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स्वच्छता और प्रकृति से जोड़ने का महापर्व है 'छठ'

प्रदूषण आज की दुनिया की सबसे बड़ी महामारी बनता जा रहा है. लेकिन भारतीय परंपराओं में इसका समाधान मौजूद है. पूर्वांचल के प्रसिद्ध छठ महापर्व की परंपराओं को गौर से देखें तो पता चलता है कि इस त्योहार की सभी रीति रिवाज हमें प्रकृति से जोड़ते हैं. यही नहीं इस त्योहार के दौरान साफ सफाई की परंपरा पूरे साल की गंदगी का खात्मा कर देती है. छठ ही देश का इकलौता त्योहार है जो श्रद्धालुओं को पूरी तरह प्राकृतिक वातावरण में लेकर जाता है. इसमें अपनाए जाने वाले रीति रिवाज हमें स्वच्छ जीवन का मार्ग दिखाती हैं.

स्वच्छता और प्रकृति से जोड़ने का महापर्व है 'छठ'
प्रकृति की उपासना का महापर्व छठ

पटना: पूर्वांचल के प्रसिद्ध महापर्व छठ से अब पूरा देश परिचित है. जहां कहीं भी पूर्वांचल के लोग बसते हैं वह अपने साथ छठ महापर्व की खुशबू लेकर जरुर जाते हैं. छठ पर्व की परंपराओं को गौर से देखें तो पता चलता है कि यह पवित्र त्योहार दरअसल हमें माता प्रकृति से एकाकार होने का संदेश देता है.

मनुष्य को प्रकृति से जोड़ता है छठ महापर्व
छठ महापर्व मनुष्य को प्रकृति के साथ संयुक्त करता है. वास्तव में छठ को प्रकृति के संरक्षण का त्योहार कहना गलत नहीं होगा. छठ की परंपराओं को देखकर लगता है कि इसकी शुरुआत करने वाले विद्वानों ने प्रकृति और उसके संरक्षण को ध्यान में रखते हुए ही इस महापर्व की शुरुआत करवाई होगी. इस त्योहार में मनुष्य अपनी माता प्रकृति के बेहद करीब पहुंच जाता है.

वास्तव में देखा जाए तो छठ का व्रती अपनी उपासना के चार दिनों के दौरान किसी मूर्ति या मंदिर में पूजा नहीं करता है. बल्कि प्रकृति माता और सूर्यनारायण जैसे जीवंत दृश्यमान देवता को अपने हृदय में उतारता है.

सफाई है पहली शर्त
छठ महापर्व के दौरान सबसे पहले हर तरफ साफ सफाई की जाती है. इस पर्व के दौरान गलियों, मुहल्लों, सड़कों के साथ साथ रास्तों, बागीचों, नदियों, जलाशयों की सफाई कर दी जाती है गांव के पोखर और कुएं तो विशेष तौर पर साफ किए जाते हैं. वास्तव में छठ महाव्रत सदियों पुराना स्वच्छ भारत अभियान ही है. इस पर्व की पहली शर्त ही सफाई है.

आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भले ही पूरे देश में स्वच्छता का अभियान चला रहे हैं. लेकिन पूर्वांचल के लोगों ने सदियों पहले ही सफाई का महत्व को समझ लिया था. इसलिए उन्होंने सदियों पहले ही साल में एक बार कार्तिक के महीने में छठ के मौके पर पूरे साल की गंदगी को साफ करने का वक्त चुना. 

हालांकि सफाई दीपावली में भी होती है, लेकिन सिर्फ घरों के अंदर. लेकिन छठ के दौरान तो पूरा इलाका ही साफ कर दिया जाता है. 

जल की स्वच्छता का विशेष ध्यान
छठ महापर्व के दौरान पानी की शुद्धता का बहुत ज्यादा ध्यान रखा जाता है. इसीलिए छठ के दौरान हर तरह के प्राकृतिक जलाशयों की सफाई कर दी जाती है. क्योंकि इस व्रत की शुरुआत और समापन अर्घ्य देने से होता है. इसलिए सफाई के दौरान विशेष ध्यान रखा जाता है कि अर्ध्य देने के दौरान सूर्य की किरणें साफ पानी से परावर्तित होकर व्रतियों और श्रद्धालुओं के उपर पड़े. 

किसानों और मिट्टी से जुड़ा है छठ महापर्व
छठ महा पर्व के केन्द्र में कृषि, मिट्टी और किसान रहते हैं. धरती से उपजी हुई सामयिक फसलें और फल-सब्जी ही इस व्रत के दौरान प्रसाद के रुप में चढ़ाई जाती है. स्वच्छ मिट्टी से बने चूल्हे पर और मिट्टी के बर्तन में नहाय-खाय, खरना और पूजा का  प्रसाद तैयार किया जाता है. प्रकृति की गोद में उपजे बांस से बने सूप में पूजन सामग्री रखकर अर्घ्य दिया जाता है. बांस का बना सूप, दौरा, टोकरी, मउनी तथा मिट्टी से बना दीप, चौमुखा व पंचमुखी दीया और कंद-मूल व फल जैसे ईख, सेव, केला, संतरा, नींबू, नारियल, अदरक, हल्दी, सूथनी, पानी फल सिंघाड़ा , चना, चावल (अक्षत), ठेकुआ जैसी छठ पूजा की सामग्रियां हमें प्रकृति से जोड़ती हैं. 

