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गांधी परिवार के दो वफादार, भाजपा में जाने के लिए हैं बेकरार! जानिए वजह

गांधी परिवार के सबसे वफादार दो कांग्रेसी योद्धाओं ने पार्टी से कन्नी काटने का लगभग मूड बना लिया है. पहले नंबर पर रजवाड़े खनदान से ताल्लुक रखने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम है. जबकि, संजय निरुपम के हाव-भाव से भी कुछ ऐसे ही संकेत मिल रहे हैं.

गांधी परिवार के दो वफादार, भाजपा में जाने के लिए हैं बेकरार! जानिए वजह

नई दिल्ली: कांग्रेस पार्टी के दो अहम सिपाही आजकल अलग ही मूड में नजर आ रहे हैं. हालात की जुबानी, असल कहानी कुछ ऐसी ही बयां होती दिखाई दे रही है. ज्योतिरादित्य सिंधिया और संजय निरुपम वे दो बड़े नाम हैं, जिनका पार्टी में जबरदस्त बोलबाला हुआ करता था. लेकिन एक के बाद एक दोनों को पीछे ढ़केलने का सिलसिला शुरू हो गया. जिसके बाद से ही एक नहीं, दो नहीं बल्कि बारम्बार इन नेताओं ने अपनी पार्टी को ही हाशिए पर रखना शुरू कर दिया.

आज के हालात ऐसे बन चुके हैं कि दोनों ही नेताओं ने पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है. आपको एक-एक करके इसके पीछे की सारी वजह बताते हैं और इसके सियासी मायने भी समझाते हैं.

क्यों बदले सिंधिया के सुर?

बात साल 2018 के दिसंबर महीने की है. जब पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए और इसमें से 3 प्रदेश में कांग्रेस को जीत का स्वाद चखने को नसीब हुआ. इसमें सबसे अहम मध्यप्रदेश की जीत थी. जहां, पिछली तीन बार से शिवराज सिंह चौहान का जबरदस्त दबदबा हुआ करता था. इस बार भी शिवराज की छवि में ज्यादा गिरावट नहीं आई. चुनावी मतगणना के वक्त भाजपा और कांग्रेस के बीच जबरदस्त टक्कर देखने को मिली. रूझनों में कभी भाजपा आगे बढ़ती रही तो कभी कांग्रेस... 10 सीटों पर बादस्तूर कशमकश का लंबा दौर चलता रहा. और फिर कांग्रेस पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में आ गई. लेकिन मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर कांग्रेस पार्टी में लंबा संघर्ष चला. कोई कमलनाथ को बतौर सीएम देखना चाहता था, तो कोई ज्योतिरादित्य सिंधिया के राजतिलक का ख्वाब सजाए बैठा था. मुलाकात, बैठक और बातचीत का सिलसिला चलता रहा. लेकिन, इसी बीच तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने एक ट्वीट किया जिसमें वो बीच में खड़े थे. एक तरफ सिंधिया तो दूसरी तरफ कमलनाथ... तस्वीर में दोनों ही नेता के चेहरे पर मुस्कान थी. 

मुस्कान की चमकान का बखान

इस मुस्कान की चमकान से इस बात का हर किसी को अंदाजा हो चुका था कि कमलनाथ का पलड़ा ज्यादा भारी है. सिंधिया मुस्कुराने की कोशिश तो कर रहे थे. लेकिन उनके चेहरे पर कहीं न कहीं थोड़ी सी सिकन थी. लेकिन राहुल ने संशय बरकरार रखा था. अगले दिन प्रेस कॉन्फ्रेंस में कमलनाथ और सिंधिया दोनों पहुंचते हैं. लेकिन सिंधिया के हाव-भाव से हर किसी ने भाप लिया था कि सूबे की बागडोर उनके हाथों में नहीं सौंपी जाएगी. कुछ मिनटों बाद इसकी आधिकारिक पुष्टि भी कर दी गई. और राहुल गांधी के सबसे करीब माने जाने वाले नेता को दरकिनार करने का पहला पन्ना लिख दिया गया. ये सिलसिला शुरू हुआ तो रुकने का नाम नहीं लिया.

प्रदेश अध्यक्ष की मांग नजरअंदाज

इसके बाद से ही सिंधिया के चाहने वालों ने उन्हें प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपने की मांग शुरू कर दी. लेकिन पार्टी आलाकमान ने इसे नजरअंदाज करना शुरू कर दिया. समर्थकों ने पोस्टर लगवा कर मांग की, लेकिन सिंधिया को सूबे में कांग्रेस की कमान मिलने के आसार भी नहीं दिख रहे हैं. 

