Vijayadashmi Special: बुरे को जला डालिए, लेकिन बचा लीजिए रावण की ये अच्छाइयां

समय इतना बदल गया है कि हम श्रीराम और रावण को महज इतना ही जानते हैं कि दोनों ने एक युद्ध किया था. विजयदशमी केवल रावण दहन का प्रतीक है और बीते कई दशकों से बुराई पर अच्छाई की जीत की Tagline इतनी बड़ी हो गई है, उसके आगे श्रीराम और रावण दोनों का कद कहीं न कहीं बौना हो रहा है. जरूरत है तो रावण को पहचानने की और यह भी कि उससे गलती कहां हुई. 

Vijayadashmi Special: बुरे को जला डालिए, लेकिन बचा लीजिए रावण की ये अच्छाइयां

नई दिल्लीः एक बार फिर विजयदशमी का उत्सव सामने हैं. श्रीराम शरसंधान किए खड़े हैं. कमान को कान तक खींच कर तान चुके हैं. दृष्टि लक्ष्य की ओर और चित्त शांत. ज्वाला उगलता तीर हाथ से छूटना ही चाहता है. बस, चुटकियों को हल्की सी ढील और सनसनाता तीर रावण की नाभि पर प्रहार कर देगा, लेकिन, रुकिए. ठहरिए थोड़ा. यह जो आतिशबाजी के पुंजों के बीच घिरा है, क्या यह रावण है, क्या इसकी इतनी ही पहचान है कि यह बुराई का प्रतीक है?

ऐसा तो नहीं कि हमें केवल इतना सा ही रावण याद रह गया है जिसने सीता हरण किया. राम के विराट व्यक्तित्व के आगे यह पहचान तो बौनी साबित हुई. यानी हमनें श्रीराम के व्यक्तित्व को भी छोटा ही समझ लिया है. छवि बनाने के इस पूर्वाग्रह से बाहर निकलते हुए एक बार सिर उठाकर रावण की ऊंचाई तक देख लेना जरूरी है. 

जानिए, कौन है रावण
रावण..वह महान ऋषि विश्श्रवा का पुत्र है और पुलस्त्य ऋषि का पोता. पीढ़ियों की इस सीढ़ी पर चढ़ें तो रावण ब्रह्मा के कुल में जन्म लेने वाला सहज ही कुलीन ब्राह्मण था. पीढ़ियों के यह संस्कार उसमें जन्म से ही थे जो कि किशोर अवस्था तक आते-आते प्रतिभा के साथ-साथ और भी गहरे हो गए.

लेकिन जैसे पूर्णिमा का चंद्र भी कलंकित सा दिखता है, ठीक वैसे ही माता कैकसी के कारण अनायास ही मिले राक्षसी प्रभाव भी जब-तब रावण में जोर मारते रहते थे. 

ऐसे हुआ कैकसी का ऋषि विश्श्रवा से विवाह
एक शाम जब ऋषि विश्श्रवा संन्ध्या वंदन कर रहे थे दानव राज सुमाली की पुत्री ने छल से आकर उनसे विवाह का प्रस्ताव रख दिया. वचनवद्ध ऋषि को विवाह करना पड़ा, लेकिन मन ही मन वह खिन्न हो गए.

तिस पर नीम पर चढ़े करेले की तरह कैकसी सौतिया डाह में जलती हुई ऋषि की पहली पत्नी के पुत्र कुबेर से भी श्रेष्ठ पुत्र चाहती थी. कुबेर की तपनिष्ठा से प्रसन्न होकर महादेव ने उसे यक्षअधिपति बना दिया था और देवताओं के कोष का रक्षक घोषित किया. कुबेर को लंका मिली और भारद्वाज ऋषि का बनाया पुष्पक विमान भी. 

माता-पिता की अवस्था का असर
कैकसी से यह सब देखा न गया और उसने ऋषि के साथ अशुभकाल में संयोग के जरिए रावण-कुंभकर्ण और शूर्पणखा जैसी संतानें प्राप्त कीं. ऋषि का खिन्न मन और अशुभकाल का संयोग इतना प्रभावी हुआ कि जन्म लेते ही रावण ने अट्टहास किया तो दिशाएं रोने सी लगीं. कैकसी और सुमाली प्रसन्न हुए और नाम रखा रावण, यानी जो सबको रुला दे.

