भोपाल गैस त्रासदी: अब भी मौजूद है हजारों जानें लेने वाला रासायनिक कचरा

2 दिसंबर 1984 की रात जिसकी सुबह भोपाल के लोग नहीं देख पाए. आज से ठीक 35 साल पहले देश की सबसे दहशतगर्द घटनाओं में से एक भोपाल गैस त्रासदी की मनहूस सुबह हुई थी. यह वह सुबह जिसने एक शांत पर काली रात देखी थी, ऐसी रात जिसमें हजारों लोग काल की गाल में समा गए और ऐसी रात जिसने पीढ़ियों तक को विकलांगता के कगार तक ला छोड़ा. 

भोपाल गैस त्रासदी: अब भी मौजूद है हजारों जानें लेने वाला रासायनिक कचरा

नई दिल्ली: 1984 का वह साल जो भारतीय इतिहास के मनहूस सालों में से एक रहा है. उस साल जो घटनाएं हुईं, उसका असर आज तक की पीढ़ी सहती आ रही है. 1984 का सिख दंगा, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या और उसी साल भोपाल गैस त्रासदी जिससे तकरीबन 50 हजार लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हुए. भोपाल गैस त्रासदी एक ऐसी घटना है जिसने हवाओं में जहर घोलकर अगली सुबह जगने वाले लोगों को या तो हमेशा के लिए सुला दिया या उन्हें हमेशा के लिेए धीमा बना दिया. 

रविवार के बाद सोमवार को नहीं देख पाए हजारों मासूम

रविवार का दिन था. अगली सुबह कामगर लोग काम के लिए निकलने को जल्द सोने लगे थे. बच्चे स्कूल जाने की तैयारी में जल्दी सुला दिए गए थे. लेकिन किसे पता था कि जिन बच्चों को फिलहाल जबरदस्ती सुलाया जा रहा है, वह अगली सुबह जबरदस्ती जगाए जाने पर भी नहीं जगेंगे. जैसे ही लोग सोने लगे, उन्हें अचानक ही सांस लेने में परेशानी होने लगी. एक पल को तो कईयों को समझ ही नहीं आ रहा था कि यह उनके साथ हो क्या रहा है? आंखों के जलने के बाद कुछ देर बाद घर में सो रहे लोगों को भीड़ की भागती-गिरती हुई शोर-शराबे की आवाजें सुनाई देने लगी. गिरते हुए लोगों को देख कर यह समझ आ गया था कि यह कोई न दिखाई देने वाला काल है जो हवाओं में ही घुल गया और नाक के जरिए सांस लेते ही खात्मा कर दे रहा है.

अब तक ठिकाने नहीं लगाया गया कचरा

दिलचस्प बात यह है कि अब तक कार्बाइड कंपनी के परिसर में पड़े कचरे को नी ही ठिकाने लगाया गया और ना उसे नष्ट ही किया गया है. सरकारें आती रही लेकिन किसी का ध्यान उस कचरे के निपटारे पर नहीं गया. हालांकि, मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 350 मीट्रिक टन के उस कचरे को निपटाने के लिए गुजरात सरकार से बात की थी.

गुजरात के अंकलेश्वर में उस कचरे को ठिकाने लगाने का मसौदा तैयार तो किया गया, लेकिन गुजरात के लोगों ने इस कचरे को राज्य में लाए जाने की जानकारी मिलते ही आंदोलन करना शुरू कर दिया. जिसके बाद राज्य सरकार ने हाथ खींच लिए. मध्यप्रदेश सरकार ने इसके बाद कचरे को जलाने की तैयारी शुरू की और तकरीबन 40 मीट्रिक टन कचरा जला भी दिया गया. फिर एक बार राज्य में आंदोलन के बाद सरकार ने अपने फैसले से हाथ बाहर खींच लेना ही बेहतर समझा. 

बीमारियों का घर बन गया है यह मलबा

प्रदेश सरकार बार-बार राज्यों से और सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाती रही कि आखिर इस कचरे को कैसे निपटाया जाए लेकिन कोई भी मसौदा तैयार न हो पाया. महाराष्ट्र के नागपुर में भी इस कचरे को जलाने की बात कही गई थी लेकिन इसके ऊपर भी कुछ बात नहीं बन पाई. नतीजा यह कि उतना बड़ा कचरा आज तक यूं ही उसी परिसर में पड़ा हुआ सड़ रहा है. अब उसकी वजह से जो बीमारियां हो रही हैं सो अलग.  

मिथाइल आइसो सायनाइट सूंघने से मारे गए लोग

यह जहरीली गैस जो भोपाल के लोगों के लिेए काल बनी, उसका नाम था मिथाइल आइसो सायनाइट. यह ऐसी गैस है जो हवा और पानी के संपर्क में आते हीं कुछ ऐसी जहरीली गैस बन जाती है जिससे मौत होती है या शरीर का आंतरिक भाग ही पंगु हो जाता है. अब यह जहरीली गैस निकली कहां से? 

