close

खास खबरें सिर्फ आपके लिए...हम खासतौर से आपके लिए कुछ चुनिंदा खबरें लाए हैं. इन्हें सीधे अपने मेलबाक्स में प्राप्त करें.

मंदी-मंदी सब करें, मंदी दिखे ना किसी को

भारत में आर्थिक मंदी का शोर है. कुछ खास लोग लगातार आर्थिक मंदी का रोना रोते हुए नजर आते हैं. ऐसे लोगों की मानें तो लगता है जैसे पूरे देश में आर्थिक गतिविधियां ठप हो गई हैं और चारो तरफ हाहाकार मचा हुआ है. लेकिन क्या सचमुच ऐसा ही है? आम आदमी के नजरिए से मंदी पर नजर डालें तो ऐसा बिल्कुल नहीं लगता. देखिए ज़ी हिंदुस्तान की खास रिपोर्ट- 

मंदी-मंदी सब करें, मंदी दिखे ना किसी को
आर्थिक मंदी से अछूता भारत

नई दिल्ली: देश के आम आदमी की निगाह से देखें को आर्थिक मंदी पर चल रहा हंगामा बेमानी नजर आता है. उसे इंडस्ट्रियल ग्रोथ इंडेक्स, मार्केट क्राइसिस, वर्ल्ड बैंक या मूडी रेटिंग जैसे भारी भरकम शब्द समझ में नहीं आते. आम इंसान के सारोकार आटा, दाल, तेल या फिर ज्यादा से ज्यादा शेयर बाजार, पर्यटन या फिर फिल्म और टेक्नोलॉजी मार्केट तक सीमित रहते हैं. जहां मंदी तो छोड़िए लगातार बढ़त ही दिखाई दे रही है. आईए बारी बारी से नजर डालते हैं आम आदमी से संबंध रखने वाले इन सेक्टरों पर- 

थोक महंगाई दर में गिरावट
आम आदमी के जरुरत की खाने पीने की वस्तुओं की कीमतों में लगातार गिरावट दिखाई दे रही है. सितंबर में थोक महंगाई दर घटकर 0.33 फीसदी ही रह गई, जो कि अगस्त के महीने में 1.08 थी. खाने पीने की वस्तुओं में सिर्फ प्याज और टमाटर जैसी सब्जियों में महंगाई दिखाई दे रही है. जिसकी वजह से सब्जियों की थोक महंगाई दर 13.07 फीसदी से बढ़कर 19.43 फीसदी हुई है. 


लेकिन आटा, दाल, तेल, चावल जैसे सामान्य खाद्य पदार्थों के दाम कई सालों से लगभग स्थिर हैं. आपको याद होगा कि यूपीए सरकार के शासनकाल में दाल की कीमतें 300 रुपए प्रतिकिलो के आस पास पहुंच गई थीं. दाल वह खाद्य पदार्थ है जिसकी कीमत आम आदमी को सीधे तौर पर प्रभावित करती है. लेकिन इसकी कीमत पिछले पांच छह सालों से 90-95 रुपए प्रतिकिलो पर ही सीमित है. 

शेयर बाजार के निवेशकों को लाभ 
पिछले कुछ समय से पूरी दुनिया के शेयर बाजारों में भारी उठा पटक चल रही है. जिसमें मार्केट के निवेशकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा. लेकिन भारत के निवेशक इससे अप्रभावित रहे. क्योंकि भारतीय शेयर बाजार इस हलचल से अछूते दिखे और वहां हुए निवेश पर अच्छा मुनाफा दिखा. भारतीय सेंसेक्स ने यूरोप के एफटीएसई और अमेरिका के नैसडैक की तुलना में ज्यादा अच्छा प्रदर्शन किया.


कई ग्लोबल स्टॉक मार्केटों में धीमी वैश्विक अर्थव्यवस्था, केंद्रीय बैंकों से कम कर्ज और व्यापारिक तनाव के चलते सुस्ती दिखाई दी. वहीं भारत में निफ्टी ने करीब इस साल(31 मई 2019 तक)12.18 फीसदी का रिटर्न दिया. हालांकि इस दौरान पूरी दुनिया के शेयर बजारों में गिरावट दिखाई दी. हांगकांग का इडेक्स हैंगसैंग 13.07 फीसदी, सिंगापुर का स्ट्रेट टाइम्स 10.17 फीसदी, जापाना का निक्केई 9.21फीसदी, यूरोप का एफटीएसई 7.49 फीसदी और अमेरिका का नैस्डैक 2.02 फीसदी गिरा. इस दौरान मात्र अमेरिका के डाउ जोंस में बढ़त दिखाई दी. लेकिन वह भी सिर्फ 0.01 फीसदी थी. 
खास बात यह रही कि इस दौरान चीन का शेयर बाजार बुरी तरह उठा पटक का शिकार रहा. वहां के शंघाई बाजार में जून 2018 से मई 2019 के बीच 21.5 फीसदी का उतार चढ़ाव रिकॉर्ड किया गया. अगर देश में आर्थिक मंदी है तो शेयर बाजार उससे अछूता कैसे है?

