सरोगेसी बिल पेश, तो क्यों हुआ सदन में इसका विरोध

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन ने राज्य सभा में सरोगेसी (रेगुलेशन) बिल पेश किया.केंद्रीय मंत्री ने कहा कि विधेयक का मूल उद्देश्य  व्यावसायिक सरोगेसी यानी पैसों के लिए कोख को किराए पर देने से रोकना है. हालांकि बिल के कई प्रावधानों पर विरोध जताया गया है.

सरोगेसी बिल पेश, तो क्यों हुआ सदन में इसका विरोध

नई दिल्लीः केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन ने राज्य सभा में सरोगेसी (रेगुलेशन) बिल पेश किया. यह बिल लोकसभा के मानसून सत्र में तो पास हो चुका है, लेकिन इसे अमल में लाने के लिए राज्यसभा से पास कराना जरूरी है. सदन में इसके पेश होते ही हंगामा शुरू हो गया. डॉ हर्षवर्धन ने बताया कि इस बिल का पास होने क्यों जरूरी है. लेकिन राज्यसभा में पास होने पर इस पर बहस शुरू हुई और कुछ बदलाव भी सुझाए गए. केंद्रीय मंत्री ने कहा कि विधेयक का मूल उद्देश्य  व्यावसायिक सरोगेसी यानी पैसों के लिए कोख को किराए पर देने से रोकना है. बिल पर बहस बिना किसी निर्णय के खत्म हुई, लेकिन इसमें उठाए गए मुद्दों पर नजर डालते हैं. 

सबसे पहले. सरोगेसी को समझना है जरूरी
सरोगेसी एक व्यवस्था है, जिसके तहत कोई दंपती बच्चे के जन्म के लिए गर्भधारण के लिए किसी अन्य महिला पर निर्भर होते हैं. बच्चे पैदा करने के लिए दंपती किसी महिला की कोख किराए पर लेता है. इसकी कई वजहें हो सकती हैं. जैसे कि अगर कपल बच्चे पैदा करने में अक्षम है, या फिर महिला को जान का खतरा हो बच्चे पैदा करने में.

जो औरत अपनी कोख में दूसरों का बच्चा पालती, वो सरोगेट मदर कहलाती है. विदेशों में ऐसे कई मामले हैं, लेकिन भारत में अचानक इस तरह के मामलों में काफी वृद्धि हुई है. इस तरह यह यहां भावनात्मक तौर के बजाय व्यवसाय की तरह विकसित हो रहा है.

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क्या है सरोगेसी रेगुलेशन बिल में 
स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने जो इस मुद्दे से जुड़ा बिल पेश किया है, उसमें प्रमुखता से परोपकारी कारणों से की गई सरोगेसी की इजाजत है, जिसमें चिकित्सा और बीमा के खर्च के अलावा किसी किस्म के पैसों की लेन देन शामिल न हो, ऐसे मामलों में सरोगेट मां जिन्हें बच्चा देगी वो उसके करीबी रिश्तेदार होने चाहिए. इसके अलावा भी उन्होंने कुछ बिंदुओं पर ध्यान दिलाया है, जो कि उनके अनुसार जरूरी है. सरोगेट मां और बच्चे के होने वाले माता पिता के लिए कुछ शर्तें रखी गई हैं. 

  • जिला स्तर पर गठित बोर्ड से माता या पिता या दोनों की इनफर्टिलिटी का प्रमाण पत्र, बच्चे की कस्टडी और माता पिता के बारे में जानकारी देता मजिस्ट्रेट की अदालत से जारी किया हुआ निर्देश
  • सरोगेट मां के लिए 16 महीनों का बीमा जिससे कि प्रसव के बाद की परेशानी के इलाज का भी खर्च निकल सके. 
  • दंपती भारतीय नागरिक होना चाहिए और पांच साल से विवाहित
  • महिला 23 से 50 वर्ष की आयु की और पुरुष 26 से 55 वर्ष की आयु का हो और उनका कोई भी अपना, गोद लिया हुआ या सरोगेट बच्चा न हो
  • अगर बच्चा है और वह किसी तौर पर विकलांग है, या बीमार है, तो यह प्रतिबंध के दायरे में नहीं आता. ऐसे बच्चे के माता पिता को सरोगेसी की अनुमति मिल सकती है. 
  • सरोगेट मां दंपती की करीबी रिश्तेदार, विवाहित और उनका अपना एक बच्चा भी होना चाहिए.
  • सरोगेट मां 25 से 35 वर्ष की उम्र की होनी चाहिए.
  • अपने जीवनकाल में सिर्फ एक बार सरोगेट मां बनने की शर्त भी है.
  • सरोगट मां के पास उनके मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ होने का प्रमाण पत्र भी होना चाहिए. 
  • सरोगेट मां पर यह प्रतिबंध भी होगा कि वो सरोगसी के लिए अपना गैमीट नहीं दे सकतीं हैं. 

  • विधेयक में सरोगसी के लिए विशेष चिकित्सालयों का प्रावधान है जिन्हे सरोगसी के विनियमन के लिए नियुक्त किए गए अधिकारी या प्राधिकरण के साथ अपना पंजीकरण कराना होगा. 
  • केंद्र सरकार और राज्य सरकारें राष्ट्रीय सरोगेसी बोर्ड और राज्य सरोगेसी बोर्ड बनाएंगी. 
  • सरोगेसी से पैदा हुए बच्चे को दंपती की जैविक संतान माना जाएगा. उसके गर्भपात के लिए सरोगेट मां की लिखित अनुमति और अधिकारी से अधिकार-पत्र अनिवार्य होगा. 
  • कोख में भ्रूण के डाले जाने से पहले तक सरोगेट मां के पास न कहने का विकल्प रहेगा.
  • सरोगेट मां का किसी भी तरह का शोषण जुर्म होगा. सरोगेट बच्चे को छोड़ देना या उसका शोषण करना भी जुर्म होगा. 
  • भ्रूण या गैमीट को सरोगेसी के लिए बेचना भी जुर्म होगा. ऐसे अपराधों के लिए 10 साल तक की जेल और 10 लाख रुपये जुर्माने का प्रावधान है. 

इसलिए हो रहा है विधेयक का विरोध 
इस बिल में कई तरह के जो संशोधन या नियंत्रण के लिए प्रावधान सुझाए गए हैं, उनको लेकर विरोध है. दंपती के विवाहित होने की शर्त की वजह से विधवाएं, तलाकशुदा लोग, सिंगल मां-बाप, लिव इन में रहने वाले लोग और समलैंगिक दंपती सरोगेसी का रास्ता नहीं अपना सकेंगे. करीबी रिश्तेदार होने की अनिवार्यता का गलत इस्तेमाल हो सकता है. घर की किसी महिला को जबरदस्ती राजी कराया जा सकता है. एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि इस से भविष्य में परिवार के अंदर संपत्ति के उत्तराधिकार को लेकर विवाद भी हो सकते हैं. इतना ही नहीं इनफर्टिलिटी के अलावा भी सरोगेसी के और कारण हो सकते हैं, जिन्हें नजरअंदाज कर दिया गया है. फिलहाल बिल को स्टैंडिंग कमेटी के पास सुझाव व जरूरी सुधार के लिए भेजा गया है.

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