फ्लोरेंस नाइटेंगल की तरह कोरोना के कहर से जूझ रही नर्सें सम्मान की हकदार हैं

1854 में क्रीमिया का युद्ध हुआ. उस युद्ध में ब्रिटेन, फ्रांस और तुर्की एक तरफ थे तो दूसरी तरफ रूस. ब्रिटिश सैनिकों को रूस के दक्षिण में स्थित क्रीमिया में लड़ने को भेजा गया. कुछ दिनों में ही रूस के लिए बुरी खबर आई. पता चला कि वहां सैनिक जख्मी होने, ठंड, भूख और बीमारी से मर रहे हैं.

फ्लोरेंस नाइटेंगल की तरह कोरोना के कहर से जूझ रही नर्सें सम्मान की हकदार हैं

नई दिल्लीः आज के इस कठिन दौर में कोरोना एक तरफ है और उससे जंग लड़ते डॉक्टर और नर्स एक तरफ. अभी तक इसकी दवा नहीं खोजी जा सकी है और लोगों में परेशानी का आलम है. जिस बहादुरी से नर्सें इस मैदान में डटी हुई हैं वह उनके पेशे की सबसे बड़ी जरूरत है औऱ इस जरूरत की शुरुआत फ्लोरेंस नाइटेंगल से होती है. उन्होंने कैसे नर्सिग के पेशे में जज्बा भरा, जानते हैं पूरी कहानी-

जर्मनी से की नर्सिंग की पढ़ाई
अमीर घराने की फ्लोरेंस को काफी मुश्किल से नर्सिंग की पढ़ाई की अनुमति मिली थी. इसके बाद फ्लोरेंस जर्मनी पहुंच गईं और यहां क्रिश्चियन स्कूल से नर्सिंग की पढ़ाई की. वहां उन्होंने मरीजों की देखभाल के अहम हुनर सीखे, साथ ही अस्पतालों साफ-सुथरे होने चाहिए इसकी जरूरत को भी समझा.

1853 में उन्होंने लंदन में महिलाओं का एक अस्पताल खोला. यहां उन्होंने अस्पतालों की आदर्श स्थिति का पालन कराने के लिए प्रयोग किया, जो कि सफल रहा. उन्होंने मरीजों की देखभाल की बहुत अच्छी सुविधा मुहैया कराई. इसके अलावा सेवाभाव के साथ काम करने का बीज रोपा. 

उस लड़की की कहानी, जिसके लैंप से निकली रौशनी आज नर्स के पेशे को रौशन कर रही है

फिर छिड़ गया क्रीमिया का युद्ध
1854 में क्रीमिया का युद्ध हुआ. उस युद्ध में ब्रिटेन, फ्रांस और तुर्की एक तरफ थे तो दूसरी तरफ रूस. ब्रिटिश सैनिकों को रूस के दक्षिण में स्थित क्रीमिया में लड़ने को भेजा गया. कुछ दिनों में ही रूस के लिए बुरी खबर आई. पता चला कि वहां सैनिक जख्मी होने, ठंड, भूख और बीमारी से मर रहे हैं.

उनकी देखभाल के लिए कोई वहां नहीं था. युद्ध मंत्री सिडनी हर्बर्ट फ्लोरेंस को जानते थे. उन्होंने क्रीमिया में नर्सों का एक दल लेकर फ्लोरेंस को पहुंचने को कहा. 

जब नर्सें वहां पहुंचीं तो अस्पताल की हालत देखकर काफी दंग रह गईं. अस्पताल काफी गंदें और मरीजों से भरे थे. व्यवस्था का कोई नामो-निशान नहीं था. नालियां बंद हो चुकी थीं, शौचालय टूटे पड़े थे और इधर-उधर हर तरफ चूहे दौड़ रहे थे. हवा में केवल दुर्गंध ही थी. इतनी कि खड़ा होना मुश्किल था. न तो दवाएं और और न चिकित्सीय उपकरण मौजूद थे. 

