धर्मसंकट में शिवसेनाः क्या छोड़ना पड़ेगा कट्टर हिंदुत्ववादी रुख

अगर कांग्रेस के साथ सरकार बनाने की शर्त यही रही कि शिवसेना को कट्टर हिंदुत्ववादी छवि का रुख छोड़ना पड़ेगा तो हो सकता है कि इसके बाद पार्टी की अपनी पहचान ही खत्म होने के कगार पर आ जाए. इसके पहले बाला साहेब ठाकरे इसका अंजाम भुगत चुके हैं. आज शाम तक कांग्रेस का प्रतिनिधमंडल सोनिया गांधी को महाराष्ट्र में सरकार बनाने और एनसीपी से हुई बातचीत की रिपोर्ट सौपेंगे.

धर्मसंकट में शिवसेनाः क्या छोड़ना पड़ेगा कट्टर हिंदुत्ववादी रुख

मुंबईः धर्मसंकट क्या है? वही जिसमें इस वक्त शिवसेना फंसी नजर आ रही है. ऐसा इसलिए है क्योंकि सूत्रों के अनुसार खबर आई है कि कांग्रेस सरकार बनाने से पहले शिवसेना से धर्मनिरपेक्षता पर वादा चाहती है. कांग्रेस चाहती है कि अभी तक कट्टर हिंदुत्व की छवि वाली शिवसेना सॉफ्ट हिंदुत्व का रुख अपनाए. 17 तारीख को दिल्ली में कांग्रेस और एनसीपी के नेताओं की बैठक होगी जिसमें शिवसेना के साथ जाने के लिए बनाई गई शर्तों पर चर्चा होगी. उसके बाद कांग्रेस, शिवसेना और एनसीपी के सीनियर नेताओं की बातचीत होगी. इस दौरान सरकार बनाने और धर्मनिरपेक्षता पर शिवसेना से प्रतिबद्धता की बात होगी. अगर शिवसेना यह शर्त स्वीकार करती है तभी महाराष्ट्र में शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस की सरकार बनेगी. आज शाम तक कांग्रेस का प्रतिनिधमंडल सोनिया गांधी को महाराष्ट्र में सरकार बनाने और एनसीपी से हुई बातचीत की रिपोर्ट सौपेंगे.

कॉमन मिनिमम प्रोग्राम के लिए कमेटी बनाने का फैसला
कांग्रेस एवं शरद पवार की अगुआई वाली एनसीपी ने बुधवार को कॉमन मिनिमम प्रोग्राम को अंतिम रूप देने के लिए एक कमेटी बनाने का निर्णय लिया. इससे महाराष्ट्र में सरकार बनाने के लिए शिवसेना के साथ गठबंधन पर चर्चा की जा सके. भाजपा नेताओं के बयानों से संकेत मिलते हैं कि शिवसेना के साथ अब भी सरकार बनाने की पार्टी ने उम्मीद नहीं छोड़ी है. महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा विधायक दल के नेता देवेंद्र फडणवीस ने राष्ट्रपति शासन को दुर्भाग्यपूर्ण बताया था. उन्होंने कहा कि राज्य को जल्द स्थिर सरकार मिलने की उम्मीद है. वहीं उद्धव ठाकरे भी प्रेस कांफ्रेंस में कह चुके हैं कि विकल्प खत्म नहीं हुए हैं, भाजपा संपर्क कर रही है.

कांग्रेस नेताओं के अनुसार, पार्टी ने पूर्व मुख्यमंत्रियों अशोक चव्हाण, पृथ्वीराज चव्हाण, राज्य इकाई के प्रमुख बालासाहेब थोरात, माणिकराव ठाकरे व विजय वडेट्टीवार को कमेटी में नामित किया है, जबकि एनसीपी ने कमेटी में जयंत पाटील, अजीत पवार, छगन भुजबल, धनंजय मुंडे और नवाब मलिक को शामिल किया है. कॉमन मिनिमम प्रोग्राम पर चर्चा के लिए कमेटी के गठन का फैसला वरिष्ठ कांग्रेस नेता अहमद पटेल की ओर से मंगलवार को शरद पवार के साथ मुंबई में हुई बैठक के दौरान लिया गया था.

शिवसेना की हिंदुत्व वाली छवि को पहुंच सकती है ठेस
फिलहाल सबसे बड़ा संकट यह है कि अगर कांग्रेस के साथ सरकार बनाने की शर्त यही रही कि शिवसेना को कट्टर हिंदुत्ववादी छवि का रुख छोड़ना पड़ेगा तो हो सकता है कि इसके बाद पार्टी की अपनी पहचान ही खत्म होने के कगार पर आ जाए. इसके पहले बाला साहेब ठाकरे इसका अंजाम भुगत चुके हैं. उन्होंने इंदिरा गांधी का समर्थन आपात काल के दौरान किया था, लिहाजा अगले साल महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव और बीएमसी चुनाव में पार्टी बुरी तरह हार गई थी. अब देखना है कि सरकार बनाने के लिए बनी शर्त में कॉमन मिनिमम प्रोग्राम में शिवसेना कितने बिंदुओं पर सहमत होकर अपने मूल्यों के साथ समझौता कर सकती है.

कांग्रेस और एनसीपी की कोशिशों के बीच भाजपा भी खामोश नहीं बैठी है. दिल्ली और मुंबई में पार्टी की इस मसले को लेकर कई बैठकें हो चुकीं हैं. मंगलवार शाम प्रेस कांफ्रेंस के दौरान शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने जिस तरह से भाजपा को लेकर रुख नरम रखते हुए कहा कि अब भी उधर से संपर्क किया जा रहा है, वहीं देवेंद्र फडणवीस ने भी राज्य को जल्द स्थिर सरकार मिलने की बात कही. साथ ही पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे ने भी दावा किया कि सरकार तो भाजपा ही बनाएगी. इससे माना जा रहा है कि राष्ट्रपति शासन लगने की अवधि के बीच भाजपा शिवसेना के साथ सरकार बनाने की संभावनाओं में जुटी रहेगी. भाजपा-शिवसेना ने गठबंधन के तहत 21 अक्टूबर का विधानसभा चुनाव लड़ा था. लेकिन, शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे द्वारा ढाई-ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री पद की मांग करने के बाद गठबंधन टूट गया. भाजपा ने शिवसेना के रोटेशनल मुख्यमंत्री पद की मांग को ठुकरा दिया. महाराष्ट्र में मंगलवार शाम राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया और विधानसभा को निलंबित कर दिया गया.

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