Tokyo Olympics: 'हम लड़कियां छोटी स्कर्ट पहनकर माहौल खराब नहीं करतीं माहौल बना देती हैं'

महिला खिलाड़ियों ने चैंपियन ऑस्ट्रेलिया को क्वार्टर फाइनल में हराकर पहली बार सेमीफाइनल में जगह बना ली है. लेकिन रानी की जिंदगी का हर हिस्सा इतना शानदार नहीं रहा है.  

Written by - Akash Singh | Last Updated : Aug 2, 2021, 03:28 PM IST
  • जानिए रानी की जिंदगी का सफर
  • हॉकी खिलाड़ियों ने कैसे रचा इतिहास
Tokyo Olympics: 'हम लड़कियां छोटी स्कर्ट पहनकर माहौल खराब नहीं करतीं माहौल बना देती हैं'

नई दिल्लीः जिद, जुनून और जज्बा जिस इंसान के अंदर घर कर जाता है, सफलता उसके कदमों को चूमती है. तमाम मुसीबतों के बावजूद भी जिनके हौसले चट्टान की तरह मजबूत रहते हैं, कामयाबी उनकी दासी होती है. जिनकी आंखों में बस एक ही सपना पलता हो और उसके लिए वो दिन रात जीता हो तो फिर ख्वाब को हकीकत होने से कौन रोक सकता है.

ऐसी ही एक सफलता की मिसाल हैं भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान रानी रामपाल, जिनकी काबीलियत का लोहा आज पूरी दुनिया मान रही है. जिनकी कप्तानी में आज भारतीय महिला टीम ने जापान की धरती पर इतिहास रचा है. 

महिला खिलाड़ियों ने चैंपियन ऑस्ट्रेलिया को क्वार्टर फाइनल में हराकर पहली बार सेमीफाइनल में जगह बना ली है. लेकिन रानी की जिंदगी का हर हिस्सा इतना शानदार नहीं रहा है. इस जीत को पाने के लिए रानी ने उपेक्षा, हताशा, ताने और गरीबी सभी को मात दी है. आइए जानते हैं रानी की जिंदगी के कुछ अनसुने किस्से...

'छोटे स्कर्ट पहनकर माहौल खराब करोगी'
हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले में स्थित शाहाबाद मारकंडा से ताल्लुक रखने वाली रानी रामपाल ने छह साल की उम्र में हॉकी खेलना शुरू किया था. अपनी हॉकी खेलने की इच्छा जब रानी ने अपने परिवार वालों को बताई तो सभी ने इसका विरोध किया. रिश्तेदारों और आस पड़ोस के लोगों ने तो ये तक कहा कि, बस ये लड़की छोटे-छोटे स्कर्ट पहनकर समाज का माहौल खराब करेगी. पिता तांगा चलाते थे.

बेटी के सपने पूरा कर पाने की हैसियत उनमें नहीं थी. लेकिन रानी ने फैसला कर लिया था सिर्फ खेलने का ही नहीं उन तमाम बातों के जवाब देने का भी जो सिर्फ एक लड़की होने पर आपके आगे रख दिए जाते हैं. 

वो कहते हैं न कि कुछ बातों का जवाब तुरंत नहीं देना चाहिए. कुछ जवाब वक्त खुद ब खुद दे देता है. ऐसा ही जवाब उन तमाम लोगों को रानी की सफलता ने दिया है. आज जब रानी उन्हीं छोटे से स्कर्ट में हाथ में स्टिक लिए एक घंटे के लिए मैदान में दौड़ती हैं तो सच में देश की सांसे थम जाती हैं, आंखे इस वक्त को जी भर कर देख लेना चाहती हैं और शायद रानी का हर गोल कहता है- हम बेटियां माहौल खराब नहीं करते माहौल बना देते हैं.

अगर कभी निराश किया तो खेलना छोड़ दूंगी
रानी के पिता जब उनकी जिद नहीं मान रहे थे तो उन्होंने अपने पिता से एक वादा किया था. उन्होंने कहा था कि अगर मैने आपको कभी निराश किया तो मैं हॉकी खेलना छोड़ दूंगी. सच तो यही है कि रानी ने कभी निराश नहीं किया न पिता को न ही देश को. 

सफलता की मिसाल बन गईं रानी
रानी ने जब खेलना शुरू किया तो बस हर कोई उन्हें देखता ही रह गया. जून 2009 में, रूस में आयोजित हुए चैंपियन चैलेंज टूर्नामेंट में रानी ने फाइनल मैच में चार गोल किये और ‘द टॉप गोल स्कोरर’ और ‘यंग प्लेयर ऑफ़ टूर्नामेंट’ का ख़िताब जीता. उन्होंने साल 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों में भाग लिया, जहां वे एफ़आईएच के ‘यंग वुमन प्लेयर ऑफ़ द इयर’ अवॉर्ड के लिए भी नामांकित हुई. इसके बाद अर्जुन अवार्ड जैसे कई सारे सम्मान रानी की झोली में आ गए हैं. अब उनकी नजर टोक्यो ओलंपिक के मेडल पर है, जिसके सेमीफाइनल में पहुंचकर उन्होंने इतिहास रचा दिया है.

मैदान में जब पसीने के साथ छलके आंसू
सोमवार की सुबह महिला खिलाड़ियों ने इतिहास रचा. इसकी उम्मीद शायद ही किसी को रही होगी. ऑस्ट्रेलिया चैंपियन थी लेकिन हमारी लड़कियां क्या ही खेलीं, सांसे थम सी गई थीं. इस मैच को बार बार कई कई बार देखने को मन करता है. जीत के बाद जब ऑस्ट्रेलिया की खिलाड़ी मैदान पर अपने हारने का दुख मनाते हुए रो रही थीं तब उनके साथ ही खड़ी भारत की ये बेटियां भी रो रही थीं.

खुशी के आंसू रो रही थी. वो खुशी जो सालों का दुख, ताने झेलकर मिली थीं. आंसू का हर कतरा हर हिंदुस्तानी का सीना गर्व से चौड़ा कर रहा था हर जुबान पर बस एक ही बात थी ' हमारी छोरियां छोरों से कम है के. और अगले ही पल उसी जुबान से जवाब भी निकलता था. नहीं, बिल्कुल नहीं, हमारी बेटियां छोरों से कम बिल्कुल भी नहीं हैं.

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