संक्रमण से मर रहे थे सैनिक
जख्मी सैनिकों को गंदे फर्श पर सोना पड़ता था. न ओढ़ने के लिए उनके पास कंबल होते थे, न पीने के लिए साफ पानी. उनके पास खाने के लिए ताजा खाना भी नहीं होता था. इन वजहों से तेजी से बीमारी फैली और अधिकतर सैनिक संक्रमण से मर गए.

फ्लोरेंस और उनकी टीम के लिए यह कोई नया अनुभव नहीं था, लेकिन फिर भी इससे जूझना बड़ी चुनौती थी. संकट की इस घड़ी में फ्लोरेंस ने सिर्फ घायलों को देखा, दुश्मन या सहयोगी सैनिक नहीं. 

कई सैनिकों की बचा ली जान
फ्लोरेंस नाइटिंगेल ने अस्पताल की हालत सुधारने पर ध्यान दिया. उनको पता था कि अस्पताल की सही हालत होने पर ही सैनिकों को बचाया जा सकता है. उन्होंने बेहतर चिकित्सीय उपकरण खरीदे. मरीजों के लिए अच्छे खाने का इंतजाम किया. नालियों की सफाई करवाई.

अपनी टीम के साथ वॉर्डों की सफाई की. अस्पताल में एक किचन का बनवाया. जख्मी सैनिकों की देखभाल के साथ उनके नहाने-सफाई और ड्रेसिंग पर ध्यान दिया. नतीजा यह हुआ कि सैनिकों की मौत की संख्या में गिरावट आई. 

प्रकृति पर हमारे अतिक्रमण से रूठ गई है गौरेया, इसलिए बंद किया चहचहाना

आज कई फ्लोरेंस मैदान में हैं
12 मई 1820 में जन्मी फ्लोरेंस के जन्म दिवस को नर्स डे के तौर पर मनाया जाता है. आज भले ही क्रीमिया के युद्ध जैसे हालात नहीं हैं, लेकिन कोरोना से लड़ रहा देश और विश्व उसी भयावह स्थिति से गुजर रहा है. इस स्थिति से लड़ाई करने वाली आज अनगिनत फ्लोरेंस नाइटेंगल हैं जो मैदान में हैं, उनका साथ दीजिए और स्थिति को बिगड़ने मत दीजिए. 

 

 

नई दिल्लीः आज के इस कठिन दौर में कोरोना एक तरफ है और उससे जंग लड़ते डॉक्टर और नर्स एक तरफ. अभी तक इसकी दवा नहीं खोजी जा सकी है और लोगों में परेशानी का आलम है. जिस बहादुरी से नर्सें इस मैदान में डटी हुई हैं वह उनके पेशे की सबसे बड़ी जरूरत है औऱ इस जरूरत की शुरुआत फ्लोरेंस नाइटेंगल से होती है. उन्होंने कैसे नर्सिग के पेशे में जज्बा भरा, जानते हैं पूरी कहानी-

जर्मनी से की नर्सिंग की पढ़ाई
अमीर घराने की फ्लोरेंस को काफी मुश्किल से नर्सिंग की पढ़ाई की अनुमति मिली थी. इसके बाद फ्लोरेंस जर्मनी पहुंच गईं और यहां क्रिश्चियन स्कूल से नर्सिंग की पढ़ाई की. वहां उन्होंने मरीजों की देखभाल के अहम हुनर सीखे, साथ ही अस्पतालों साफ-सुथरे होने चाहिए इसकी जरूरत को भी समझा.

1853 में उन्होंने लंदन में महिलाओं का एक अस्पताल खोला. यहां उन्होंने अस्पतालों की आदर्श स्थिति का पालन कराने के लिए प्रयोग किया, जो कि सफल रहा. उन्होंने मरीजों की देखभाल की बहुत अच्छी सुविधा मुहैया कराई. इसके अलावा सेवाभाव के साथ काम करने का बीज रोपा. 