...और सिंधिया ने खोल दिया खिलाफत मोर्चा

1). हाल ही में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस पार्टी को आत्मचिंतन की नसीहत दी है. दरअसल, राहुल गांधी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा को लेकर सलमान खुर्शीद का अजीबो-गरीब बयान आया जिसपर अपनी राय देते हुए सिंधिया ने कांग्रेस को ये सुझाव दिया था.

2). कमलनाथ सरकार पर निशाना साधते हुए सिंधिया ने उनकी कार्यशैली पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया. और किसानों की कर्जमाफी की सच्चाई के सबूत पेश कर दिए. उन्होंने अपनी ही सरकार को नाकाम बता दिया.

3). अब अपनी बुआ यशोधरा राजे सिंधिया और वसुंधरा राजे से सिंधिया की गर्मजोशी भरी मुलाकात ने सियासी माहौल में गर्माहट ला दी है. दरअसल, मौका था ग्वालियर में विजया राजे सिंधिया की 100वीं जयंती का, जिसमें अरसे बाद राजघराने के ये सदस्य एकसाथ नजर आए. इतना ही नहीं, ज्योतिरादित्य ने बुआ यशोधरा राजे को गले लगाकर अपनी खुशी भी जाहिर की.

सिंधिया परिवार की इस मुलाकात के कई सियासी मायने निकाले जा रहे हैं. माना जा रहा है कि सिंधिया जल्द ही कांग्रेस का दामन छोड़कर भाजपा से नाता जोड़ सकते हैं.

संजय निरुपम की चाहत

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष संजय निरुपम के बगावती सुर सुनाई देने लगे हैं. इस बार निरुपम ने तीखे अंदाज में कहा कि वे पार्टी नहीं छोड़ेंगे चाहे पार्टी कोई भी फैसला ले. हालांकि, उन्होंने ये साफ किया कि अगर कांग्रेस चाहती है तो उनके लिए कोई भी फैसला ले सकती है. ये कोई पहली दफा नहीं है जब निरुपम के ऐसे तेवर दिखाई दिए हों.

1). इसी साल 25 मार्च को कांग्रेस ने लेटरहेड पर एक सूचना जारी की. जिसमें ये साफ किया गया कि निरुपम को मुंबई अध्यक्ष पद से हटाया जा रहा है. उनकी जगह मिलिंद देवड़ा को चेहरा बनाकर मुंबई कांग्रेस की कमान सौंपी जा रही है.

2). पार्टी के इस फैसले के बाद निरुपम कई बार अपनी तकलीफ सबके सामने रखी. दरअसल, माना जा रहा था कि मुंबई कांग्रेस में मिलिंद देवड़ा और निरुपम दो अलग-अलग खेमा है. जिसमें कलह इतनी बढ़ गई थी कि पार्टी ने निरुपम को साइडलाइन कर दिया.

3). विधानसभा में सीट बंटवारे को लेकर निरुपम काफी समय से कांग्रेस से नाराज चल रहे हैं. इस बीच उन्होंने ये साफ किया कि वे किसी और पार्टी जाना नहीं चाहते हैं, लोकसभा चुनाव से पहले उन्हें पार्टी के अध्यक्ष पद से हटाया गया इस बात से वे बहुत ही दुखी हैं. संजय निरुपम ने कहा कि अगर पार्टी में कुछ भी गलत होता दिखेगा तो वे जरूर बोलेंगे. एक बार फिर कांग्रेस की खस्ता हालत पर चिंता जताते हुए कहा कि कांग्रेस का भविष्य संकट में है. उन्होंने महाराष्ट्र और हरियाणा विदानसभा चुनाव में भी कांग्रेस की स्थिति को भी अधर में बताया.

निरुपम भले ही ये बात कह लें, कि वो किसी और पार्टी में नहीं जाना चाहते हैं. लेकिन उनकी बगावती सुर और पार्टी के खिलाफ ये तेवर काफी कुछ बयां कर रहे हैं.

ये दोनों पार्टी और खासकर गांधी परिवार के बेहद ही करीबी माने जाते हैं. लेकिन दोनों नेताओं को जिस तरह से पार्टी में कमजोर किया गया है. या फिर ये कह लें, किया जा रहा है. उसके बाद उनका अगला कदम क्या हो सकता है, इसका अंदाजा लगा पाना उतना मुश्किल नहीं है.

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