क्यों चर्चा में है लाखों साल पुरानी अयोध्या की 84 कोसी परिक्रमा, जानिए कौन था पहला तीर्थयात्री

84 Kosi Parikrama Marg Ayodhya: अयोध्या में करीब 80 किमी रिंग रोड और 275.35 किमी चौरासी कोसी परिक्रमा मार्ग नेशनल हाइवे बनेगा. इससे देश और विदेश के पर्यटक अयोध्या में 84 कोसी परिक्रमा फोरलेन मार्ग से कर सकेंगे. केंद्र के इस फैसले का राज्य के सीएम योगी आदित्यनाथ ने स्वागत किया है.

Written by - Vikas Porwal | Last Updated : Jul 30, 2021, 08:38 AM IST
  • चौरासी कोसी परिक्रमा मार्ग पांच जिलों में 275.35 किलोमीटर तक फैला हुआ है
  • चौरासी कोसी परिक्रमा मार्ग उत्तर प्रदेश राज्य के पांच जिलों से होकर गुजरती है
क्यों चर्चा में है लाखों साल पुरानी अयोध्या की 84 कोसी परिक्रमा, जानिए कौन था पहला तीर्थयात्री

लखनऊः 84 Kosi Parikrama Marg Ayodhya: अभी हाल ही में 84 कोसी परिक्रमा मार्ग को नेशनल हाइवे घोषित कर दिया गया है. केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की ओर से हुई इस घोषणा को मानें तो इसका मतलब हुआ कि अब राम लला के दर्शन और उनकी परिक्रमा को जाने वाले भक्त जब 84 कोसी परिक्रमा करेंगे तो नेशनल हाइवे से गुजरेंगे. 

केंद्रीय मंत्री ने किया ट्वीट

इस बड़े ऐलान के बाद अयोध्या के तीर्थाटन वाले पहलू से जोड़ी 84 कोसी परिक्रमा दिलचस्पी जगा रही है. केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री (Union Minister for Road Transport and Highways) नितिन गड़करी (Nitin Gadkari) ने कहा है कि ट्वीट कर कहा है कि अयोध्या के 84 कोसी परिक्रमा मार्ग को नेशनल हाइवे घोषित कर दिया गया है.

सीएम योगी ने किया फैसले का स्वागत

घोषणा के मुताबिक अयोध्या में करीब 80 किमी रिंग रोड और 275.35 किमी चौरासी कोसी परिक्रमा मार्ग नेशनल हाइवे बनेगा. इससे देश और विदेश के पर्यटक अयोध्या में 84 कोसी परिक्रमा फोरलेन मार्ग से कर सकेंगे. केंद्र के इस फैसले का राज्य के सीएम योगी आदित्यनाथ ने स्वागत किया है.

उन्होंने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन और नेतृत्व में चौरासी कोसी परिक्रमा मार्ग को राष्ट्रीय राजमार्ग घोषित करने के लिए अधिसूचना जारी होना अयोध्या के पुरातन गौरव की पुनर्स्थापना के लिए बढ़ाया गया बड़ा कदम है. क्या है अयोध्या से जुड़ी 84 कोसी परिक्रमा? 

275 किमी में है 84 कोस परिक्रमा

चौरासी कोसी परिक्रमा मार्ग पांच जिलों में 275.35 किलोमीटर तक फैला हुआ है, इसमें अयोध्या, अंबेडकर नगर, बाराबंकी समेत गोंडा जिला भी आता है. अयोध्या में तीन परिक्रमाएं हैं. 5 कोस जो करीब 15 किमी की है. 14 कोस जो करीब 42 किमी की है और 84 कोस जो करीब 275 किमी की है. ये सभी भगवान राम से जुड़ी हुई परिक्रमाएं हैं. लिहाजा इन परिक्रमाओं का धार्मिक महत्व है.

तीन तरह की परिक्रमाएं हैं शामिल

5 कोसी परिक्रमा रामजन्म भूमि के चारों तरफ है. 14 कोसी परिक्रमा अयोध्या शहर की है. जो उस समय का शहर था. वहीं 84 कोस की परिक्रमा उन सभी महत्वपूर्ण स्थानों से होकर गुजरती है जो भगवान राम के राज्य से जुड़े हुए हैं. यानी यह अवध क्षेत्र की परिक्रमा कहलाती है. 84 कोसी परिक्रमा 24 दिन तक चलती है.

इन पांच जिलों से गुजरती है चौरासी कोसी परिक्रमा

चौरासी कोसी परिक्रमा मार्ग राज्य के पांच जिलों से होकर गुजरती है. इसमें अयोध्या, आंबेडकर नगर, बाराबंकी, बस्ती और गोंडा सहित पांच जिले शामिल हैं. नेशनल हाइवे बनने से गोंडा, रायबरेली, अयोध्या, सुलतानपुर के लोग भी इससे सीधे जुड़ जाएंगे. राजा दशरथ के समय की अयोध्या 84 कोस में फैली थी.