उस लड़की की कहानी, जिसके लैंप से निकली रौशनी आज नर्स के पेशे को रौशन कर रही है

फिर छिड़ गया क्रीमिया का युद्ध
1854 में क्रीमिया का युद्ध हुआ. उस युद्ध में ब्रिटेन, फ्रांस और तुर्की एक तरफ थे तो दूसरी तरफ रूस. ब्रिटिश सैनिकों को रूस के दक्षिण में स्थित क्रीमिया में लड़ने को भेजा गया. कुछ दिनों में ही रूस के लिए बुरी खबर आई. पता चला कि वहां सैनिक जख्मी होने, ठंड, भूख और बीमारी से मर रहे हैं.

उनकी देखभाल के लिए कोई वहां नहीं था. युद्ध मंत्री सिडनी हर्बर्ट फ्लोरेंस को जानते थे. उन्होंने क्रीमिया में नर्सों का एक दल लेकर फ्लोरेंस को पहुंचने को कहा. 

जब नर्सें वहां पहुंचीं तो अस्पताल की हालत देखकर काफी दंग रह गईं. अस्पताल काफी गंदें और मरीजों से भरे थे. व्यवस्था का कोई नामो-निशान नहीं था. नालियां बंद हो चुकी थीं, शौचालय टूटे पड़े थे और इधर-उधर हर तरफ चूहे दौड़ रहे थे. हवा में केवल दुर्गंध ही थी. इतनी कि खड़ा होना मुश्किल था. न तो दवाएं और और न चिकित्सीय उपकरण मौजूद थे. 

संक्रमण से मर रहे थे सैनिक
जख्मी सैनिकों को गंदे फर्श पर सोना पड़ता था. न ओढ़ने के लिए उनके पास कंबल होते थे, न पीने के लिए साफ पानी. उनके पास खाने के लिए ताजा खाना भी नहीं होता था. इन वजहों से तेजी से बीमारी फैली और अधिकतर सैनिक संक्रमण से मर गए.

फ्लोरेंस और उनकी टीम के लिए यह कोई नया अनुभव नहीं था, लेकिन फिर भी इससे जूझना बड़ी चुनौती थी. संकट की इस घड़ी में फ्लोरेंस ने सिर्फ घायलों को देखा, दुश्मन या सहयोगी सैनिक नहीं. 

कई सैनिकों की बचा ली जान
फ्लोरेंस नाइटिंगेल ने अस्पताल की हालत सुधारने पर ध्यान दिया. उनको पता था कि अस्पताल की सही हालत होने पर ही सैनिकों को बचाया जा सकता है. उन्होंने बेहतर चिकित्सीय उपकरण खरीदे. मरीजों के लिए अच्छे खाने का इंतजाम किया. नालियों की सफाई करवाई.

अपनी टीम के साथ वॉर्डों की सफाई की. अस्पताल में एक किचन का बनवाया. जख्मी सैनिकों की देखभाल के साथ उनके नहाने-सफाई और ड्रेसिंग पर ध्यान दिया. नतीजा यह हुआ कि सैनिकों की मौत की संख्या में गिरावट आई. 

प्रकृति पर हमारे अतिक्रमण से रूठ गई है गौरेया, इसलिए बंद किया चहचहाना

आज कई फ्लोरेंस मैदान में हैं
12 मई 1820 में जन्मी फ्लोरेंस के जन्म दिवस को नर्स डे के तौर पर मनाया जाता है. आज भले ही क्रीमिया के युद्ध जैसे हालात नहीं हैं, लेकिन कोरोना से लड़ रहा देश और विश्व उसी भयावह स्थिति से गुजर रहा है. इस स्थिति से लड़ाई करने वाली आज अनगिनत फ्लोरेंस नाइटेंगल हैं जो मैदान में हैं, उनका साथ दीजिए और स्थिति को बिगड़ने मत दीजिए.