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धनतेरस विशेष: जानिए क्या है आज के दिन का महत्व

दिवाली के एक दिन पहले देशभर में धनतेरस का त्योहार मनाया जा रहा है. आज का दिन कई मायनों में खास है. इस दिन को धन संपत्ति के साथ स्वास्थ्य प्रदान करने वाला भी माना जाता है. इस दिन धन की देवी माता लक्ष्मी के साथ स्वास्थ्य के देवता भगवान धन्वंतरि की पूजा की जाती है. जो कि दोनों भाई बहन माने जाते हैं. क्योंकि लक्ष्मी माता और धन्वंतरि देव दोनों ही समुद्र से उत्पन्न हुए हैं.   

धनतेरस विशेष: जानिए क्या है आज के दिन का महत्व
समुद्र से उत्पन्न धन्वंतरि और मां लक्ष्मी हैं भाई बहन

नई दिल्ली: धन-तेरस, इस शब्द में दो अहम संकेत छिपे हुए हैं. पहला तो धन, जिसे पाने की लालसा सबके दिलों में रहती है. दूसरा धन्वंतरि, जो आरोग्य के देवता माने जाते हैं. उनका अवतरण आज ही के दिन हुआ था. इसीलिए धनतेरस के दिन को धन संपत्ति के साथ साथ स्वास्थ्य और आरोग्य देने वाला भी माना जाता है. 

आज ही समुद्र से अवतरित हुए थे आरोग्य के देवता धन्वंतरि
धन्वंतरि देव की उपासना स्वास्थ्य और आरोग्य के लिए की जाती है. पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक देवता और दानवों ने जो समुद्र मंथन किया था, उसके परिणाम स्वरुप आज ही के दिन धन्वंतरि देव अपने हाथों में अमृत कलश लेकर समुद्र से अवतरित हुए थे. इसीलिए इस दिन को धन्वंतरि अवतरण दिवस के तौर पर मनाया जाता है. 
भगवान धन्वंतरि को ही प्राचीन भारतीय चिकित्सा संहिता के अभूतपूर्व ग्रंथ सुश्रुत संहिता का जनक माना जाता है. मान्यता के अनुसार उन्होंने ही देवताओं के लिए सोमरस का निर्माण किया था. जिसका पान करके देवता चिरायु और सदैव युवा रहते थे. धन्वंतरि ने मनुष्यों को अकाल मृत्यु से बचाने का उपाय तलाश किया था. इसलिए धन्वंतरि देव को हाथों में अमृत कलश लेकर दर्शाया जाता है. धन्वंतरि देव हमें बताते हैं कि स्वास्थ्य ही मनुष्य का वास्तविक धन है. जिसके संरक्षण के लिए धनतेरस मनाया जाता है. 

अकाल मृत्यु से बचने के लिए यम को समर्पित करते हैं दिया
मनुष्य जाति को अकाल मृत्यु से बचाने के लिए धनतेरस की रात को यम का दिया निकालने की प्रथा है. भगवान धन्वंतरि ने मनुष्य को अकाल मृत्यु से बचाने के चिकित्सकीय उपाय प्रदान किए थे. जिसके प्रतीक स्वरुप मृत्यु के देवता यमराज को प्रसन्न करके स्वयं को अकाल मृत्यु से बचाने के लिए यम का दिया निकालने की प्रथा की शुरुआत हुई. धनतेरस की रात तीसरे प्रहर(आधी रात बीत जाने के बाद) घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की तरफ मुंह करके एक दिया जलाया जाता है. इसे कई जगहों पर ''जमदिवा''(यम का दिया) कहा जाता है. इस दीपक का मुख दक्षिण दिशा में रखा जाता है. क्योंकि दक्षिण दिशा यम की दिशा मानी जाती है. 