टैक्सियों का कारोबार बढ़ रहा है
ऑटो सेक्टर में मंदी की जबरदस्त मंदी की हवा उड़ाई गईं. कई कंपनियों ने अपने यहां छंटनी भी शुरु कर दी. लेकिन इसकी वजह मंदी नहीं बल्कि ऑटो सेक्टर का स्वयं में बदलाव नहीं लाना है. ऐप्प आधारित टैक्सी सर्विस ने पूरे देश में लोगों को अपनी कार की जरुरत पर लगाम लगा दी है. 
साल 2018 में कैंडर मिलवर्ड ब्राउन नाम की एजेन्सी के सर्वे में यह बात सामने आई थी कि देश भर के 88 फीसदी लोग अपनी कार खरीदने से ज्यादा ओला ऊबर का इस्तेमाल करना बेहतर मानते थे. शायद यही वजह है कि पूरे देश में ओला ऊबर का कारोबार बढ़ रहा है. आज ओला देश के 110 शहरों में अपनी छह लाख टैक्सियां चला रही है. जबकि ऊबर 29 शहरों में काम कर रही है. 
हालत यह है कि लाखों लोग रोजगार पाने की चाहत में इन कंपनियों से या तो अपनी गाड़ियां खरीदकर जुड़ रहे हैं या फिर इन कंपनियों से गाड़ियां लेकर एप के जरिए कमाई कर रहे हैं. महिंद्रा कंपनी के एक अधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि ओला-उबर की मांग इतनी होती है कि हम गाड़ियां उनको नहीं दे पाते और चरणबद्ध तरीके से उनको गाड़ियां देते हैं. 

अगर देश आर्थिक मंदी से बेहाल हो रहा है तो लोगों के पास ओला ऊबर बुक करके यात्रा करने के लिए पैसा कहां से आ रहा है? 

त्योहारों के मौसम में ऑटो सेक्टर में भी सुधार
वैसे अक्टूबर नवंबर के महीने में भारत में त्योहारों का मौसम शुरु हो गया है. जिसने ऑटो सेक्टर की मंदी को भी धो डाला है. नवरात्रि के मौके पर दोपहिया वाहनों की खरीदारी में 30 फीसदी उछाल आई है. जो कि पिछले साल से 25 फीसदी ज्यादा है.

ऑटो व्यापारियों को धनतेरस और दीपावली पर और ज्यादा वाहनों की बिक्री होने की उम्मीद है.  

मनोरंजन उद्योग को फायदा 
पिछले दिनों केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने फिल्मों के बॉक्स ऑफिस कलेक्शन के आधार पर मंदी को नकारने की कोशिश की थी. लेकिन मंदी का हौवा फैलाने वालों ने उनका मजाक उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. लेकिन पिछले दिनों रिलीज  हुई कुछ फिल्मों के बॉक्स ऑफिस कलेक्शन पर नजर डालें तो आप पाएंगे कि लोगों के पास न केवल खाने पीने पर खर्च करने के लिए पैसे हैं, बल्कि उनकी जेब में मनोरंजन के लिए भी पैसे हैं. 


उदाहरण के तौर पर 12 दिन पहले रिलीज हुई फिल्म 'वॉर' ने अब तक 256 करोड़ की जबरदस्त कमाई की है. हॉलीवुड की फिल्म जोकर ने भी कुछ ही दिनों में लगभग 50 करोड़ कमा लिए हैं. यहां तक कि प्रियंका चोपड़ा की 'द स्काई इज पिंक' जैसी पीरियड फिल्म भी बॉक्स ऑफिस पर अच्छी कमाई कर रही है. दक्षिण भारत में भी फिल्म 'सई रा नरसिम्हा रेड्डी' अच्छा कारोबार कर रही है. इस फिल्म ने रिलीज के दिन ही 80 करोड़ रुपए कमा लिए थे. उम्मीद की जा रही है कि जल्दी ही यह महंगी फिल्म अपनी 200 करोड़ की लागत पूरी करके मुनाफे की यात्रा करने लगेगी. 

तकनीक का बढ़ता बाजार 
भारत में 16 से 18 साल की उम्र के युवाओं में स्मार्टफोन की तादाद में पिछले साल के मुकाबले चार गुना से भी ज्यादा बढ़कर 5 फीसदी से 22 फीसदी हो गई है. खास तौर पर दूसरे और तीसरे दर्जे के शहरों में स्मार्ट फोन का इस्तेमाल करने वालों की तादाद दोगुनी हो गई है. भारत स्मार्टफोन का दुनिया का तीसरा सबसे तेजी से बढ़ता बाजार बन चुका है.

