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हजार खंभों वाले इस मंदिर में स्थापित हैं भगवान शिव के साथ श्रीहरि और सूर्य देवता

भारत मंदिरों की भूमि है. यहां अजीबोगरीब और अनोखे मंदिर बने हुए हैं. इसी में से एक है हजार खंभों वाला रुद्रेश्वर स्वामी मंदिर, जहां महादेव के साथ श्रीहरिण विष्णु और सूर्य देवता भी विराजमान हैं.

हजार खंभों वाले इस मंदिर में स्थापित हैं भगवान शिव के साथ श्रीहरि और सूर्य देवता
हजार खंभों वाला रहस्यमय रुद्रेश्वर मंदिर

हैदराबाद: तेलंगाना के वारंगल में पूरे एक हजार स्तंभों वाला रुद्रेश्वर मंदिर स्थित है. वारंगल शहर काकतीय वंश के राजाओं की राजधानी थी. जिन्होंने यहां पर अपने आराध्य रुद्रेश्वर के मंदिर की स्थापना की थी.

हजार खंभों वाले मंदिर के नाम से है मशहूर
रुद्रेश्वर एक ऐतिहासिक मन्दिर है. इस मंदिर की सबसे खास बात ये है कि यहां एक साथ भगवान विष्णु, भगवान शिव और भगवान सूर्य की आराधना की जाती है. ये मंदिर बहुत प्राचीन है. इसका निर्माण काकतिय नरेश राजा रूद्र देव ने 1163 में करवाया था. इस मंदिर के निर्माण के दौरान बेहतर नक्काशी और उन्नत तकनीक का इस्तेमाल किया गया था. इस मंदिर का प्रभावशाली प्रवेशद्वार, हजार विशाल खम्भे और छतों के शिलालेख आकर्षण केंद्र हैं। हज़ार स्तंभो वाला मंदिर यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है और दक्षिण भारत के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है।

पहाड़ी पर स्थित है मंदिर
रुद्रेश्वर मंदिर वारंगल की हनमकोंडा पहाड़ी पर स्थित है। इस मंदिर को रुद्रेश्वर स्वामी मंदिर नाम से जाना जाता है। मंदिर परिसर में 1000 स्तंभ होने की वजह से इसे हज़ार स्तंभों वाला मंदिर कहा जाता है। मंदिर के मुख्य दरवाजे पर भगवान शिव के प्रिय नन्दी बैल की विशाल प्रतिमा स्थापित है। जिसे एक काले पत्थर को तराश कर बनाया गया है।

तीन देवताओं का समर्पित है मंदिर
वारंगल का रुद्रेश्वर इकलौता ऐसा मंदिर है जो एक तारे के आकार का बना है. इस मंदिर की खासियत यह है कि यहां एक ही छत के नीचे तीन देवताओं की मूर्तियां स्थापित है. जिसमे शिव और विष्णु के साथ सूर्य देवता शामिल है. इसलिए इसे 'त्रिकुटल्यम' भी कहते हैं. आम तौर पर महादेव और श्री हरि के साथ ब्रह्मा की ही पूजा  होती है. लेकिन यह ऐसा इकलौता मंदिर हैं जहां ब्रह्मा की जगह सूर्य देवता विराजमान हैं.

स्वयंभू हैं रुद्रेश्वर महादेव
रुद्रेश्वर के मंदिर का शिवलिंग स्वयंभू है. एक कथा के मुताबिक 12वीं सदी के दौरान अनाज बाज़ार हनामकोंडा में जाने के लिए किसान इसी जगह से गुजरते थे. एक दिन यहां पर किसी किसान की बैलगाड़ी का पहिया कीचड़ में फंस गया. जब लोगों ने उस पहिये को बाहर निकालने की कोशिश की तो उन्हें वहां पर एक शिवलिंग दिखा. बाद में लोगों ने इसी स्थान पर मंदिर का निर्माण किया. इसी कारण इस मंदिर को स्वयंभू नाम पड़ा. स्वयंभू का शाब्दिक अर्थ है अपने आप जन्मा हुआ. इस मंदिर को 14वीं शताब्दी में आक्रमणकारियों ने नष्ट कर दिया था. मंदिरों के अवशेषो को जोड़ कर इसका निर्माण फिर से किया गया है. मंदिर के के चारों ओर बड़े-बड़े मेहराब हैं, जो काकतीय साम्राज्य की वास्तुकला की मिसाल हैं.