माइक्रोमैन मुकुल डे से मिलिए, जिनकी कारीगरी के कायल हैं खुद राष्ट्रपति

पश्चिम बंगाल के रहने वाले मुकुल डे का पैशन है छोटी से छोटी किताब तैयार करना. उन्होंने कई बार अपनी कारीगरी का ऐसा नमूना पेश किया है कि लोग उसे देखकर दंग रह जाते हैं. उन्होंने दुनिया की सबसे छोटी 0.5 मिलीमीटर की गीता तैयार की है. 

माइक्रोमैन मुकुल डे से मिलिए, जिनकी कारीगरी के कायल हैं खुद राष्ट्रपति
दुनिया की सबसे छोटी किताब बनाने वाला शख्स

कोलकाता: वैसे तो मुकुल डे रिटायर हो चुके हैं, लेकिन उन्हें पैशन है दुनिया की छोटी से छोटी किताब तैयार करने का. उनका ये जुनून इतना बड़ा है कि अब यही उनकी पहचान बन गया है. 

कई हजार नन्ही गीता तैयार की है
मुकुल डे ने केवल 0.5 मिलीमीटर के कई हज़ार पवित्र गीता की पुस्तकें तैयार की हैं. ये किताबें मुकुल डे की कारीगरी का जीता जागता नमूना है. मुकुल डे उत्तर 24 परगना के इच्छापुर गांव के रहने वाले है. वह इच्छापुर राइफल फैक्ट्री में काम करते थे, लेकिन अब रिटायर हो चुके हैं. लेकिन रिटायरमेंट लेने के बाद उन्हें छोटी छोटी चीज़े बनाने का शौक लग गया और अब यही उनका जुनून बन गया है. 

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कुछ इस तरह जगा मुकुल डे को छोटी किताबों का शौक 
मुकुल डे को माइक्रोमैन के नाम से भी जाना जाता है. उन्होंने बताया कि अपनी बेटी के लिए एक बार उन्होंने एक छोटी सी डायरी बनाई थी और उसी के बाद मुकुल ने इस तरह के कार्यों को अपना एक पेशा ही बना लिया है. उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुख़र्जी को भी एक नन्ही गीता भेंट की है. मुकुल डे ना केवल सिर्फ 0.5 मिलीमीटर की माइक्रो गीता बना चुके हैं बल्कि 1 और 2 मिलीमीटर की डायरी भी बना चुके हैं. 

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हजारों किताबें कर चुके हैं तैयार 
मुकुल डे 1993 से अभी तक फिलहाल 4 हज़ार गीता की पुस्तकें तैयार की हैं. जिनकी लम्बाई 2 से 3 मिलीमीटर है. इसमें से कुछ तो बहुत ज्यादा छोटे साइज के हैं. मुकुल डे की बनाई हुई सबसे छोटी गीता मात्र 0.5 मिलीमीटर की है. जिसमें 100 पन्ने हैं और इसमें 18 श्लोक समाहित किए गए हैं. ये गीता बांग्ला और हिंदी में है. 

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देश भर में लगा चुके हैं प्रदर्शनी
मुकुल डे की इच्छा अंग्रेजी में गीता तैयार करने की है. उन्होंने देश के अलग अलग हिस्सों में जाकर अपने इस खास हुनर की प्रदर्शनी भी लगाई है. जिसकी वजह से मुकुल डे को माइक्रोमैन का खिताब दिया गया  है. मुकुल ने बताया कि उन्होंने माइक्रो गीता के साथ साथ माइक्रो जुर्रासिक पार्क की किताब भी बनाई है. अब बच्चो से लेकर बड़ो के लिए अब तरह तरह की डायरी और किताबे बनाना ही मुकुल का पेशा और शौक बन चुका है. 

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विदेश में अपना हुनर दिखाने की है ख्वाहिश
मुकुल डे ने बताया है कि कैसे उन्हें एक बार विदेश में जाने का भी मौका मिला था, लेकिन पैसो की कमी की वजह से वह जान नहीं पाए थे. हालांकि भारत के हर एक शहर में वह अपनी कला की प्रदर्शनी लगा चुके हैं. जिसके लिए उन्हें काफी सम्मान भी मिला है. अब छोटी किताबें तैयार करना ही उनके जीवन का उद्देश्य बन चुका है.