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मजनुओं पर कहर बनकर टूटेंगी बिहार की 'शेरनियां'

महिलाओं की सशक्तिकरण की बात हो और बिहार का नाम न आए ऐसा बमुश्किल ही होता है. ये इसलिए भी कि बिहार ऐसा पहला राज्य है जिसने पंचायत चुनाव में 50 फीसदी तक महिला हिस्सेदारी को अनुमति दी है. अब ''मिशन शेरनी'' से महिला सशक्तिकरण की एक और पहल को हरी झंडी दिखा दी गई है.

मजनुओं पर कहर बनकर टूटेंगी बिहार की 'शेरनियां'

नई दिल्ली: हाल ही में बिहार सरकार ने राज्य पुलिस में महिलाओं की एक विशेष टीम का गठन किया है जिनका मुख्य काम लड़कियों से छेड़छाड़ की घटनाओं की रोक से संबंधित है. फिलहाल इस मुहिम को बिहार के कैमूर जिले में ट्रायल योजना के रूप में ही लागू किया गया है, लेकिन जल्द ही इसे तमाम जिलों में भी लागू किया जाएगा. इस टीम में फिलहाल 30 महिला पुलिसकर्मियों को शामिल किया गया है. 

मार्शल आर्ट की कलाओं में निपुण है विशेष टीम

इस पहल का नाम ''मिशन शेरनी'' रखा गया है. दिलचस्प बात ये है कि इस विशेष टीम में शामिल सभी महिला पुलिसकर्मियों ने मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग ले रखी है. मनचलों की घटनाओं को कंट्रोल करने और नजर बनाए रखने के लिहाज से महिला पुलिसकर्मी आम नागरिक के लिबास में ही पेट्रोलिंग करती नजर आएंगी. दरअसल, कैमूर में लड़कियों के साथ छेड़खानी के मामले लगातार बढ़े हैं. क्राइम रिपोर्ट के मुताबिक कैमूर जिले में जनवरी 2019 के बाद से अब तक 15 रेप केस और 42 से भी ज्यादा छेड़छाड़ के मामले दर्ज किए गए हैं, जो वाकई छोटे जिले के हिसाब से ज्यादा है. इसलिए भी नीतीश सरकार ने इस जिले से ही शिलान्यास करना उचित समझा. 

माता-पिता की अपील पर शुरू की गई यह पहल

कैमूर में इस मुहिम की नींव रखने वाले जिले के एसपी दिलनवाज अहमद कहते हैं कि लड़कियों के साथ छेड़छाड़ के मामले में कई माता-पिता और अभिभावक उनके पास आ कर अपील कर चुके हैं. उन्होंने कहा कि इस समस्या के निपटारे के लिए कुछ करें नहीं तो लड़कियों का घर से निकलना भी दूभर हो जाएगा. उन शिकायतों के मद्देनजर मिशन शेरनी को अमलीजामा पहनाने की कवायद शुरू हुई. और तकरीबन 25-35 साल तक की महिला पुलिसकर्मी जो मार्शल आर्ट और अन्य बचाव के उपायों से लैस हैं, उन्हें इस टीम में शामिल किया गया.      

शेरनी में शामिल हुईं महिला पुलिसकर्मियों में है जोश

शेरनी की टीम में कुछ वैसी भी महिलाएं हैं जो स्वयं भी कभी न कभी इन घटनाओं की विक्टिम रहीं हैं. उन महिला पुलिसकर्मियों में से बहुतों ने मीडिया से बातचीत में इस टीम में शामिल किए जाने के अपने अनुभवों को साझा किया. एक महिला पुलिसकर्मी कहती हैं कि जब वो स्कूल में थीं तो कुछ मनचले उनका पीछा करते और कॉमेंट भी किया करते थे तब तो वो चुपी साध लेती थीं, लेकिन अब इन घटनाओं पर और नहीं सहेंगी और किसी और को शिकार होने से बचाएंगी. इतना ही नहीं इस मुहिम के सकारात्मक परिणाम भी शुरुआती समयों में ही दिखने लगे हैं. पिछले दिनों ही टीम ने तीन मनचलों को हिरासत में लिया. कईयों को सही इलाज भी कराया गया जब उनसे लड़कियों के माता-पिता के नाम माफीनामा लिखा नैतिक स्तर पर भी सुधार की गुंजाइशों को जारी रखा. 

बिहार को NCRB के आंकड़ों से मिली है राहत

हालांकि, राष्ट्रीय अपराध अन्वेषण ब्यूरो 2017 के रिपोर्ट में महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों में बिहार का ग्राफ थोड़ा सुधरा है. 2015 के आंकड़ों में जहां 13,891 केस सामने आए थे, 2017 के आंकड़ों में वो अब कुछ कम हो कर 10,000 के करीब सिमट गए हैं. फिर भी बिहार में एक मान्यता है कि समाज बहुत रूढ़िवादी है और इसलिए ज्यादातर मामले पुलिस स्टेशन की चौखट पर आने से पहले ही दम तोड़ देते हैं. रेप, दहेज और महिलाओं के साथ छेड़छाड़ के मामलों में इस वर्ष उत्तरप्रदेश टॉप पर है. 

खैर, महिला सशक्तिकरण को लेकर बिहार के मुखिया नीतीश कुमार की यह पहल कितनी लाभदायक साबित होती है, यह तो आंकड़ें ही बताएंगे. कैमूर जिले में इसे फिलहाल ट्रायल पर लागू हुआ है, जल्द ही सरकार इसे अन्य जिलों में भी सक्रिय करने की योजना बना रही है.