नए बर्तन या आभूषण खरीदने की परंपरा
धनतेरस के दिन से ही दीपावली की खरीदारी शुरु हो जाती है. धनतेरस को पूरे घर के साथ पूजा स्थल की भी सफाई हो जाती है. मां लक्ष्मी का आह्वान करते हुए उनके प्रतीक स्वरुप नए बर्तन या सोने चांदी के आभूषण खरीदे जाते हैं. बच्चों को नए वस्त्र दिलाए जाते हैं. दीपावली के लिए मिष्टान्न भोजन तैयार किया जाता है. ऐसा करने से माता लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और पूरे वर्ष घर में धन धान्य और संपत्ति का आगमन जारी रहता है. 

धनतेरस के दिन को प्राप्त है माता लक्ष्मी का आशीर्वाद
पौराणिक आख्यानों के मुताबिक धनतेरस के दिन को माता लक्ष्मी का विशेष आशीर्वाद प्राप्त हुआ है. इसके पीछे एक विशेष कथा कही गई है, जो इस प्रकार है- 
एक बार भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी विचरण करने के लिए धरती पर आए. धरती पर पहुंचने के बाद भगवान माता लक्ष्मी को बिठाकर किसी से मुलाकात करने चले गए. उन्होंने उन्हें दक्षिण दिशा में जाने से मना किया था. लेकिन माता लक्ष्मी खुद को रोक नहीं पाईं और दक्षिण दिशा की तरफ बढ़ीं. वहां किसी किसान का सरसो और गन्ने का खेत था. जहां पहुंचकर माता लक्ष्मी ने कुछ सरसों के फूल तोड़े और गन्ने का स्वाद लेने लगीं. 
जब भगवान विष्णु लौटे तो उन्होंने माता लक्ष्मी को किसान की खेती नष्ट करने के अपराध का दोषी मानते हुए 12 वर्ष के लिए उनका त्याग कर दिया और स्वयं बैकुण्ठ लौट गए. उनके आदेशानुसार 12 वर्षों के लिए माता लक्ष्मी को किसान परिवार के साथ ही रहना था. 
लक्ष्मी जी ने किसान और उसकी पत्नी को अपनी पूजा की विधि सिखाई. जिसके बाद किसान का घर धन धान्य और संपत्ति से भर गया. क्योंकि उस घर में स्वयं माता लक्ष्मी विराजमान थीं. 12 वर्षों तक उस किसान परिवार में सुख और समृद्धि का माहौल रहा. 
12 वर्षों बाद धनतेरस के दिन जब भगवान विष्णु माता लक्ष्मी को ले जाने आए तो किसान परिवार ने रो-रोकर माता से वहीं रुकने का अनुरोध किया. जिससे दयार्द्र होकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी ने किसान परिवार को धनतेरस की पूजा विधि समझाई और कहा कि इस पूजा से तुम्हें पूरे वर्ष उसी तरह धन धान्य और समृद्धि प्राप्त होगी. जिसके बाद धरती पर धनतेरस की पूजा प्रारंभ हुई. क्योंकि इस पूजा से पूरे वर्ष समृद्धि बनी रहती है. 

कुछ इस तरह माता लक्ष्मी ने बताई थी धनतेरस की पूजा विधि
माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु के साथ बैकुण्ठ लोक लौटते समय किसान से कहा कि हे कृषक, पूरे वर्ष धन समृद्धि प्राप्त करने के लिए घर को लीप-पोतकर स्वच्छ करना। सांयकाल मेरा पूजन करना और रात्रि में घी का दीपक जलाकर रखना. इसके साथ ही एक तांबे के कलश में रुपया भरकर मेरे निमित्त रखना, मैं उस कलश में निवास करूंगी. पूजा के समय मैं अदृश्य रुप में वहां उपस्थित रहूंगी. इस तरह पूजा करने से मैं वर्ष भर तुम्हारे घर पर अपनी कृपा बनाए रखूंगी. जिसके बाद माता लक्ष्मी दसों दिशाओं में प्रकाश फैलाते हुए प्रभु श्रीहरि के साथ बैकुण्ठ लौट गईं. 

इसके बाद से धनतेरस के दिन माता लक्ष्मी की पूजा की परंपरा शुरु हुई. जो पूरे साल भक्तों को धन धान्य से समृद्ध बनाए रखती है.