खिन्न ऋषि ने संतान के जन्म के बाद ही तपस्या का मार्ग अपनाया. हरिकृपा से विभीषण का भी जन्म हुआ, लेकिन उसका स्वभाव माता के विचारों के विपरीत था. इस तरह रावण के जन्म को देखें तो यह आज के समाज के लिए स्पष्ट संदेश है कि संतान को जन्म देने जिम्मेदारी भरा कर्तव्य है.

इसलिए गर्भ काल में परिवार का वातावरण आनंदमयी रखना चाहिए. दूसरी बड़ी बात है कि ऋषि ने अशुभ काल को इतना प्रबल मान लिया कि जब उन्हें उनकी देखभाल अपने अनुसार करनी थी, तब रावण अपने ननिहाल में पला. संस्कार बचपन से ही सिद्ध होते हैं. 

राक्षस संस्कार, लेकिन जीवित रहा ब्राह्मण
इसके बावजूद रावण का ब्राह्मण तत्व कम नहीं था. बल्कि कई सालों तक उसके में मन में एक युद्ध सा चलता रहा. वह जप करने बैठता तो लीन हो जाता, मंत्र-पूजा करता तो अनायास ही लंबी साधना लग जाती थी. मन में बार-बार उठ रहे उद्वेग को शांत करने का उपाय खोजा करता, लेकिन इस ओर से निराशा ही मिलती, उधर सुमाली जो कि कई सालों से रावण से आशा लगाए बैठा था,

उसे उकसाने की कोशिश करता रहता है और धीरे-धीरे देवताओं के प्रति उसमें जहर भरता जाता. एक दिन वह समय आ ही गया जब रावण ने वर्षों की तपस्या से प्राप्त सिद्धियों के बल पर दक्षिण के राज्यों को जीतना प्रारंभ कर दिया. 

इतनी कठिन तपस्या की
धीरे-धीरे प्रबल होते अहंकार में और अधिक शक्तियां अर्जित करने के लिए रावण ने अपने दोनों भाइयों के साथ ब्रह्मदेव की तपस्या की. जब कई कल्पों तक भी ब्रह्म देव प्रसन्न नहीं हुए तो रावण ने अपना शीष काट दिया, लेकिन मृत्यु काल न होने के कारण शीष पुनः जु़ड़ गया,

ऐसा रावण ने 10 बार किया को ब्रह्मदेव को आना पड़ा और वरदान भी देना पड़ा कि सुर, नाग, किन्नर, यक्ष, गंधर्व आदि कोई उसे जीत न सके. अभिमान में रावण मनुष्य नहीं बोला. ब्रह्मा ने तथास्तु कह दिया. 

घायल अवस्था में रच दिया शिव तांडव स्त्रोत
प्रताप व तेज मिलने के बाद पहले रावण ने कुबेर से लंका और पुष्पक छीन लिया. फिर देवलोक पर चढ़ाई की. ग्रहों को बंदी बना लिया. यमराज को पाश में बांध लिया और मृत्यु को सिंहासन के नीचे चौकी बनाकर रख लिया. इसी गुमान में एक दिन वह कैलाश की ओर बढ़ रहा था.

नंदी ने उसका रास्ता रोका तो रावण ने बंदरमुख वाले कहकर अपमान कर दिया. फिर रावण महादेव समेत ही कैलाश को उठाने लगा, तो शिव ने अंगूठे से बल लगाकर उसे दबा दिया, रावण के हाथ दब गए तो उसने हार मानते हए उसी अवस्था में शिवतांडव स्त्रोत की रचना की. 

संस्कृत में लिखी यह शिव स्तुति आध्यात्म के लिए वरदान है. प्रसन्न महादेव ने उसे चंद्रहास खड्ग दिया. 

जब रावण ने राम से कहा- विजयी भवः
एक कथा कही जाती है कि जब राम वानरों की सेना लेकर समुद्र तट पर पहुंचे, तब उन्होंने विजय यज्ञ किया. पूर्णाहुति के लिए देवताओं के गुरु बृहस्पति को बुलावा भेजा गया, लेकिन वह आ न सके. सोच-विचार के बीच उपाय हुआ कि लंकापति रावण को ही बुलाया जाए क्योंकि वह ब्राह्मण भी हैं और ब्रह्मकुल के भी.

