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कहानी बोधिधर्मन की, जब चीन ने सदियों पहले दिखा दिया था अपना स्वार्थी चेहरा

बोधिधर्म आयुर्वेद, सम्मोहन, मार्शल आर्ट और पंच तत्वों को काबू में करने की विद्या जानते थे. कहते हैं कि इन विद्याओं को सिद्ध करते-करते उन्हें दैवीय शक्तियां भी हासिल हो गईं थीं. इन्हीं विद्याओं के प्रसार के लिए और अधिक से अधिक लोगों को लाभ मिले ऐसा ही सोचते हुए राजमाता ने उन्हें अन्य देशों में जाने का आदेश दिया. यह उदारनीति केवल भारत में ही हो सकती है.

कहानी बोधिधर्मन की, जब चीन ने सदियों पहले दिखा दिया था अपना स्वार्थी चेहरा

नई दिल्लीः हरे वन प्रदेशों और झरनों से भरा था कांचीपुरम वन प्रदेश. 5वीं-6वीं सदी में पल्लववंश की राजसत्ता यहां कायम थी. राजमाता के आदेश के अनुसार राजा, अपनी प्रजा का ध्यान रखते और शत्रुओं से भी राज्य की सुरक्षा बनाए रखते. इसी राजा का छोटा बेटा बोधि, अपना अधिकांश समय जंगलों में बिताता था.

कभी किसी वृक्ष के नीचे ध्यान लगाता तो कभी पशु-पक्षियों से बातें करता. कभी वन में ही व्यायाम शिक्षा का प्रसार करता. धर्म में प्रवीण बोधि का झुकाव बौद्ध धर्म की ओर हुआ और पिता की आज्ञा से उसने बौद्धधर्म को स्वीकारते हुए बोधिधर्मन कहलाने लगा. 

बोधि ने विकसित की मार्शल आर्ट की विधा
आधुनिक मार्शल आर्ट, प्राचीन कलारिपयट्टू का ही एक रूप है. इस विद्या के जनक द्वापरकालीन श्रीकृष्ण खुद थे. उन्होंने गोकुल-वृंदावन के जंगलों में इसका विकास किया था और साथी ग्वाल-बालों को सिखाया भी.

महारास इस विद्या का ही एक स्वरूप है, जो नृत्य की विधा के साथ सामंजस्य बिठाता है. बोधिधर्मन ने इस विद्या की दोबारा खोज की और कांचीपुरम के युवाओं को इसका प्रशिक्षण देना शुरू किया. कई बौद्ध ग्रंथों की शिक्षाओं का संकलन किया इसके साथ ही जीवाणु और विषाणु जनित महामारियों-बीमारियों की औषधि की भी खोज की. 

बौद्ध धर्म के आचार्य बने बोधिधर्मन
प्राणायाम, योग, व्यायाम, ध्यान आदि में परिपक्व होते जा रहे बोधि का मन भी अत्यंत शांत होता जा रहा था. राजपुत्र होने के बाद भी मन में हिंसा और क्रोध का तनिक भी स्थान नहीं था. उस रिक्त स्थान को करुणा ने भर दिया. और इसी करुणा ने उन्हें बौद्ध धर्म का आचार्य बना दिया.

उस दौरान बौद्ध साधु व भिक्षु भी देशाटन करने निकलते थे और अन्य राज्यों में शांति का संदेश प्रसारित करते थे. पल्लव राजा के तीन पुत्र थे. राजमाता ने सबसे छोटे बोधिधर्मन को सुदूर देशों में बौद्ध मत की शिक्षाओं के प्रसार के लिए आदेश दिया. 

चीन के लिए निकल पड़े बोधिधर्मन
बोधिधर्म आयुर्वेद, सम्मोहन, मार्शल आर्ट और पंच तत्वों को काबू में करने की विद्या जानते थे. कहते हैं कि इन विद्याओं को सिद्ध करते-करते उन्हें दैवीय शक्तियां भी हासिल हो गईं थीं. इन्हीं विद्याओं के प्रसार के लिए और अधिक से अधिक लोगों को लाभ मिले ऐसा ही सोचते हुए राजमाता ने उन्हें अन्य देशों में जाने का आदेश दिया. यह उदारनीति केवल भारत में ही हो सकती है. विद्या के प्रसार के लिए बोधि चीन के लिए निकल पड़े. 

जब चीन पहुंचे तो चीनीयों ने सत्कार नहीं किया
कई माह की कठिन यात्रा के बाद जब बोधिधर्मन चीन पहुंचे तो यहां निकटवर्ती सीमा पर ही एक गांव था नानयिन. इसे नान-किंग भी कहते थे. उस समय चीन भी ज्योतिष और अन्य विधाओं पर शोध कर रहा था, लेकिन भारत इस ज्ञान में परिपक्व हो चुका था.

उस दौरान  वहां के आधे-अधूरे ज्ञान वाले ज्योतिषियों ने भविष्य वाणी की थी कि कोई संकट आने वाला है. बोधिधर्मन ठीक उसी समय पहुंचे थे. इसलिए गांव वालों ने उन्हें ही यह संकट समझ लिया. और गांव में घुसने नहीं दिया. बोधिधर्मन बिना कुछ बोले मुस्कुराते हुए गांव से बाहर चले गए और वहीं वन में रहने लगे. गांव वालों को लगा की संकट चला गया. 