 
 मोबाइल निर्माता कंपनियों की पौ-बारह है. अब त्योहारी सीजन में हर सप्ताह कोई न कोई कंपनी स्मार्टफोन की नई रेंज बाजार में पेश कर रही है. पांच हजार रुपए तक के बीसियों स्मार्ट फोन बाजार में उपलब्ध हैं. अगर मंदी का इतना ही असर है तो मोबाइल मार्केट उससे अछूता कैसे है. 

फूड डिलीवरी मार्केट की ग्रोथ
भारत में फूड डिलीवरी का कारोबार कई गुना हो चुका है. जोमैटो, फूड पांडा, उबर इट्स, फ्रेश मेनू जैसी कंपनियां सिर्फ बड़े शहरों तक ही सीमित नहीं हैं. बल्कि गांव गांव तक पहुंच चुकी हैं. भारत में पांच-छह साल पहले तक यह मार्केट सालाना लगभग 1.18 लाख करोड़ रुपए तक का था. लेकिन इसमें 16.2 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ोत्तरी हो रही है. रही थी, जो 16.2 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ रही है.

भारत में फूड डिलीवरी के बढ़ते कारोबार को देखते हुए मल्टीनेशनल कंपनी गूगल भी इस धंधे में उतर गई है. 

देश में बढ़ता पर्यटन 
भारत में पर्यटन का बाजार बहुत तेजी से बढ़ रहा है. सिर्फ गोवा, केरल, राजस्थान, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, झारखंड, आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ में पर्यटन उद्योग तेजी से विकसित हो रहा है. विश्व पर्यटन संगठन ने भारतीय पर्यटन को सर्वाधिक तेजी से यानि 8.8 फीसदी वार्षिक की दर से विकसित हो रहे उद्योग के रूप में माना जा रहा है. पर्यटन देश का तीसरा सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा अर्जित करने वाला उद्योग बन चुका है. पर्यटन के क्षेत्र में नौकरी करने लायक लोगों का छह फीसदी हिस्सा रोजगार हासिल कर रहा है.

खास बात ये है कि पर्यटन से ग्रामीण क्षेत्रों में भी रोजगार के अवसर पैदा हुए हैं. 

सरकारी कर्मचारियों को लाभ 
देश में सरकारी नौकरी करने वालों की अच्छी खासी तादाद है और यह बाजार को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाली इकाई के तौर पर जाने जाते हैं. मोदी सरकार ने सरकारी कर्मचारियों को दीवाली का तोहफा दिया है. पिछले हफ्ते बुधवार को उनका महंगाई भत्ता 12 फीसदी से बढ़कर 17 फीसदी कर दिया गया है. इस फैसले से 50 लाख सरकारी कर्मचारियों और 62 लाख पेंशनधारकों को लाभ मिलेगा. ​

अगर देश में मंदी है और सरकार के पास पैसे नहीं हैं तो सरकारी कर्मचारियों को देने के लिए पैसे कहां से आ रहे हैं?

सजने संवरने के कारोबार में तेजी 
भारत में आर्थिक मंदी का रोना रोने वाले लोग इस तथ्य पर ध्यान नहीं दे रहे हैं कि देश में देश में कॉस्मेटिक उत्पादों की बिक्री में तेजी से उछाल दिखा है. देश में कॉस्मेटिक उत्पादों बाजार 449 अरब रुपये का पहुंच गया है.  ऐसौचेम की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में यह बाजार सालान 17 फीसदी की दर से बढ़ रहा है. 

इस क्षेत्र में पिछले पांच से आठ सालों 50 अरब रुपये का स्पा और बॉडी ट्रीटमेंट के क्षेत्र में बाजार बढ़ने की संभावना जताई जा रही है. इसमें से 50 फीसदी का इजाफा पिछले कुछ सालों में ग्रामीणों और छोटे शहरों में हुआ है. सौंदर्य के क्षेत्र में 30 लाख लोगों को रोजगार मिलने की संभावना है. 

इस सभी तथ्यों पर ध्यान देने से लगता है कि देश में मंदी का रोना रोने वाले लोगों का उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ मोदी सरकार की नीतियों की आलोचना करना है. आम जनता का बड़ा हिस्सा कथित आर्थिक मंदी से अछूता है. अगर कुछ क्षेत्रों में इसकी आहट दिखाई भी दे रही है तो वह उन खास सेक्टरों की समस्या है. इस आधार पर पूरे देश को मंदी से ग्रसित करार देना गलत है.