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  • सीबीआईसी ने 8 अप्रैल से 25 मई 2020 के बीच 11,052 करोड़ रुपये के 29,230 जीएसटी रिफंड के दावों का का भुगतान किया

हिंदू सम्राट मिहिर भोज की गौरवशाली दास्तान, इस्लामी आक्रांताओं को नहीं रखने दिया भारत में कदम

भारत भूमि के हिंदू वीरों ने सदियों तक इस पवित्र धरती पर अरब और तुर्क के इस्लामी लुटेरों का निशान तक नहीं पड़ने दिया. इस कड़ी में महान सनातनी सम्राट मिहिर भोज का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है. 36 लाख की सेना के डर से तुर्क और अरब भारत की तरफ मुंह करने से भी डरते थे. लेकिन उनकी गौरव गाथा को दूषित मनोवृत्ति के इतिहासकारों ने छिपाने का कुत्सित प्रयास किया.

हिंदू सम्राट मिहिर भोज की गौरवशाली दास्तान, इस्लामी आक्रांताओं को नहीं रखने दिया भारत में कदम

नई दिल्ली: कन्नौज के सम्राट मिहिर भोज भगवान शिव के अनन्य भक्त थे. उन्होंने 836 ईस्वीं से 885 ईस्वीं तक 49 साल के लंबे समय तक शासन किया. उनका साम्राज्य आज के मुलतान से पश्चिम बंगाल में गुर्जरपुर तक और कश्मीर से कर्नाटक तक फैला हुआ था था. सम्राट मिहिर भोज के साम्राज्य को तब गुर्जर देश के नाम से जाना जाता था.

कई बार दुश्मनों के दांत खट्टे किए सम्राट मिहिर भोज ने
मिहिर भोज उस दौर में राजा बने, जब इस्लामी कट्टरपंथी अक्सर भारत की धरती पर कब्जा करने के इरादे से हमले करते थे. ऐसे हमलावरों से निपटने के लिए सम्राट मिहिरभोज ने भी अपनी सेना को बेहद मजबूत और विशाल बना लिया था.  उनके साम्राज्य की सीमाएं आधुनिक भारत के राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, ओडिशा, गुजरात, हिमाचल तक फैली थी. मिहिरभोज के विशाल साम्राज्य की राजधानी कन्नौज में थी.

बेहद प्रजापालक थे मिहिर भोज
मिहिर भोज के सक्षम शासन तले एक ऐसा साम्राज्य स्थापित हुआ, जहां प्रजा खुश थी, अत्याचारियों को दण्डित किया जाता था. व्यापार और कृषि को खूब बढ़ावा दिया जा रहा था.  राजधानी कन्नौज में 7 किले और दस हजार मंदिर थे.  सारा साम्राज्य धन, वैभव से संपन्न था. उनके राज्य में व्यापार सोने और चांदी के सिक्कों से होता था.

दुश्मन के इतिहासकारों ने भी की है मिहिर भोज की तारीफ
अरब के हमलावर मिहिरभोज के साम्राज्य पर विजय चाहते थे, लेकिन सम्राट मिहिरभोज ने अरब तुर्क मुस्लिम आक्रमणकारियों को भारत की धरती पर कभी पांव रखने नहीं दिया. दुश्मन सेनाएं सम्राट मिहिर भोज से खौफ खाती थीं. उस दौर के अरब यात्री सुलेमान ने अपनी पुस्तक सिलसिला-उत-तारिका में लिखा कि सम्राट मिहिरभोज के पास उंटों, घोड़ों और हाथियों की बड़ी विशाल और सर्वश्रेष्ठ सेना है.  उनके राज्य में व्यापार सोने और चांदी के सिक्कों से होता है.  इनके राज्य में चोरों डाकुओं का भय नहीं होता था.

मिहिरभोज के राज्य की सीमाएं दक्षिण के राष्ट्रकूटों के राज्य, पूर्व में बंगाल के शासक पालवंश और पश्चिम में मुल्तान के मुस्लिम शासकों से मिली हुई है.  915 ईस्वी में भारत भ्रमण पर आये बगदाद के इतिहासकार अल मसूदी ने भी अपनी किताब मिराजुल-जहाब में लिखा कि सम्राट मिहिरभोज के पास महाशक्तिशाली, महापराक्रमी सेना है. इस सेना की संख्या चारों दिशाओं में लाखो में बताई गई है.

