'फारुख रामायणी' ने साबित कर दिखाया कि धर्म नहीं सिखाता आपस में बैर रखना

फारूख रामायणी 35 वर्षो से लोगो को 'गीता व रामायण' का पाठ सुना रहें हैं. साथ में पांच वक्त के नमाजी भी  हैं, फारुख का कहना हैं कि उनके राम तो  रोम रोम में बसते हैं.

Written by - Zee Hindustan Web Team | Last Updated : Nov 20, 2019, 02:30 PM IST
    • 35 साल से संगीतमय रामकथा करते आ रहे हैं
    • 300 से अधिक स्थानों पर रामकथा कर चुके हैं
    • फारूख पांचों वक्त के नमाजी भी हैं
    • 30 से अधिक ब्राह्मण शिष्य हैं फारूख के

ट्रेंडिंग तस्वीरें

'फारुख रामायणी' ने साबित कर दिखाया कि धर्म नहीं सिखाता आपस में बैर रखना

इंदौर: देश मे जहां एक ओर लोग राम के नाम पर लोगों को तोड़ने का काम कर रहें हैं. तो वहीं मध्यप्रदेश के राजगढ़ के रहने वाले फारुख खान राम और अल्लाह को एक बता कर लोगों को आपस में जोड़ने का काम कर रहे हैं. फारूख रामायण और गीता का पाठ हैं और लोगों को भी सुनाते हैं इस वजह से उन्हें 'फारुख रामायणी' के नाम से पुकारा जाता है. वह साम्प्रदायिक सद्भाव का ऐसे चेहरा हैं जिसमें असली भारत की छवि नजर आती है.फारुख रामायणी पिछले 35 साल से संगीतमय रामकथा करते आ रहे हैं. वे अब तक देश के विभिन्न हिस्सों मे 300 से अधिक स्थानों पर रामकथा कर चुके हैं.

इसके साथ ही फारूख पांचों वक्त के नमाजी भी हैं. सबसे बड़ी बात यह है कि वह रामकथा पैसों के लिए नहीं बल्कि लोगो को जोड़ने के लिए करते हैं. फारुख रामायणी जहां भी रामकथा करते हैं वहां हर रोज सैकड़ों लोग पहुंच कर रामकथा का भरपूर आनंद उठाते हैं.

एक ऐसा पर्दाथ जो लोहे की तरह करता है आवाज, लिंक पर क्लिक कर जाने पूरी खबर.

देश के कई जगहों पर कर चुके हैं पाठ
मुस्लिम परिवार में जन्मे फारुख खान रामायण में कुछ ऐसे रमे की फारुख रामायणी बन गए. उनके रामायण कथा करने के अलग अंदाज के चलते सुनने के लिए हजारों की भीड़ उमड़ आती है. फारूख रोजाना प्रति दिन घंटों रामायण का पाठ करते हैं. वेद, गीता समेत तमाम ग्रंथों पर धाराप्रवाह बोलते हैं, लेकिन कभी भी अपनी पांच बार की नमाज को भी नहीं भुलते हैं. हालांकि, एक मुस्लिम का रामायण पाठ पढ़ना हर किसी को पसंद नहीं आ रहा है, कुछ लोगों ने विरोध भी किया. लेकिन फारुख रामायणी अपने कर्म को कौम से उपर मानते हुए आम लोगों को धर्म का पाठ पढ़ाते रहें. इसी का नतीजा है कि अब तक देश के 20 से अधिक राज्यों में उन्हें राम कथा के लिये बुलाया जा चुका है और आज 30 से अधिक ब्राह्मण उनके शिष्य हैं.

बचपन से करने लगे थे पाठ
राजगढ़ जिले के छोटे से गांव गुनियारी में अहमद खान के यहां जन्मे फारुख खान सिर्फ छह साल के थे जब रामायण और गीता जैसे धर्म ग्रंथों की ओर उनका झुकाव बढ़ा. गांव में होने वाली राम कथाओं में वे घंटों बैठा करते थे और एक दिन गायत्री परिवार के किसी कार्यक्रम में गायत्री पीठ के संस्थापक सदस्य आचार्य श्री राम शर्मा 'आचार्य' का सम्मान देखकर ठान लिया कि जीवन में ऐसा ही कुछ बनना है. यहीं से उनके सफर की शुरुआत हुई जो अब तक जारी है. 24 साल की उम्र से रामकथा धार्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के चलते पूरे गांव में फारुख खान पहचाने जाने लगे थे, लेकिन 1984 में पहली बार सार्वजनिक मंच पर राम कथा करने का मौका मिला. राजगढ़ जिले के पचौर में अपनी पहली राम कथा के दौरान उनकी उम्र मात्र 24 वर्ष थी, लेकिन सभी ने उनकी राम कथा की काफी सराहना की. इसके बाद फारुख रामायणी ने एक के बाद एक कई छोटे-बड़े मंचों पर राम कथा कर खूब सराहना बटोरी.

क्यों पटना से रूठी मां गंगा, एक क्लिक में जाने खबर.

गुरू ने दिया 'रामायणी' का खिताब
फारूख के गुरु पंडित लक्ष्मीनारायण शर्मा ने उनकी पहली रामकथा सुनाए जाने के करीब 10 वर्षों बाद 1994 में फारूख के धर्म ज्ञान को देखते हुए 'रामायणी' के खिताब से नवाजा. तब से फारुख खान, फारुख रामायणी कहलाने लगे.

ज़्यादा कहानियां

ट्रेंडिंग न्यूज़