• भारत में कोरोना के कुल सक्रिय मामले अभी तक 3981 हैं, इसमें से 326 लोग इलाज के बाद ठीक हुए, 114 लोगों की मौत
  • कोरोना संकट से जूझने के लिए सांसदों की तनख्वाह में से एक साल के लिए 30 फीसदी की कटौती की जाएगी, सरकार ने अध्यादेश को मंजूरी दी
  • जरुरतमंदों तक खाद्य सामग्री पहुंचाने के लिए फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया ने लॉकडाउन के दौरान रिकॉर्ड 16.94 लाख टन अनाज की ढुलाई की
  • कोरोना मरीजों के लिए 2500 रेल कोचों में 40 हजार आइसोलेशन वार्ड बनाए गए
  • देश के इन राज्यों में कोरोना के ज्यादा मरीज- महाराष्ट्र में 748, तमिलनाडु में 571, दिल्ली में 523, केरल में 314
  • उत्तर प्रदेश में 305, राजस्थान में 274, आंध्र प्रदेश में 226, मध्य प्रदेश में 165 कोरोना के मरीज हैं
  • दुनिया में कोरोना के कुल मरीजों की संख्या 1346003 है. इसमें से 74654 लोगों की मौत हो चुकी है और 278445 लोग ठीक हो चुके हैं

फेफड़े में फेफड़ा बन गया था जानी दुश्मन, ऑपरेशन से हुआ ठीक

फेफड़े के अंदर फेफड़ा पनपने का ऐसा ही एक मामला सामने आया है. डॉक्टरों के अनुसार इस अनोखी बीमारी को 'सीक्वेस्ट्रेशन ऑफ लंग' कहते हैं. इसमें दूसरा फेफड़ा भी मुख्य फेफड़े की तरह काम करता है. 

फेफड़े में फेफड़ा बन गया था जानी दुश्मन, ऑपरेशन से हुआ ठीक

लखनऊः जुड़वां, सीता और गीता, राम और श्याम जैसी फिल्में तो देखी ही होंगी आपने. यानी कि ऐसी फिल्में जिनमें दो किरदारों की शक्ल एक ही जैसी हो. इंसानों के हमशक्ल होना तो आम बात हैं, लेकिन इंसानी अंदरूनी अंगो के भी हमशक्ल भी शरीर के अंदर ही पनप जाएं तो, अगर ऐसा होता है तो यह कोई उपलब्धि नहीं है, बल्कि बीमारी है और वह भी बेहद खतरनाक बीमारी.

जो जानलेवा है और सही समय पर पता न चले या इलाज न हो सके तो यह जान ले ही लेती है. 

फेफड़े के अंदर पनप गया फेफड़ा
फेफड़े के अंदर फेफड़ा पनपने का ऐसा ही एक मामला सामने आया है. डॉक्टरों के अनुसार इस अनोखी बीमारी को 'सीक्वेस्ट्रेशन ऑफ लंग' कहते हैं. इसमें दूसरा फेफड़ा भी मुख्य फेफड़े की तरह काम करता है. इतना ही नहीं खून की मुख्य नली से भी इसकी नली जुड़ी रहती है. यानी कि असली फेफड़े पर हमशक्ल फेफड़ा कब्जा कर रहा है. ऐसे में इसका आकार बढ़ने के साथ दिक्कत होने लगती है. 

पीड़ित को काफी देर से इसका पता चलता है. मरीज को खून की उल्टियां आने लगती हैं. इसका एकमात्र इलाज ऑपरेशन ही है. केजीएमयू  (लखनऊ) में हाल ही में एक मरीज का ऑपरेशन कर इस अतिरिक्त फेफड़े को निकाला गया है. 

ऑपरेशन के बाद ठीक है मरीज
सर्जरी विभाग में संबंधित डॉक्टर के अनुसार एक लाख व्यक्तियों में किसी एक में इस तरह का मामला सामने आता है. शाहजहांपुर निवासी तीस वर्षीय युवक को डेढ़ साल से खांसी के साथ खून आ रहा था. एक्सरे में धब्बा नजर आने पर टीबी समझते हुए इलाज करवाया गया. फायदा न होने पर शहर के दूसरे बड़े अस्पताल में दिखाया. सीटी स्कैन और ब्रॉन्कोस्कॉपी के बावजूद मर्ज पकड़ में नहीं आया.

इसके बाद पीड़ित केजीएमयू आया था. इलाज के दौरान दोबारा सीटी स्कैन करवाने पर बीमारी पकड़ में आई. इसके बाद जनवरी में ऑपरेशन करके दाहिने फेफड़े के भीतर पनपे दूसरे फेफड़े को निकाल दिया गया. अब मरीज पूरी तरह ठीक है. 

जन्मजात विकार है, जन्म के बाद ही इलाज संभव
चिकित्सकों के  अनुसार पहले भी ऐसा एक केस आ चुका है. उन्होंने बताया कि यह विकार जन्मजात होता है. मां के गर्भ में पलने के दौरान ही बच्चा इसकी चपेट में आ जाता है. हालांकि गर्भावस्था के 16 से 24 सप्ताह में कलर डॉपलर अल्ट्रासाउंड से इसका पता लगाया जा सकता है. हालांकि गर्भ में रहने के दौरान इलाज संभव नहीं है. जन्म के बाद ही ऑपरेशन एक मात्र इलाज है. जन्म के तुरंत बाद भी बीमारी का पता नहीं चलता.

अपनी निजी जानकारी बेचने वाले लोगों का फॉर्मूला, "पैसे दो, डेटो लो"

20 साल बाद होती है दिक्कत
अब तक सामने आए केसों के अनुसार बीस वर्ष बाद ही दूसरा फेफड़ा बढ़ना शुरू होता है. शुरू में सीने में दर्द के बाद खांसी के साथ खून आने लगता है. दूसरा फेफड़ा शरीर की मुख्य नली से खून लेने लगता है. इसके बाद उसकी नर्व मुख्य फेफड़े की नर्व से जुड़ने लगती है. इसे 'एनुरिज्म फॉल्स कनेक्शन' कहते हैं. इससे रिऐक्शन होता है और फेफड़े में प्रेशर बनता है जिससे खांसी के साथ खून आने लगता है. मर्ज बढ़ने पर तीन से चार सौ एमएल तक खून आ सकता है.

जंगली भालू हुए ईश्वर के भजन के दीवाने, कभी नहीं देखा होगा ऐसा अनोखा नजारा