India No First Use debate: दुनिया भर में एडवांस हथियारों से लैस होने की होड़ है. वैसे भी किसी भी देश की सुरक्षा, उसके एडवांस डिफेंस सिस्टम व मारक क्षमता पर निर्भर करता है. यही वजह है कि यूक्रेन-रूस जंग के बीच दुनिया भर में पनपे तनाव व अमेरिका के दोबारा परमाणु टेस्टिंग के ऐलान ने भू-राजनीति के लिए नए समीकरण तय कर दिए हैं. ऐसे में, भारत भी अपनी ताकत व पुराने नियमों में जरूरी बदलावों की तैयारी में है. यह तैयारी पड़ोसी मुल्क चीन-पाकिस्तान की हालिया घटनाओं व परमाणु टेस्टिंग की खबरों के चलते है. ऐसे में एक पॉलिसी की चर्चा जोरों पर है. NFU पॉलिसी. यानी नो फर्स्ट यूज. यह परमाणु हथियारों के इस्तेमाल को लेकर है. इसी मामले को लेकर रक्षा विशेषज्ञों में बहस छिड़ गई है, क्या भारत को नो फर्स्ट यूज पॉलिसी को छोड़ देना चाहिए. आइए आसान भाषा में पूरा माजरा समझते हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की सुरक्षा नीति इस समय एक बड़े क्रॉसरोड्स पर है. दूसरी ओर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के भी तेवर परवान पर हैं. जिसके बाद चीन-पाकिस्तान में खौफ का माहौल है. वैसे तो, पारंपरिक रूप से भारत ने हमेशा से 'पहले इस्तेमाल न करने' यानी No-First-Use - NFU की परमाणु नीति अपनाई है, जिसका मतलब है कि भारत परमाणु हथियारों का इस्तेमाल सिर्फ तभी करेगा जब उस पर पहले परमाणु हमला हो. हालांकि, क्षेत्रीय खतरों के बढ़ने और हाइब्रिड युद्ध की बदलती प्रकृति के बीच, कई सुरक्षा विशेषज्ञ अब इस नीति को बदलकर एक हाइब्रिड स्ट्राइक डॉकट्रिन अपनाने की मांग कर रहे हैं.
क्यों हो रही NFU पॉलिसी की चर्चा?
NFU की नीति ने भारत को दुनिया में एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति के रूप में पहचान दिलाई है. यह नीति 1999 में औपचारिक रूप से अपनाई गई थी. इसका मुख्य उद्देश्य परमाणु स्थिरता को बढ़ावा देना और दुश्मनों को परमाणु युद्ध शुरू करने से रोकना था. लेकिन, पिछले कुछ समय में पाकिस्तान और चीन की तरफ से बढ़ते तनाव, खासकर सीमा पार आतंकवादी घटनाओं और दोनों पड़ोसियों की आक्रामक सैन्य मुद्रा ने विशेषज्ञों को सोचने पर मजबूर कर दिया है.
NFU नीति पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?
अब युद्ध सिर्फ परमाणु हमले तक सीमित नहीं है. दुश्मन जैविक, रासायनिक या साइबर हमले का इस्तेमाल कर सकते हैं, जिन्हें NFU स्पष्ट रूप से परमाणु हमले का जवाब देने की अनुमति नहीं देता. एक 'हाइब्रिड डॉकट्रिन' इन सभी खतरों का जवाब देने के लिए भारत को ज्यादा लचीलापन देगा.
ऐसे में, विशेषज्ञों का मानना है कि चीन के साथ बढ़ती पारंपरिक सैन्य ताकत के अंतर को देखते हुए, भारत को अपनी परमाणु क्षमता का इस्तेमाल एक मजबूत निवारक के रूप में करना चाहिए. NFU इस क्षमता को कुछ हद तक सीमित करता है.
ध्यान देने वाली बात है कि चीन और पाकिस्तान की रणनीतियों में NFU जैसी कोई कठोर सीमा नहीं है. ऐसे में, भारत की नीति उसे सामरिक रूप से कमजोर कर सकती है.
हाइब्रिड स्ट्राइक डॉकट्रिन क्या है?
जिस नई नीति की बात की जा रही है, वह NFU से कुछ मायनों में अलग होगी. इस डॉकट्रिन में यह स्पष्ट रूप से नहीं बताया जाएगा कि भारत किन परिस्थितियों में परमाणु हमला कर सकता है. रणनीतिक अस्पष्टता दुश्मन के मन में डर पैदा करती है कि भारत किसी भी बड़े हमले का जवाब परमाणु हथियार से दे सकता है.
यह नीति सिर्फ परमाणु हमले के जवाब तक सीमित नहीं रहेगी. यह दुश्मन द्वारा किए गए किसी भी 'असहनीय नुकसान' जैसे कि बड़े पैमाने पर जैविक या रासायनिक हमले का जवाब देने का विकल्प खुला रखेगी.
NFU छोड़ने के क्या मायने?
विशेषज्ञों का कहना है कि NFU को छोड़ने का मतलब यह नहीं है कि भारत सबसे पहले परमाणु हमला करेगा, बल्कि इसका मतलब है कि भारत अब युद्ध की बदलती प्रकृति के सामने अपनी सुरक्षा को सुनिश्चित करेगा. इस बड़े फैसले के लिए भारत को अपनी पूरी परमाणु कमान संरचना और तैनाती की व्यवस्था में भी बदलाव करने होंगे.
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