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आखिर पत्रकारों और एक्टिविस्टों के व्हाट्सएप्प की जासूसी क्यों करा रही थी कंपनी ?

क्या आपकी निजता के अधिकार को किसी से खतरा है ? क्या आपके वाट्सऐप्प पर किसी की नजर है ? ये सारे सवाल अब जरूरी से लगने लगे हैं जब से वाट्सऐप्प पर सेंधमारी की खबरें तेजी से वायरल हुईं.  

आखिर पत्रकारों और एक्टिविस्टों के व्हाट्सएप्प की जासूसी क्यों करा रही थी कंपनी ?

नई दिल्ली: वाट्सऐप्प डाटा को पेगासस स्पाईवेयर नामक एक करप्ट सॉफ्टवेयर से हैक कर लिया गया. फिर पता चला कि ये स्पाईवेयर इजरायल में तैयार किया गया है और मालिक कंपनी जिसने इसे बनाया, उसका नाम है NCO.  इस स्पाईवेयर का  इस्तेमाल दुनिया भर के कुछ लक्षित पत्रकारों और सोशल एक्टिविस्टों की जासूसी के लिए किया गया, अब यह बात जैसे ही पता चली, पूरी दुनिया में सनससनी मच गई. आंकड़ों में दिखाया गया कि ये 1400 टारगेटेड लोग किसी न किसी तरह दुनिया के 20 अलग-अलग देशों से हैं, भारत से भी. 

जासूसी तकनीक ही तैयार करती है कंपनी

फिर क्या था, इजरायली कंपनी पर सैन फ्रांसिस्को की एक अदालत में मुकदमा दायर हुआ. एनएसओ कटघरे में खड़ी हुई और धीरे-धीरे सारे भेद खुलने शुरू हो गए. अब तक कुछ खुले तो कुछ बाकी रहे. और क्योंकि तेल अवीव कंपनी का काम ही जासूसी की तकनीक में विशेषता हासिल करने का है तो एनएसओ तेल अवीव कंपनी फिर भी डटी रही. अपना बचाव करते हुए तर्क दिया कि कंपनी आतंकवाद से संबंधित जानकारियां निकालने और अपराध को कम कर सुरक्षा के लिहाज से जासूसी का काम करती है. हालांकि, पत्रकारों और समाजिक एक्टिविस्टों की वाट्सऐप्प डाटा खंगाल कंपनी को कौन सी आतंकवाद से जुड़ी सूचना या जानकारी मिल जाएगी, ये तो एनएसओ ही जाने. 

आखिर ये पेगासस है क्या ? 

पेगासस एक करप्ट यानी बुरे तरह का स्पाईवेयर है जो जासूसी करने के एकमात्र काम से ही विकसित किया गया है. इसके काम करने के लिए जरूरत है एक एक्सप्लॉयटेड लिंक की. एक्सप्लॉयटेड लिंक यानी एक मायाजाल की, जिसके सहारे किसी अमुक व्यक्ति के वाट्सऐप्प में सेंधमारी की जा सकती है. दरअसल, होता ये है कि किसी भी यूट्यूब चैनल या संदेश की तरह ही अमूक व्यक्ति के इनबॉक्स में संदेश भेजा जाता है. जैसे ही वह व्यक्ति उस लिंक पर क्लिक कर खोलने की कोशिश करता है, उस मायजाल के माध्यम से फोन की पूरी जानकारी या यूं कहें कि एक्सेस (ACCESS) कंपनी के मेन सिस्टम तक पहुंच जाती है और वहां से उसे कंट्रोल किया जाता है. कई अप्डेटेड और उच्च तकनीकी स्पाईवेयर की क्षमता तो इतनी होती है कि इसका किसी भी फोन तक पहुंच जाना ही फोन के सारे डाटा को कंपनी के मेन सर्वर तक खींच लाता है. 

क्या-क्या कर सकता है पेगासस ?

पेगासस का ये काम यहां खत्म हो जाता है और आगे शुरू होता है कंट्रोल करने वाले सर्वर का काम. फिर चाहे सारे डाटा को खंगालने का काम हो या मैसेज को फॉरवर्ड करने का या फिर फोन के एसेसिजिबिलिटी का. ऑपरेटर चाहे तो फोन के सारे फंक्शन को आराम से कंट्रोल कर सकता है. दिलचस्प बात ये है कि किसी से बात करते वक्त सुन भी सकता है और कैमरा को भी खोल सकता है. अब सवाल ये है कि कंपनी ने पेगासस का इस्तेमाल सोशल एक्टिविस्टों और पत्रकारों पर क्यों किया? 

