया जिसकी अध्यक्षता प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई करेंगे और इसमें न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति एन वी रमन्ना, न्यायमूर्ति यू यू ललित और न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ शामिल होंगे.

10 जनवरी 2019: न्यायमूर्ति यू यू ललित ने मामले से खुद को अलग किया जिसके बाद उच्चतम न्यायालय ने मामले की सुनवाई 29 जनवरी को नयी पीठ के समक्ष तय की.

25 जनवरी 2019: उच्चतम न्यायालय ने मामले की सुनवाई के लिए पांच सदस्यीय संविधान पीठ का पुनर्गठन किया. नई पीठ में प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस ए नजीर शामिल थे.

26 फरवरी 2019: उच्चतम न्यायालय ने मध्यस्थता का सुझाव दिया और फैसले के लिए पांच मार्च की तारीख तय की जिसमें मामले को अदालत की तरफ से नियुक्त मध्यस्थ के पास भेजा जाए अथवा नहीं इस पर फैसला लिया जाएगा.

8 मार्च 2019: उच्चतम न्यायालय ने मध्यस्थता के लिए विवाद को एक समिति के पास भेज दिया जिसके अध्यक्ष उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश एफ एम आई कलीफुल्ला बनाए गए.

9 अप्रैल 2019: निर्मोही अखाड़े ने अयोध्या स्थल के आसपास की अधिग्रहीत जमीन को मालिकों को लौटाने की केन्द्र की याचिका का उच्चतम न्यायालय में विरोध किया.

10 मई 2019: मध्यस्थता प्रक्रिया को पूरा करने के लिए उच्चतम न्यायालय ने 15 अगस्त तक समय बढ़ाई.

11 जुलाई 2019: उच्चतम न्यायालय ने “मध्यस्थता की प्रगति” पर रिपोर्ट मांगी.

18 जुलाई 2019: उच्चतम न्यायालय ने मध्यस्थता प्रक्रिया को जारी रखने की अनुमति देते हुए एक अगस्त तक परिणाम रिपोर्ट देने के लिये कहा.

1 अगस्त 2019: मध्यस्थता की रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में अदालत को दी गई.

2 अगस्त 2019: उच्चतम न्यायालय ने मध्यस्थता नाकाम होने पर छह अगस्त से रोजाना सुनवाई का फैसला किया.

6 अगस्त 2019: उच्चतम न्यायालय ने रोजाना के आधार पर भूमि विवाद पर सुनवाई शुरू की.

4 अक्टूबर 2019: अदालत ने कहा कि 17 अक्टूबर तक सुनवाई पूरी कर फैसला 17 नवंबर से पहले सुनाया जाएगा.

16 अक्टूबर 2019: उच्चतम न्यायालय ने सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रखा.

9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया. 1045 पेज का ये फैसला देश के न्यायिक इतिहास में इसे नजीर के तौर पर देखा जाएगा. इस फैसले से देश में सद्भाव के एक नए दौर की शुरूआत होगी. अदालत अपने फैसले में ने कहा कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की पड़ताल को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, इससे साबित होता है कि नष्ट किए गए ढांचे के नीचे मंदिर था.