...लेकिन संकट तो आना ही था
ज्योतिषियों की भविष्यवाणी संयोग से ठीक ही थी, बस वे संकट को समझ नहीं पाए थे. दरअसरल, संकट तो एक जानलेवा महामारी के रूप में अभी आने वाला था और वह आ गया. लोग बीमार पड़ने लगे. गांव में अफरा-तफरी मच गई. अचानक लोगों को चक्कर और ज्वर आता. शरीर पर चकत्ते पड़ जाते.

कभी-कभी उनमें खून भी आ जाता और फिर उनके संपर्क में आने वाला भी पीड़ित हो जाता था.  गांव के लोग बीमारी से ग्रसित बच्चों या अन्य लोगों को गांव के बाहर छोड़ देते थे, ताकि किसी अन्य को यह रोग न लगे. 

बोधिधर्मन ने किया उपचार
बोधिधर्मन चूंकि एक आयुर्वेदाचार्य थे, तो उन्होंने ऐसे लोगों की मदद की तथा उन्हें मौत के मुंह में जाने से बचा लिया. तब गांव के लोगों को समझ में आया कि यह व्यक्ति हमारे लिए संकट नहीं बल्कि संकटहर्ता के रूप में सामने आया है. गांव के लोगों ने तब ससम्मान उन्हें गांव में शरण दी.

बोधिधर्मन ने गांव के समझदार लोगों को जड़ी-बूटी कुटने और पीसने के काम पर लगा दिया और इस तरह पूरे गांव को उन्होंने चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराकर गांव को महामारी से बचा लिया.

चीन में किया अपनी विद्या का प्रसार
इसके बाद बोधिधर्मन ने उन ग्रामीणों को लुटेरों-डकैतों की टोली से भी बचाया. अब ग्रामीण उनके पैरों में थे और उनसे अपने किए की माफी मांगने लगे. बोधिधर्मन उन्हें आत्मसम्मान सिखाया, बौद्ध धर्म में प्रवीण किया इसके साथ ही आत्मरक्षा के गुर सिखाते हुए, योग, औषधि, मार्शल आर्ट का भी प्रशिक्षण दिया. चीन में यह विद्या तेजी से प्रसारित हुई.

बोधिधर्मन वहां के बौद्ध शाओलिन मंदिर में रहने लगे और यहां अपनी सारी विद्याओं का वितरण चीनी धर्माचार्यों के साथ साझा किया. चीन, भारत के उस प्राचीन ज्ञान का साझीदार बना जिसे देवताओं का दिव्य ज्ञान कहते हैं. मार्शल आर्ट भी वहां और विकसित हुई. देखते ही देखते यह नई युद्ध विद्या चीन से निकल और आस-पास के बाकी देशों तक फैल गई. बोधिधर्मन की सिखाई इस विद्या को ‘जेन बुद्धिज्म’ का नाम दिया गया.

लेकिन चीन स्वार्थी निकला
कई वर्षों बाद जब बोधि ने भारत लौटने की इच्छा जताई तो ज्योतिषियों ने गांव पर फिर से संकट आने की भविष्यवाणी की. चीन कई विद्याओं को तो जान चुका था, लेकिन उसके मन में सच्चे ज्ञान का प्रकाश अबतक नहीं हो सका था. गांव वालों ने एक जगह एकत्र होकर यह निर्णय लिया कि अगर इस संकट से बचना है तो बोधिधर्मन को यहीं रोकना होगा किसी भी हाल में.

यदि वह नहीं रुकते हैं तो उन्हें जबरदस्ती रोकना है. उन्हें जीवित या मृत रोकना ही होगा. गांव वाले बोधि से लड़ तो सकते नहीं थे, इसलिए उनके खाने में जहर मिला दिया, लेकिन बोधिधर्मन यह बात जान गए.  

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उन्होंने सहर्ष खा लिया विष
उन्होंने गांव वालों से कहा कि तुमने ऐसा क्यों किया? तुम मुझे मारना क्यों चाहते हो? गांव वालों के कहा कि हमारे ज्योतिषियों अनुसार आपके शरीर को यहीं दफना दिया जाए तो हमारा गांव हमेशा के लिए संकट से मुक्त हो जाएगा. बोधिधर्मन ने कहा, बस इतनी सी इच्छा.

उन्होंने गांव वालों की इस बात को स्वीकार कर लिया और उन्होंने जहर मिला वह भोजन बड़े ही चाव से ग्रहण कर लिया. बोधिधर्मन की मृत्यु हो गई और भारत का एक दिव्य सूर्य चीन में कहीं अस्त हो गया. 

इस विषय में अलग-अलग मान्यताएं
चीन के ग्रामीणों की ओर से विष दिए जाने की बात निर्विरोध तौर पर कई उल्लेखों में मिलती है. लेकिन बोधिधर्मन की मृत्यु हुई थी, इस पर कई कथाएं एकमत नहीं होती हैं. कुछ लोगों का कहना है कि विष की जानकारी मिलते ही उन्होंने समझ लिया कि अब चीन को मेरी जरूरत नहीं.

ऐसे में वह अंतर्ध्यान हो गए. कुछ का कहना है कि उन्होंने अपने चार शिष्यों को बुलाकर अंतिम ज्ञान दिया और प्रयाण कर गए. बोधिधर्मन की कथा जो भी हो, लेकिन यह स्पष्ट है कि भारत ही वह देश था जिसने विश्व को मार्ग दिखाया था और यह विडंबना ही आज भारत खुद को भूला हुआ है. 

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