रावण यज्ञ पूर्ण करने लिए आया साथ ही देवी सीता को भी लेकर पहुंचा, क्योंकि बिना अर्धांगिनी के यज्ञ का फल नहीं मिलता. रावण ने यज्ञ पूर्ण करके राम को विजय का आशीर्वाद भी दिया. मंत्रियों ने रावण से इसका कारण पूछा तब रावण ने कहा- महापंडित रावण ने यह आशीर्वाद दिया है, राजा रावण ने नहीं. 

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महाप्रतापी रावण की रचनाएं
रावण का जीवन महज युद्ध-अनाचार, अभिमान तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वह शोध, विज्ञान, साहित्य, पांडित्य, ज्योतिष और दर्शन जैसे विषयों में भी रुचि लेता था. उसने कई तंत्र ग्रंथों की रचना की. मान्यता है कि लाल किताब (ज्योतिष का प्राचीन ग्रंथ) भी रावण संहिता का अंश है.  रावण ने यह विद्या भगवान सूर्य से सीखी थी. 

इसके अलावा रावण ने ही अंक प्रकाश, इंद्रजाल, कुमारतंत्र, प्राकृत कामधेनु, प्राकृत लंकेश्वर, ऋग्वेद भाष्य, रावणीयम, नाड़ी परीक्षा आदि पुस्तकों की रचना की थी. जन्म कुण्डली, हस्त रेखा तथा सामुद्रिक शास्त्र का मिश्रण ही लाल किताब है. 

रावण का शासन
रावण ने असंगठित राक्षस समाज को एकत्रित कर उनके कल्याण के लिए कई कार्य किए. रावण ने सुंबा और बाली द्वीप को जीतकर अपने शासन का विस्तार करते हुए अंगद्वीप, मलय द्वीप, वराह द्वीप, शंख द्वीप, कुश द्वीप, यव द्वीप और आंध्रालय पर विजय प्राप्त की थी.

इसके बाद रावण ने लंका को अपना लक्ष्य बनाया. आज के युग के अनुसार रावण का राज्य विस्तार इंडोनेशिया, मलेशिया, बर्मा, दक्षिण भारत के कुछ राज्य और संपूर्ण श्रीलंका तक था. 

आयुर्वेद का भी ज्ञाता था लंकेश
रावण अपने युग का प्रकांड पंडित ही नहीं, वैज्ञानिक भी था. आयुर्वेद, तंत्र और ज्योतिष के क्षेत्र में उसका योगदान महत्वपूर्ण है. इंद्रजाल जैसी अथर्ववेदमूलक विद्या का रावण ने ही अनुसंधान किया. उसके पास सुषेण जैसे वैद्य थे, जो देश-विदेश में पाई जाने वाली जीवनरक्षक औषधियों की जानकारी स्थान, गुण-धर्म आदि के अनुसार जानते थे.

चिकित्सा और तंत्र के क्षेत्र में रावण ने दस शतकात्मक अर्कप्रकाश,  दस पटलात्मक उड्डीशतंत्र, कुमारतंत्र और नाड़ी परीक्षा जैसे ज्ञानग्रंथ भी रचे थे. 

संगीत का प्रेमी रावण
संगीत के क्षेत्र में भी रावण की विद्वता अपने समय में अद्वितीय मानी जाती है. वीणा बजाने में रावण सिद्धहस्त था. उसने एक वाद्य बनाया भी था. आज का रावण हत्था उसी वाद्य का परिष्कृत स्वरूप है. रावण ने कुछ रागों की रचना भी की थी और नृत्य की कई शैलियों का सुधारक भी था. हालांकि समय के साथ उसके अर्जित कई ज्ञान लुप्त हो गए हैं. 

तो जो तीर धनुष की खींची हुई प्रत्यंचा पर चढ़ा है, उसे एक झटके में खींचकर एक विद्वान की विद्वता नहीं खत्म करनी है. उसकी पहचान नहीं जलानी है. सिर्फ बुराई को मारना है, रावण को नहीं. धर्म भी कहता है पाप को मारो पापी को नहीं. इसलिए बुरे को जला डालिए, लेकिन रावण की अच्छाई को बचा ले जाइए. विजयदशमी की शुभकामनाएं.

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