दरअसल, शीतयुद्ध का वह दौर जिससे भारत तो अछूता था लेकिन अमेरिकी सहयोग भारत को मिलनी शुरू हो चुकी थी. भारत ने अमेरिकी सहयोग से 1977 में भोपाल में एक यूनियन कार्बाइड का एक कारखाना शुरू कर दिया था. इसमें भारत सरकार और अमेरिकी सरकार की हिस्सेदारी थी. इस फैक्टरी में सेविन नाम का कीटनाशक बनाया जाता था. प्रति साल कंपनी 2500 टन सेविन का उत्पादन करती थी, लेकिन कंपनी को इस बात की चिंता सताई जा रही थी कि कंपनी की क्षमता तो 5000 टन की है तो आखिर इसका उत्पादन बढ़ाया कैसे जाए?

बिक्री बढ़ाने के लिए कंपनी ने तरीका खोज निकाला. स्टाफ कम किेए और कलपूर्जे जिसे मशीन का पार्ट्स कहते हैं, उसकी लागत कम कर दी गई. मिथाइल आइसो सायनाइट का पानी के साथ रिएक्शन होने के बाद भारी मात्रा में हवा में जहर घुलने लगा था. और यहीं गैस लोगों की सांसों तक पहुंचने लग गई. मालूम हो कि रसायन शास्त्र की भाषा में मिथाइल आइसो सायनाइट बेहद जहरीली गैस है, जिसने भोपाल के लोगों की भूगोल, समाज, इतिहास और यहां तक की भविष्य भी खराब कर डाली.  

आजाद मियां के तरीको से जानें तो बचीं लेकिन विकलांगता नहीं

भोपाल में उस वक्त तक तकरीबन पांच लाख लोग इस घटना की चपेट में आ गए थे. फैक्ट्री में काम कर रहे कुछ लोगों को यह बताया गया था कि कभी प्लांट में लीकेज हो या गैस का रिसाव होने लग जाए तो हवा की ऊल्टी दिशा में भागना है और कुछ दूर जा कर गीले कपड़े कर जमीन पर औंधे मुंह यानी ऊल्टे ही लेट जाना है.

आजाद मियां जो उस फैक्ट्री के एक कामगर थे, गैसों का रिसाव होने के बाद अपने आस-पड़ोस में जितने लोगों को इस तरीके के बारे में बता सकते थे, उन्होंने बताया. लेकिन जो लोग मरने से बच गए, वे या तो विकलांगता की स्थिति में आ पहुंचे या हमेशा के लिए किसी न किसी तरह से पंगु हो गए. 

अस्पताल भागे लोगों को न ही दवा मिली ना इलाज हुआ

सबसे बड़ी विडंबना वाली बात यह थी कि उस वक्त तक भोपाल में केवल दो ही अस्पताल थे. रात के वक्त उस अस्पताल में सिर्फ जूनियर डॉक्टर ही थे. लोगों का इतना बड़ा हुजूम अस्पताल की ओर भागा था और अस्पताल की हालत ये कि न रखने को बिस्तर थे और न देने को दवाई. यहां तक की त्रासदी की वजह से डॉक्टर भी शहर छोड़कर भाग गए थे. खैर डॉक्टर तो फिर भी उन्हीं लोगों में से एक थे जो परेशान थे, लेकिन राज्य के मुखिया मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह को उनके आवास से हटा कर दूर एक गेस्ट हाउस में रखा गया.

रात के बाद का मंजर कुछ ऐसा कि लगा कितनी बड़ी आपदा आई हो  और एक साथ सबकुछ तबाह कर ले गई हो. हजारों की संख्या में लोगों की लाशें पड़ी हुई थी. न सिर्फ लोग बल्कि लाखों की संख्या में पशु-पक्षी यूं ही जमीन पर किसी बेबस लाचार की तरह पड़े हुए थे. 

यह मंजर कुछ ऐसा था जिसे नजदीक से देखने वाले लोग कहते हीं फूट पड़ते हैं. खैर, अब तक इस घटना के पीछे के मुख्य आरोपी वारेन एंडरसन जो अमेरिका भाग गए थे और वहीं पर दम तोड़ दिया, उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो पाई. 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने आखिरकार एक याचिका की सुनवाई में यह राज खोला कि त्रासदी में तकरीबन 15,274 लोग मौत की नींद सो गए थे, और तकरीबन 5,74,000 लोग बीमार हो गए थे. अदालत ने मरे हुए लोगों को 10 लाख और बीमारों को 50,000 रुपए देने का फैसला सुनाया था. हालांकि, यह पता नहीं कितने लोगों को मिल पाया है.