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मोबाइल यूजर्स कृपया ध्यान दें: कहीं आपको भी तो नहीं हो गई है ये बीमारी

मोबाइल फोन का इस्तेमाल जितना बढ़ा है, उसके साथ ही उससे होने वाले साइड इफेक्टस भी उतनी ही तेजी से बढ़े हैं. यूपी के बरेली में तो इसका एक तोड़ भी निकाल लिया गया है जिससे लोग खासकर माता-पिता जो बच्चों के लिए परेशान थे, उनको चैन की सांस मिली है, पढ़िए क्या है पूरी बात. 

मोबाइल यूजर्स कृपया ध्यान दें: कहीं आपको भी तो नहीं हो गई है ये बीमारी

नई दिल्ली : तकनीक का विकास मानव समस्याओं और कामों को आसान करने के लिए किया गया है पर कौन जानता था कि इसी आधुनिकता की चाह हमारे ही लिए मुसीबत बन सकती है. इस परेशानी का एक रूप हमारे जेबों में पड़ा मोबाइल फोन भी है जो हमारा काम तो आसान करता है, साथ ही नई समस्याएं दे भी जाता है. जाहिर है, उन समस्याओं के इलाज भी विकसित किए ही जाएंगे. 

बरेली में हो रहा है मोबाइल के नशे का इलाज 
उत्तर प्रदेश के बरेली में स्वास्थ्य विभाग ने गैजेट्स से उत्पन्न होने वाली मानसिक बीमारियों को दूर करने के लिए एक दिलचस्प पहल शुरू की है. दरअसल, जिले में अत्याधिक मोबाइल फोन के इस्तेमाल से होने वाली नए-नए बीमारियों से जूझ रहे लोगों के इलाज के लिए मोबाइल नशा मुक्ति केंद्र बनाया गया है. जिला अस्पताल में मोबाइल फोन के इस्तेमाल करने के चलते कई बीमारियां सामने आने लगी. जिसका तोड़ निकालने के लिए मोबाइल नशा-मुक्ति केंद्र बनाने की रणनीति तैयार की गई. जिसके जरिए इस आदत में सुधार लाने का लक्ष्य रखा गया है.

अधिक इस्तेमाल से होती है कार्यक्षमता प्रभावित

इसके लिए बरेली के जिला अस्पताल ने एक हेल्प लाइन नंबर भी जारी किया है. जिसके जरिए अबतक तीन हजार से अधिक लोगों की काउंसिलिंग हुई है. माता-पिता अपने बच्चों को नशामुक्ति केंद्रों पर लाकर मोबाइल फोन इस्तेमाल को कम कराने का प्रयास कर रहे हैं. हैं. नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इंफॉर्मेशन ने एक आंकड़ा जारी किया है. इसके मुताबिक आदत से मजबूर कोई व्यक्ति दिनभर में औसतन 47 बार और साल में 17,155 बार अपने फोन को चेक करता है. इतना ही नहीं 85 फीसदी स्मार्टफोन यूजर्स अपने किसी दोस्त, परिवार से बात करते वक्त भी बार-बार फोन का इस्तेमाल कर रहे होते हैं. वहीं 80 प्रतिशत स्मार्टफोन यूजर चलते वक्त भी हर एक घंटे पर फोन देखने लग जाते हैं. 35 प्रतिशत लोग तो सोने से पहले हर पांच मिनट पर फोन देखने लग जाते हैं. इन हरकतों का सीधा असर हमारी कार्यक्षमता पर पड़ता है.

नोमोफोबिया से ग्रसित हैं ज्यादातर लोग
मोबाइल फोन के इतने ज्यादा इस्तेमाल को एक नई बीमारी के रूप में देखा जा रहा है. इसे नोमोफोबिया का नाम दिया गया है. नोमोफोबिया से ग्रसित लोगों की पहचान वैसे लोगों के रूप में की जाती है जिसे अपनी फोन से बिछड़ जाने का डर सताता हो. हालांकि, मोबाइल फोन तो काफी समय से हैं लेकिन ऐसा क्या है जो इसका इस्तेमाल हाल के दिनों में इतना ज्यादा बढ़ गया है? ये किसी से छिपा नहीं है कि इंटरनेट और आधुनिक तकनीक का तेजी से विस्तार हो रहा है. ऐसे में लोग नई-नई तरह की चीजों से रूबरू होते-होते उसे अपनी आदत में शुमार कर लेते हैं. इस तरह के लोग जो नेट के जाल में घिरे हुए हैं अब उन्हें नेटीजंस के नाम से भी पुकारा जाने लगा है. 

कुछ ऐसे कारण जिसकी वजह से नेटीजंस की संख्या लगातार बढ़ रही है

1. सोशल मीडिया पर लोग एक अलग ही छवि बनाने लगे हैं. 
2. पॉर्न साइट्स, सायबर बुलिंग और अन्य सेक्सुअलिटी को बढ़ावा देने वाली सामाग्रियां इसकी बड़ी वजह है.
3. ऑनलाइन शॉपिंग का नया ट्रेंड इसको और भी प्रोमोट कर रहा है. 
4. ऑनलाइन गेम्स जो युवा वर्ग और बच्चों को आकर्षित करते हैं.

इन तमाम वजहों से प्रभावित एक बहुत बड़ी आबादी न सिर्फ नेटीजंस में तब्दील हो रही है बल्कि मोबाइल के नशे का शिकार भी हो रही है. मोबाइल फोन के इतने ज्यादा इस्तेमाल से बढ़ रहे रोगों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है. 

मोबाइल की लत से होने वाली परेशानियां

1. इसकी वजह से लोगों के अंदर तनाव जल्द बढ़ने लग जाता है, जिससे कार्यक्षमता बुरी तरह से प्रभावित होती है.
2. लोग अपने आस-पास की वास्तविक दुनिया को भूल नेट की काल्पनिक दुनिया में ही इमेज बनाने में लगे रहते हैं.
3. इसकी वजह से नींद पूरी नहीं होती जिससे मानसिक बीमारी यानी चीजों को भूलने जैसी बातें अक्सर देखी जाती है.
4. इसके इतने ज्यादा इस्तेमाल से व्यक्ति के अंदर कॉन्फिडेंस की भी कमी होने लगी है.

बरेली के जिला अस्पताल की पहल पूरे देश के लिए कारगर साबित हो सकती है. देश के अन्य क्षेत्रों में ऐसे ही कार्यक्रमों की जल्द जरूरत पड़ सकती है. युवा आबादी का एक बड़ा हिस्सा इस नशे की चपेट में आने लगा है. ऐसे में हर किसी को आज सतर्क होने की आवश्यकता है.