परंपराओं का सम्मान करना सिखाता है छठ महापर्व
पुरानी परंपरागत वस्तुएं बिल्कुल बेकार नहीं हैं. छठ महापर्व के लिए ईंख, गागर नीबू, सुथनी, शरीफा कमरख, शकरकंद जैसे देसी फलों की जरुरत पड़ती है. जो कि हमें स्ट्रॉबेरी, एप्पल,पाइनेपल, कीवी जैसे विदेशी फलों वाले जमाने में भी इन परंपरागत फलों और सब्जियों का स्वास्थ्यवर्द्धक महत्व समझाता है. 

यही नहीं गुड़ की खीर, कद्दू की सब्जी, कचरी, कोहड़ा, अगस्त्य के फूल जैसी सब्जियां और पूड़ी जैसे प्राचीन भारतीय परंपरागत भोजन का स्वाद आज के मुगलई,थाई, चाइनीज, इटालियन फूड के जमाने में भी हमें अपनी स्वास्थ्यवर्द्धक परंपराओं की याद दिलाता है. यह छठ की ही देन है. 

लैंगिक समानता का संदेश देता है छठ महापर्व
छठ महापर्व के दौरान चार दिनों तक महिलाओं की प्रधानता रहती है. घर और समाज में सारे काम उनसे पूछकर ही किए जाते हैं. यहां तक कि पूर्वांचल जैसे पितृसत्तात्मक समाज में भी महिलाओं की प्रधानता छठ महापर्व के समय स्थापित हो जाती है. हमारे देश में ऐसा छठ के अतिरिक्त कोई दूसरा ऐसा पर्व नहीं है, जिसे शादीशुदा महिलाएं, विधवा, कुंवारी, गर्भवती आदि सभी स्त्रियां एक साथ कर सकती हों।

बाकी सभी त्योहारों में अलग अलग श्रेणी की महिलाओं के लिए अलग नियम होते  हैं लेकिन छठी मैया के दरबार में सभी महिलाएं एक समान हैं। 

छठ महापर्व है जातीय रुढ़िवाद के विरुद्ध
पूर्वांचल के रुढ़िवादी समाज में जातीय व्यवस्था हमेशा से एक गंभीर समस्या के रुप में मौजूद रहती है. लेकिन छठ महापर्व के दौरान जातीय व्यवस्था की रुढ़ियां भी टूट जाती हैं. जिस डोम समाज को लोग अंत्यज मानते हैं, उनके बनाए हुए सूप के बिना छठ पर्व संपन्न हो ही नहीं सकता है.  कुम्हार द्वारा बनाये गये मिट्टी के चूल्हे, बर्तन, दीये आदि की इस पर्व में विशेष अहमियत होती है. इनके अलावा नाइन, माली, आदि की भी अहम भूमिका होती है. 

छठ महापर्व के दौरान किसी पुरोहित की जरुरत नहीं पड़ती है. इसे हर समुदाय उतनी ही श्रद्धा और विश्वास से मनाता है. बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के. यहां तक कि यह त्योहार केवल महिलाओं एवं पुरुषों द्वारा ही नहीं, बल्कि किन्नर समुदाय द्वारा भी उतनी ही श्रद्धा से किया जाता है.  

सादगी का त्योहार है छठ महापर्व
आज अमीर हों या गरीब या मध्य वर्ग से आते हों. छठ महापर्व के रीति रिवाज सबके लिए एक समान हैं. इस व्रत को शुद्ध मन से करने का संकल्प रखने वाला प्रकृति और परमेश्वर से एकाकार होने में सफल हो जाता है.  मनुष्य और ईश्वर के बीच किसी माध्यम की जरुरत नहीं होती.  इसी कारण सभी धर्म, जाति और संप्रदाय के लोगों द्वारा अपनी इच्छाशक्ति से छठ पर्व का अनुष्ठान पूरी श्रद्धा एवं विधि-विधान से किया जाता है. 

भक्ति और अध्यात्म के सर्वोत्तम भावों से परिपूर्ण इस पर्व के लिए न बड़े पांडालों की जरूरत होती है और न ही बड़े-बड़े मंदिरों की और ना ही इसके लिए चमक-दमक वाली मूर्तियों की जरूरत होती है. 

 यह पर्व बांस से बनी टोकरी, मिट्टी के बर्तनों, गन्ने के रस, गुड़, चावल और गेहूं से बना प्रसाद, और कानों में शहद घोलते लोकगीतों के साथ जीवन में भरपूर मिठास घोलता है. नदी, नहर, सरोवर, पोखर, तालाब जैसे जलाशयों की ओर हाथ में पूजन-सामग्री लेकर जाते जन समूह में जाति, समुदाय, अमीरी, गरीबी, सामाजिक विषमता का भेद भाव कहीं विलीन हो जाता है.