भगवान राम से जुड़े पौराणिक स्थल इसी 84 कोसी परिक्रमा मार्ग पर स्थित हैं.

क्या है धार्मिक महत्व

सनातन परंपरा के मुताबिक, मनुष्य का जन्म 84 लाख योनियों के बाद होता है. यानी कि हिंदू मान्यताओं और माइथॉलजी में 84 का अंक बहुत महत्व रखता है. इसका मूलांक 8+4=12, 1+2= 3 यानी तीन है, जो कि त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) तीन गुण (सत्व, रज, तम) और तीन ऋणों (पितृ ऋण, गुरु ऋण और देव ऋण)  का भी प्रतीक है. 

त्रेतायुग से ही हुई थी शुरुआत

यानी ऐसा माना जाता है, 84 कोस की परिक्रमा, मनुष्य को 84 योनियों से मुक्ति दिलाती है, त्रिदेवों के करीब लाती है, तीन गुणों और उनके विकारों को दूर करती है, इसके साथ ही तीनों ऋणों से भी मुक्त कर देती है. यह भी मान्यता है कि इसकी शुरुआत त्रेतायुग में ही हो गई थी. यानी कि आज से तकरीबन लाखों सालों से अयोध्या 84 कोसी परिक्रमा होती आ रही है. 

बस्ती के मखौरा में हुआ था पुत्र कामना यज्ञ

धार्मिक ग्रंथों और पुराणों की मानें तो राजा दशरथ ने देवताओं से पुत्र प्राप्त करने के लिए अयोध्या से लगभग 20 किमी दूर मनोरमा नदी के तट पर पुत्रयष्ठी यज्ञ किया था. इसके बाद उन्हें अपनी तीन पत्नियों से चार पुत्रों का वरदान मिला. 84 कोस परिक्रमा उसी स्थान से शुरू होती है, जहां यज्ञ किया गया था, जिसे अब बस्ती में मखौरा के रूप में पहचाना जाता है. 

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जानिए, कैसे पड़ा मखौरा नाम

मखौरा का मूल शब्द मख है और यह अवधी भाषा का शब्द है. इसका मूल अर्थ यज्ञ होता है. तुलसीदास ने बालकांड में एक चौपाई में इस शब्द का प्रयोग किया है. जहां वह जनकपुरी में किसी स्त्री के जरिए राम-लक्ष्मण का बखान कर रहे हैं. वहां तुलसीदास लिखते हैं. 


मुनि कौसिक मख के रखवारे, जिन्ह रन अजिर निसाचर मारे.  यानी कि ये मुनि विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा करने वाले हैं, इन्होंने युद्ध के मैदान में राक्षसों को मारा है. 

पुत्र यज्ञ के लिए दशरथ जी की यात्रा करीब 22 दिनों में पैदल ही पूरी की गई थी. इसमें करीब 25 पड़ाव के साथ विश्राम के लिए कई स्थान हैं. दो छोटी परिक्रमा हर साल हजारों भक्तों द्वारा पूरी की जाती हैं. लेकिन 84 कोस परिक्रमा 100-150 से अधिक लोगों द्वारा नहीं की जाती है 

कार्तिक महीने में 84 कोस परिक्रमा

84 कोस परिक्रमा कार्तिक के हिंदू महीने में की जाती है. परिक्रमा करने वालों को दिन में केवल एक बार अनाज खाते हैं और बाकी समय फल खा सकते हैं. परिक्रमा पर तीर्थयात्रियों का पहला पड़ाव बस्ती के रामरेखा मंदिर में है. अगले दो पड़ाव बस्ती के दुबौलिया ब्लॉक के हनुमानबाग और अयोध्या में श्रृंग ऋषि आश्रम में हैं. परिक्रमा मार्ग पांच जिलों बस्ती, अयोध्या, अंबेडकर नगर, बाराबंकी और गोंडा के 100 से अधिक गांवों से होकर गुजरता है.

नारदमुनि ने सबसे पहले की थी परिक्रमा

84 कोसी परिक्रमा किसने सबसे पहले की, ऐसा ठीक-ठीक स्त्रोत नहीं है, लेकिन जन श्रुतियों और किवदंतियों में इसकी कई कथाएं प्रचलित हैं. ऐसी ही एक कहानी देव ऋषि नारद से जुड़ी है. हुआ यूं कि एक बार नारद मुनि से गलती से किसी ऋषि का अपमान हो गया. उन्होंने क्रोध में नारद को 84 लाख यौनियों में भटकने का श्राप दे दिया.

चिंता में नारद ने शिव जी से इस श्राप का उपाय पूछा. तब उन्होंने उपाय बताया कि श्रीराम विष्णु अवतारी का जन्म अयोध्या में हुआ है. तुम इस पवित्र धाम की 84 कोस परिक्रमा करो. नारद ने ऐसा ही किया और उनका श्राप कट गया. इसके बाद उनके ही आग्रह पर श्रीराम ने 84 कोस परिक्रमा को मान्यता दी और तबसे श्रद्धालु आस्था की इस डगर पर चल रहे हैं. 

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