मिहिर भोज की गाथाओं से भरे हैं सनातन ग्रंथ
भले ही वामपंथी इतिहासकारों ने मिहिर भोज के इतिहास को काट देने की साजिश की. लेकिन स्कंद पुराण के प्रभास खंड में भी सम्राट मिहिरभोज की वीरता, शौर्य और पराक्रम के बारे में विस्तार से वर्णन है. मिहिरभोज बचपन से ही वीर बहादुर माने जाते थे. उनका जन्म विक्रम संवत 873 को हुआ था. सम्राट मिहिरभोज की पत्नी का नाम चंद्रभट्टारिका देवी था. जो भाटी राजपूत वंश की थी. मिहिरभोज की वीरता के किस्से पूरी दुनिया मे मशहूर हुए. कश्मीर के राज्य कवि कल्हण ने अपनी पुस्तक राज तरंगिणी में सम्राट मिहिरभोज का उल्लेख किया है.

ये थे मिहिर भोज के मित्र और शत्रु
काबुल का ललिया शाही राजा, कश्मीर का उत्पल वंशी राजा अवन्ति वर्मन, नेपाल का राजा राघवदेव और आसाम के राजा, सम्राट मिहिरभोज के मित्र थे. वहीं  दूसरी तरफ पालवंशी राजा देवपाल, दक्षिण का राष्ट्र कटू महाराज अमोघवर्ष और अरब के खलीफा मौतसिम वासिक, मुत्वक्कल, मुन्तशिर, मौतमिदादी सम्राट मिहिरभोज के सबसे बड़े शत्रु थे. 

सम्राट मिहिरभोज ने राज्य की रक्षा और विस्तार के लिए कई युद्ध लड़े. उन्होंने  बंगाल के राजा देवपाल के पुत्र नारायणलाल को युद्ध में परास्त करके उत्तरी बंगाल को अपने साम्राज्य में शामिल कर लिया था. दक्षिण के राष्ट्र कूट राजा अमोघवर्ष को पराजित करके उनके क्षेत्र पर विजय प्राप्त की. सिन्ध के अरब शासक इमरान बिन मूसा को पराजित करके सिन्ध को अपने साम्राज्य का अभिन्न अंग बनाया.  इस तरह सम्राट मिहिरभोज के राज्य की सीमाएं काबुल से रांची और आसाम तक, हिमालय से नर्मदा नदी और आन्ध्र तक, काठियावाड़ से बंगाल तक, सुदृढ़ और सुरक्षित थी.

ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार मिहिरभोज की एक सेना कनकपाल परमार गुर्जर के नेतृत्व में गढ़वाल नेपाल के राघवदेव की तिब्बत के आक्रमणों से रक्षा करती थी.  इसी प्रकार एक सेना अल्कान देव के नेतृत्व में पंजाब के गुर्जराज नगर के समीप नियुक्त थी जो काबुल के ललियाशाही राजाओं को तुर्किस्तान की तरफ से होने वाले आक्रमणों से रक्षा करती थी.  इसकी पश्चिम की सेना मुलतान के मुसलमान शासक पर नियंत्रण करती थी. 

महादेव के अनन्य भक्त थे मिहिर भोज
सम्राट मिहिर भोज मूल रूप से शैव थे. वह उज्जैन में स्थापित भगवान महाकाल के अनन्य भक्त थे. उनकी सेना जय महादेव जय विष्णु, जय महाकाल की ललकार के साथ रणक्षेत्र में दुश्मन का खात्मा कर देती थी.  कभी रणक्षेत्र में भिनमाल, कभी हकड़ा नदी का किनारा, कभी भड़ौच और वल्लभी नगर तक अरब हमलावरों के साथ युद्ध होता रहता. मिहिर भोज की एक उपाधि ‘आदिवराह’ भी थी. उनके समय के सोने के सिक्कों पर वराह की आकृतियां उकेरी गई थी. 

मिहिरभोज के समय अरब के हमलावरों ने भारत में अपनी शक्ति बढ़ाने की कई नाकाम कोशिश की. लेकिन वह विफल रहे. साहस, शौर्य, पराक्रम वीरता और संस्कृति के रक्षक सम्राट मिहिर भोज जीवन के अंतिम वर्षों में अपने बेटे महेंद्रपाल को राज सिंहासन सौंपकर सन्यास ले लिया था. मिहिरभोज का स्वर्गवास 888 ईस्वी को 72 वर्ष की आयु में हुआ था.  भारत के इतिहास में मिहिरभोज का नाम सनातन धर्म और राष्ट्र रक्षक के रूप में दर्ज है.


 
आज हर भारतीय को सम्राट मिहिर भोज की गौरवपूर्ण गाथा को याद करना चाहिए.

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