क्या कोई भी हो सकता है इसका शिकार ?

सवाल ये भी है कि इन टारगेट लोगों के अलावा क्या किसी भी व्यक्ति के वाट्सऐप्प में पेगासस जैसे स्पाईवेयर के माध्यम से सेंध मारा जा सकता है. तकनीकी तौर पर तो इस सवाल का जवाब हां ही है. करप्ट लिंक को किसी भी व्यक्ति के वाट्सऐप्प पर भेजा जा सकता है और अगर कोई उस लिंक को खोलता है तो उसका डाटा ऑपरेटर आसानी से कंट्रोल कर सकता है. अब ये अलग बात है कि कंपनी कह रही हो कि इसका एक्सेस किसी के पास नहीं. एनएसओ ने कहा कि इसको ऑपरेट सिर्फ सरकारी और जिन्हें इसका एक्सेस दिया जाता है, वहीं कर सकते हैं. 

विश्वसनीय सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक उन 1400 लोगों में से कुछ नाम भारत से भी हैं. 

कुछ नाम जो भारतीय हैं और जिनकी जासूसी कराई गई:-

निहालसिंह राठौड़: महाराष्ट्र के नागपुर में एक मानवाधिकार वकील हैं. वे भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में कई आरोपियों के केस लड़ रहे हैं. 
बेला भाटिया: मानवाधिकार एक्टिविस्ट हैं और माओवाद से प्रभावित छत्तीसगढ़ के बस्तर में काम करती हैं. 
डिग्री प्रसाद चौहान:छत्तीसगढ़ में ही एक मानवाधिकार वकील और एक्टिविस्ट हैं.
आनंद तेलतुंबड़े: प्रोफेसर, लेखक और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता हैं. भीमा कोरेगांव मामले में ही इन्हे हिरासत में भी  लिया गया था लेकिन बाद में रिहा कर दिया गया था.
सिद्धांत सिब्बल: रक्षा और विदेश मामलों के पत्रकार हैं और एक अंग्रेजी न्यूज टीवी चैनल के लिए काम करते हैं.
शालिनी गेरा: बस्तर में काम करने वाली एक मानवाधिकार वकील हैं, और भीमा कोरेगांव मामले में आरोपी सुधा भारद्वाज की वकील हैं.
रुपाली जाधव: कबीर कला मंच से जुड़ी हैं. यह दलितों और श्रमिकों के अधिकारों की बात रखने वाला सांस्कृतिक मंच है.
शुभ्रांशु चौधुरी: बीबीसी के लिए काम कर चुके एक पत्रकार हैं. वे पिछले कई सालों से छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के बीच काम कर रहे हैं.
सरोज गिरी: दिल्ली विश्विद्यालय में राजनीतिक विज्ञान की सहायक प्रोफेसर हैं.
विवेक सुंदरा: मुंबई में एक पर्यावरणविद और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता हैं.
आशीष गुप्ता: मानदवाधिकार कार्यकर्ता हैं और पीयूडीआर नाम की मानवाधिकार संस्था के साथ काम करते हैं.
अंकित ग्रेवाल: चंडीगढ़ में एक वकील हैं जो अदालत में सुधा भारद्वाज के लिए जिरह कर चुके हैं.
रविंद्रनाथ भल्ला:  तेलंगाना हाई कोर्ट में वकील हैं.

फेसबुक की मिल्कियत वाली वाट्सऐप्प, मैसेंजिग सर्विस के लिए जानी जाती है. इस स्पाईवेयर के साथ तो सायबर बुलिंग से लेकर सायबर क्राइम को आसानी से अंजाम दिया जा सकता है, बशर्ते कि ये गलत हाथों में पड़ जाए. कंपनी को कटघरे में तो खड़ा कर दिया गया है, लेकिन अब भी इस बात की कोई गारंटी नहीं मिलती कि इस तरह के और स्पाईवेयर या सॉफ्टवेयर भविष्य में बनते हैं तो क्या तब भी हमारी निजता का अधिकार सुरक्षित रह पाएगा.