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घाटी का हालः फल-फूल रहा आतंकवाद,सड़ रहे सेब

अनुच्छेद 370 में बदलाव के बाद केंद्र सरकार तो घाटी के हालात सामान्य करने की कोशिश में जुटी है, लेकिन इस फैसले से बौखलाए आतंकवादियों का विरोध घाटी में सामान्य दिनों की बहाली नहीं होने दे रहा है. इसका सबसे बड़ा असर यहां की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है जिसकी रीढ़ सेब के बगान हुआ करते हैं. हालात यह हैं कि इलाके से सेब बाहर नहीं जा पा रहे हैं और 11,000 करोड़ रुपये का यह निर्यात यूं ही बगानों में सड़ रहा है. सिर्फ इसलिए क्योंकि घाटी लहू से लाल है.

घाटी का हालः फल-फूल रहा आतंकवाद,सड़ रहे सेब

श्रीनगरः 370 पर लिए गए फैसले के बाद घाटी को विरोध का सामना करना पड़ रहा है. आतंकवादियों का एक समूह विरोध का जो तरीका अपना रहा है वह आम कश्मीरियों को परेशान करने वाला है और उन्हें सामान्य-शांत दिनों में लौटने से रोकने वाला है. यह विरोध इतना घातक है कि कश्मीर के जिन बगानों में सेब तोड़ने के दौरान गाए जाने वाले गीत गूंजने चाहिेए थे वह आज सुनसान पड़े हैं. पेड़ों पर लदे सेब सड़ कर गिर रहे हैं और इसे उगाने वाले सूनी आंखों से केवल बरबादी के इस मंजर को देख रहे हैं. वे चुप हैं और पूछने पर कहते हैं कि यह कुछ और नहीं केवल उनके पेट के खिलाफ छेड़ी गई शांत जंग है.

पेट के खिलाफ छेड़ी गई शांत जंग, सेब उगाने वाले एक कश्मीरी की इस बात में छिपे दर्द को समझना आसान नहीं है. इसे समझने के लिए हमें तकरीबन तीन महीने पहले की उस तारीख तक जाना होगा, जिस रोज केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 में बदलाव किया था और कश्मीरियों के अधिकारों की बात करते हुए इसके जरिये मुख्य धारा से जोड़े जाने की कोशिश में सार्थक कदम उठाया था. सरकार का यह कदम आतंकवादियों को इस कदर नागवार गुजरा कि उन्होंने पूरे कश्मीर में इसके खिलाफ एक तरीके का विरोध करना शुरू कर दिया, विरोध भी ऐसा जिसमें खून आम कश्मीरियों का बहाया जाता है और बड़ी ही चालाकी से इसका ठीकरा सरकार के मत्थे मढ़ा जाता है. 

1200 अमेरिकी डॉलर की बरबादी
श्रीनगर से 60 किलोमीटर दूर एक छोटा सा गांव है वुयान. रंग-बिरंगे सेबों से गुलजार रहने वाला यह गांव कभी बेहद खुशहाल था. मशहूर इसिलए क्योंकि यहां के सेब विदेशियों के खाने की मेज पर बड़े चाव से सजाए जाते रहे हैं. यहां के रहने वाले व्यापारी एक गड्ढे की ओर इशारा करते हैं, जो कि सड़े हुए सेबों से अटा पड़ा है. उन्होंने बताया कि इनकी कीमत लगभग 1200 अमेरिकी डॉलर थी, लेकिन अब सब बेकार है. आतंकवादी सेब तोड़ने वालों, उनका व्यापार करने वालों, उन्हें दूसरे इलाकों में ले जाने वालों पर ऐसा न करने के लिए लगातार दबाव बनाए हुए हैं. यह दबाव सिर्फ भारत सरकार की ओर से हाल ही में उठाए गए कदम के विरोध में बनाया जा रहा है. 

सेब व्यापारियों की जान पर बनी हुई है


अगर कोई हिम्मत कर बचे-खुचे सेबों को इधर-उधर भेजने की कोशिश करता है तो उन्हें आतंकवादियों की गोली का शिकार होना पड़ता है. रिपोर्ट के अनुसार बीते मंगलवार को एक ट्रक चालक ने बगान से सेब की 800 पेटियां उठाईं थीं, कुछ देर बाद उस पर हमला कर उसे गोली मार दी गई. मामले में पुलिस ने दो लोगों को गिरफ्तार किया था. इसी तरह बुधवार रात दक्षिण शोपियां इलाके में भी आतंकवादियों ने हमलाकर एक सेब व्यापारी को गोली मार दी और एक अन्य को भी घायल कर दिया. पुलिस के अनुसार ईंट भट्ठे पर काम करने वाली एक प्रवासी मजदूर को भी गोली मारी गई थी. 
अपनी प्राकृतिक सुंदरता, झीलों पर तैरने वाले शिकारे और लाल-लाल सेबों से लदे बगानों के लिए मशहूर कश्मीर पर्यटकों को लुभाता रहा है और उनके आकर्षण का केंद्र रहा है. लेकिन पिछले 30 से 40 सालों में जारी सशस्त्र विद्रोह ने इसकी खूबसूरत छवि को काफी नुकसान पहुंचाया है. 370 हटाने के कुछ दिनों बाद लैंडलाइन व मोबाइल सेवाएं बहाल कर दी गईं, लेकिन आतंकवादी 370 पर भारत सरकार के रुख से इस तरह बौखलाए हुए हैं कि विरोध जताने के लिए कश्मीरियों का ही इस्तेमाल कर रहे हैं.  नतीजा, बागानों से सेब चुनने वाले नदारद हैं और फल पक-पक कर जमीन पर गिर रहे हैं. सेबों का व्यापार, जिनका 2017 में निर्यात का मूल्य 11,000 करोड़ रुपये से भी अधिक था, कश्मीर की अर्थव्यवस्था के पांचवे हिस्से के बराबर है और करीब 30 लाख लोगों को रोजगार देता है. इस साल 6 अक्टूबर तक 10 प्रतिशत से भी कम तोड़े गए सेब इलाके से बाहर जा पाए थे. 

मजदूरों को भी नहीं मिल रहा काम
श्रीनगर में सेब उगाने वालों की एक यूनियन के मुखिया का कहना है, "हमें इस झटके से उबरने में सालों लग जाएंगे". सरकार ने सेब उद्योग को सहारा देने के लिए 4 थोक बाजार भी लगाए थे लेकिन 6 अक्टूबर तक उन बाजारों में सिर्फ 2 करोड़ रुपये के आसपास के सेब खरीदे गए थे, जबकि पूरी फसल के मूल्य को 13,000 करोड़ रुपये के आस-पास आंका गया था. परिमपोरा में भी सेब उद्योग को राहत पहुंचाने के लिए एक थोक बाजार लगाया गया था. यहां के सरकारी अधिकारी ने बताया कि इस जगह से कश्मीर के बाहर सिर्फ दो ट्रक भेजे जा सके हैं, इसकी बड़ी वजह यह है कि आतंकवादियों के डर से कोई भी ट्रक चालक जोखिम लेने के लिए तैयार नहीं हो रहा है.  इसी तरह 22 साल के एक मजदूर का कहना है कि हमें लगभग 45 दिनों तक काम मिलने की उम्मीद थी. लेकिन बगानों में कोई काम करा ही नहीं रहा है. इससे सिर्फ 5 दिन का ही काम मिला है. हमारे लिए सबसे अधिक परेशानी है.