सत्यशोधक समाज के जनक ज्योतिबा फुले, जिन्होंने नारी शिक्षा का बिगुल फूंका

अगर तुम्हारे पास शिक्षा नहीं है, ज्ञान नहीं है और तुम उसके लिए प्रयास भी नहीं करते. खुद को ज्ञानी समझते हो, पर ज्ञान अर्जन करने की कोशिश भी नहीं करते तो तो मानव कहलाने के लायक नहीं हो. यह बातें समाज सुधारक और दार्शनिक ज्योतिबा फुले ने कही थी, जिनकी आज पुण्यतिथि है. 

सत्यशोधक समाज के जनक ज्योतिबा फुले, जिन्होंने नारी शिक्षा का बिगुल फूंका

नई दिल्ली: भारतीय इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो समाजसुधारकों की भूमिका में अपना पूरा जीवन ही दे चुके हैं. अमूमन ऐसा देखा जाता है कि समाजिक दायित्वों को अपने कंधे पर उठा कर रखने वाले ज्योतिबा फुले ने अपनी अर्धांगिनी सावित्री बाई फुले के साथ समाज की कुरीतियों को दूर करने का बेड़ा उठाया, यह तब की बात है जब अंग्रेजी हुकूमत का बोलबाला समूचे भारत में था. ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले ने अपने पूरे जीवन काल में नारी-शिक्षा, विधवा-विवाह जैसी कुरीतियों की मुखालफत की और उस समाज से लड़े जो उस वक्त तक रूढ़िवादिता की जंजीर में बंधा हुआ था. किसी भी तरह के बदलाव से उस समाज को मनाही थी. 

देश की पहली महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले को किया शिक्षित

ज्योतिबा फुले का पूरा नाम ज्योतिराव गोविंदराव फुले था जो एक विचारक, समाजसेवी, लेखक, दार्शनिक तथा क्रान्तिकारी कार्यकर्ता रहे. उनका जन्म 11 अप्रैल को हुआ था और मृत्यु आज ही के दिन. सत्यशोधक समाज की स्थापना करने वाले ज्योतिराव फुले ने नारी-शिक्षा पर विशेष बल दिया. उनका मानना था कि भारत में जितनी भी कुरीतियां हैं फिर चाहे वह जाति प्रथा हो या सती प्रथा, सबको जड़ से खत्म करने  के लिए जरूरी है सबका जनजागरण करना. और जनजागरण का जरिया है शिक्षित करने से. एक और जहां वे जाति व्यवस्था के खिलाफ मोर्चा खोल हुए थे, वहीं दूसरी ओर अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले के साथ मिलकर उनको देश की पहली महिला शिक्षिका का दर्जा दे दिया था. 

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महिला सशक्तिकरण का जगाया अलख

ज्योतिबा फुले ने सावित्रीबाई फुले को शिक्षित किया और इसके बाद उनको ही नारी-शिक्षा का कार्यभार सौंप समाज के अन्य बुराइयों पर नजरे गड़ाए उसे सुधारने में लग गए. विविधता से भरे भारत में उस वक्त समाज इन दोनों दंपत्तियों को बड़ी घृणा भरी नजर से देखता था. महिला सशक्तिकरण और महिला उत्थान की बात उस वक्त तक लोगों को भारतीय संस्कृति के विपरीत बात लगती थी. वो लोग जिन्हें यह लगता था कि भारत एक पितृसत्तात्मक समाज है, उसे यह बात हजम नहीं हो रही थी कि कोई कैसे महिलाओं की उत्थान की बात कर सकता है. 

प्रेस की आजादी को मानते थे समाज के लिए अहम

यहीं नहीं ज्योतिबा फुले ने प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर भी कुछ ऐसे योगदान दिए थे, जो उन्हें सबसे अलग बनाता है. 1878 में वर्नाकुलर प्रेस एक्ट जब लाया गया तब उन्होंने इसे प्रेस की पाबंदी कहते हुए जबरदस्त विरोध किया था. उनका मानना था कि जनजागरण के इस तौर-तरीके और स्त्रोत को ही जब पाबंदियों के घेरे में ला दिया जाएगा तो यह सही काम कैसे कर पाएगा.