खेती, पशुधन और वनऔषधियों के प्रति कृतज्ञता का व्रत है हलषष्ठी

हलछठ पशुधन, कृषि व्यवस्था और वन्य संपदा के प्रति नतमस्तक होने का दिन है. माताएं श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम और छह कृत्तिकाओं का पूजन कर अपनी संतान के लिए बल और आयुष्य की कामना करती हैं. 

खेती, पशुधन और वनऔषधियों के प्रति कृतज्ञता का व्रत है हलषष्ठी

नई दिल्लीः भारत भूमि, तपस्वियों की स्थली और रत्नगर्भा यह धरती, जितनी विचित्रताओं से भरी है, उतनी ही उन्नत यहां की संस्कृति है. वह संस्कृति जो प्राकृतिक है और ऐश्वर्य से भरपूर है. भारतीय मनीषा ने समूह में रहने वाले मानव समुदायों के लिए त्योहारों और पर्वों का सृजन किया. यह त्योहार ही हैं जो हर एक व्यक्ति को बार-बार जीवन और प्रकृति का चक्र समझाते हैं. पारिस्थितिकी तंत्र की जरूरत को समझाते हैं. 

खेती-किसानी और प्रकृति का पूजन
भाद्रपद कृष्ण षष्ठी को मनाया जाने वाला विशेष उत्सव और व्रत हलछठ ऐसा ही प्रतीक है. जो कि पशुधन, कृषि व्यवस्था और वन्य संपदा के प्रति नतमस्तक होने का दिन है. माताएं श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम और छह कृत्तिकाओं का पूजन कर अपनी संतान के लिए बल और आयुष्य की कामना करती हैं.

इसके साथ ही गाय-भैंस, खेती-किसानी और वन औषधियों को भी प्रणाम करती हैं. 

भैंस के दूध का करते हैं सेवन
यहां यह तथ्य स्पष्ट तरीके से रखने की जरूरत है कि अक्सर लोग सवाल करते हैं कि सिर्फ गाय ही क्यों पूजित है, भैंस का भी दूध तो पीते हैं. ऐसे बेतुके सवालों के लिए हलषष्ठी पर्व खरा जवाब है.

इस पर्व के दिन भैंस के दूध का पूजन कर उसका विशेष तौर पर प्रसाद के साथ सेवन किया जाता है. जहां गोपाष्टमी पर्व गऊ पूजन के लिए है, वैसे ही हलषष्ठी व्रत भैंस के दूध का सम्मान दिवस है. 

बलराम से ऐसे जुड़ा है व्रत
कथा है कि कंस ने अपनी बहन देवकी और बहनोई वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया था. अपने काल को टालने के लिए वह देवकी के हर जन्मी नवजात संतान की हत्या कर रहा था. इससे आहत देवकी ने कार्तिकेय की मां पार्वती यानी कि स्कंदमाता का आह्वान किया.

स्कंदमाता ने उन्हें कृत्तिका व्रत करने को कहा. देवकी ने भाद्रपद मास में ही इस व्रत का अनुष्ठान किया. 

इसलिए बलराम का एक नाम संकर्षण भी है
परिणाम स्वरूप उनके गर्भ में सातवीं संतान का आगमन हुआ. समय बीतने के साथ गर्भ बढ़ता गया और कंस उसके जन्म की प्रतीक्षा करने लगा, लेकिन संतान की जन्म से पहले ही एक दिन वसुदेव की पहली पत्नी रोहिणी कारागार में देवकी से मिलने आईं.

दैवयोग से देवकी का गर्भ खींच कर रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर दिया गया. गर्भ को खींचा यानी कर्षण किया गया, इसलिए बलराम के जन्म का नाम संकर्षण रखा गया. भगवान बलराम का एक नाम संकर्षण भी है. 

कृषिकर्म और पशुपालन के प्रतीक हैं बलराम
बलराम भारतीय संस्कृति में कृषि पालकों और पशु पालकों के प्रतिनिधि प्रतीक हैं. उनके जैसा बलवान और समर्थ पुत्र की इच्छा से माताएं षष्ठी मां की पूजा करती हैं. भैंस के दूध का प्रयोग से बनी चीजों से देवी पूजा करती हैं.

बलराम जयंती पर हल के उपयोग से तैयार फसल से बने व्यंजनों का सेवन नहीं किया जाता है. पसहर चावल यानि स्वयं उग आए चावलों की खीर बनाती हैं. पांच प्रकार की पत्तेदार सब्जियों से सब्जी बनाई जाती है. माताएं पुत्र की बल वृद्धि और दीर्घायु के लिए इस दिन षष्ठी पूजा करती हैं.

भक्तों! मां वैष्णों देवी बुला रही हैं, जल्दी ही कटरा में फिर गूंजेगा जय माता दी

जानिए क्या है रामार्चा पूजन, अयोध्या में भूमि पूजन से पहले हुआ अनुष्ठान