आज से सत्र शुरू, अब से 25 दिन तक इन मु्द्दों पर गर्म रहेगा सदन

सोमवार को यानी आज से संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होने जा रहा है. कई अध्यादेशों को बिल का रूप देने की जुगत में जुटी केंद्र सरकार नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर खासा चर्चा में है. इस बिल के तार उत्तर-पूर्वी राज्यों में घुसपैठियों से जुड़े हुए हैं, जिनकी पहचान कर सरकार उनपर कुछ कड़े फैसले लेने के मूड में है. 

आज से सत्र शुरू, अब से 25 दिन तक इन मु्द्दों पर गर्म रहेगा सदन

नई दिल्ली: पिछले दिनों सर्वदलीय बैठक में संसद की उत्पादकता को बढ़ाने और स्वस्थ्य तर्क-वितर्क को लेकर सभी दल के प्रतिनिधि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिले. इसके पहले शनिवार को लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला ने भी सर्वदलीय बैठक में सदन की गरिमा को बनाए रखने और बेहतर बातचीत को लेकर सभी दलों से अपील की. फिर अगले ही दिन संसदीय कार्यमंत्री प्रहलाद जोशी ने भी बैठक बुलाई और लोगों से सदन का कार्य बिना किसी रूकावट के चलने देने की अपील की. 

नए बिलों में यह हैं प्रमुख मुद्दे 

इस दौरान कई सारे विधेयकों पर सबकी नजर होने वाली है. खासकर नागिरकता संशोधन विधेयक पर, जिसपर अभी से ही खूब आलोचना और विरोध जताए जा रहे हैं. इसके अलावा सरकार शीतकालीन सत्र में जहां सरकार कई अहम बिल और पुराने बिलों के संसोधन को लेकर कुछ रणनीतियां बना रही है वहीं विपक्ष में बैठी पार्टियां सरकार को आर्थिक मामलो और जम्मू कश्मीर पुनर्गठन बिल पर घेरने की योजना बना रही हैं. इस सत्र में सरकार दो अहम अध्यादेशों को बिल में बदलने की जुगत में है.

मोदी सरकार देसी विनिर्माण वाली कंपनियों पर कॉरेपोरेट दर को घटाए जाने को लेकर काफी सजग दिख रही है. सरकार का मानना है कि इससे अर्थव्यवस्था में आई मंदी से ग्रसित कई कंपनियों को बाहर निकाल अर्थव्यवस्था को बेहतर स्थिति में लाया जा सकता है. वही दूसरी ओर ई-सिगरेट के बेचने और बनाने पर लगाए गए प्रतिबंध के बाद सरकार इससे संबंधित कोई बिल लाने की कोशिश कर सकती है. 

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राज्यसभा में बिल पर होगा तर्क-वितर्क

मालूम हो कि नागरिकता बिल में संशोधन के लिए मोदी सरकार ने पिछली बार भी जनवरी में शीतकालीन सत्र के दौरान इसे पेश किया था, लेकिन 8 जनवरी को संसद के निचले सदन में इसके पास हो जाने के बाद सरकार ने इसे राज्य सभा में भेजे जाने से रोक लिया. राज्यसभा में इस बिल को ना भेजे जाने का फैसला इसलिए लिया गया क्योंकि सरकार इस दफा इस विधे़यक में बदलावों को लेकर काफी सजग है. राज्यसभा में उस वक्त तक सरकार के पास बहुमत नहीं था. उपरी सदन में विधेयक पेश करने का मतलब था कि अगर इस बार यह बिल पास न हो सका तो अगली बार फिर से इसे दोनों सदनों में पास कराना होगा. नागरिकता विधेयक क्यों जरूरी है, इसके पीछे भी सबके अपने-अपने तर्क हैं.

असम में बिल को लेकर भारी विरोध

दरअसल, एनडीए सरकार एनआरसी को लेकर काफी गंभीर है. उत्तर-पूर्वी राज्यों में अप्रवासियों की बढ़ती संख्या से होने वाली परेशानियां एक बड़ी मुसीबत बनी हुईं हैं. असम में इसको लेकर मामला पहले से ऊबाल ले रहा है. इस बिल के कुछ प्रावधान ऐसे हैं जो असम एनआरसी और असम एकॉर्ड के प्रावधानों के खिलाफ नजर आते हैं. सरकार इसलिए इसे जल्द से जल्द पारित कराने की तैयारी में है. 

पहले भी संशोधनों से गुजरा है बिल

इससे पहले भी कई बार इस विधेयक में सरकारें स्थितियों के हिसाब से बदलाव करती आईं हैं. नागरिकता विधेयक सबसे पहली दफा 1955 में संसद के दोनों सदनों से पारित हो कर एक विधेयक बना. इसके बाद इसमें 1986, 1992, 2003, 2005 और 2016 में संशोधन किए गए. 2016 के संशोधन के बाद कई दफा विवाद भी हुए. इसके बाद 2019 में जब इस विधेयक में संशोधन कर लोकसभा से पास कराया गया तो विवाद और भी गहराता चला गया. संशोधन में यह प्रस्ताव जोड़ा गया था कि भारत के जितने भी पड़ोसी देश हैं, जैसे आफगानिस्तान, बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, म्यांमार और मालदीव, उन सभी देशों के अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता का अधिकार हो सकता है. हालांकि, यह अधिकार गैर-मुस्लिम समुदायों को ही दिया गया है, जिसकी आलोचना हो रही है. कई जगह तो इसे सेक्टेरियन बिल का दर्जा भी दिया जा रहा है. दिलचस्प बात यह है कि अब इसके आलोचना का बड़ा कारण एनआरसी मामला है.

क्या है नागरिकता संशोधन बिल की मुख्य बातें ?

नागरिकता संशोधन विधेयक में अन्य देशों के बाशिंदों को भारत की नागरिकता दिलाने में मदद करता है. हालांकि, इसका कुछ आधार बनाया गया है और इसकी कुछ शर्तें भी हैं. भारतीय संविधान के मुताबिक अनुच्छेद 5 से 11 तक भारत की नागरिकता से संबंधित बातें दी हुई हैं. भारतीय नागरिकता हासिल करने की कुछ शर्तें हैं जिसमें देश के राजनीतिक क्षेत्र के अंदर पैदा होने वालों को या जिनके पूर्वज भारतीय रहे हों उनको नागरिकता मिल जाती है. इसके अलावा रजिस्ट्रेशन के माध्यम से या फिर भारत सरकार के अधीन प्रक्रियाओं को मानते हुए देसीकरण जिसे नागरिकीकरण भी कहा जाता है, उसके तहत भी भारतीय नागरिकता दिए जाने का प्रावधान है.

नागिरकता छीने जाने का भी प्रावधान

इसी बिल में नागरिकता को छीने जाने का भी प्रावधान है. यदि कोई भारतीय नागरिक अपनी स्वेच्छा से भारतीय नागरिकता का परित्याग कर दे या अगर कोई व्यक्ति भारतीय नागरिकता को छोड़ किसी और देश की नागरिकता हासिल कर ले तो वैसी स्थिति में उसकी भारतीय नागरिकता खत्म हो जाती है.