उस रानी की कहानी, जिसे मर्दानी कहा जाता है

राज्य पर संकट आते देख रानी ने तलवारें थाम लीं और झलकारी को सेना गठन का आदेश दे दिया. सफेद साड़ी पहनकर जब वह युद्ध भूमि में उतरीं तो वह शोक संतप्त विधवा नहीं बल्कि अंग्रेजी सेना को कफन ओढ़ाने निकलीं उनकी साक्षात मृत्यु लग रही थीं. पढ़िए झांसी की मर्दानी रानी की कहानी-

उस रानी की कहानी, जिसे मर्दानी कहा जाता है

नई दिल्लीः राजमहल के दीप बुझे हुए थे लेकिन मशालें जल रही थीं. जून की वह दोपहर उमस भरी बीती थी या ऐसा कह लें कि शोक में बहे आंसुओं ने हवा को हद से अधिक नम कर दिया था. सांझ ढलते-ढलते चली कुछ जोर की हवा में महल के पर्दे हिल-मिल रहे थे और इन सब के बीच सभा में चुप्पी छाई हुई थी. कुछ देर माहौल यूं ही बना रहा कि बिजली सी कड़कती आवाज आई. आप पत्र लेकर चुप क्यों खड़ी हैं मुंदर ? सुनाइए, हम भी तो सुनें क्या लिखा है फिरंगी डलहौजी ने. मुंदर ने हल्की लेकिन बुलंद आवाज में पढ़ना शुरू किया. मजमून यह था कि राजा की मृत्यु के बाद अब राज्य पर अंग्रेजों का अधिकार होगा. मुंदर ने पत्र का आखिरी शब्द खत्म किया ही था कि सभा में शेरनी की सी दहाड़ गूंज उठी... नहीं.. मैं अपनी झांसी कभी नहीं दूंगीं.

यह दहाड़ थी, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की, जो महज 25 साल की उम्र में विधवा हो चुकी थीं. पुत्र की मृत्यु से दुखी थीं और राज्य के चारों तरफ घिरे आ रहे संकट के बादलों को देखकर विचलित हो उठती थीं. लेकिन अब रानी ने सोच लिया था कि हाथ पर हाथ धरे बैठने से कुछ होना नहीं है. हार हो या जीत लेकिन अपने राज्य की रक्षा के लिए तलवारें उठानी ही होंगी. यह सोचते-सोचते रानी की पेशानी पर बल पड़ने लगे. गुंथे हुए बाल खुल गए और मुट्ठियां भिंच गईं. उन्होंने उसी समय झलकारी को अपनी सेनापति बनाया और मुंदर के साथ मिलकर सेना तैयार करने को कहा. पत्र का उत्तर भेज दिया गया. झांसी की रानी आखिरी सांस तक फिरंगियों का सामना करेगी. जिस राजमहल में अभी तक अंधेरा था वह रानी के शौर्य से जगमगाने लगा था. 

बचपन से था तीर-तलवारों से प्यार
वीरता और साहस भरा निर्णय लेना यह कोई आज की बात नहीं थी. यह तो रानी की रगों में तब से दौड़ रहा था जब वह बालिका थीं. मराठा सैनिक पिता मोरापंत तांबे और धार्मिक मां भागीरथी बाई ने मनु को बचपन से वीरता और दया के संस्कार दिए थे.  जब मां की मौत के बाद पिता उसकी देखरेख के लिए अपने साथ पेशवा बाजीराव द्वितीय के दरबार में ले जाने लगे तो वहां वह सैनिकों के साथ व्यूह रचतीं, युद्ध अभ्यास में उनका साथ देतीं और घायल सैनिकों की सेवा भी करतीं. संस्कारों की छाया में बड़ी हो रही मनु कब लक्ष्मी बन गई पता ही नहीं चला. 19 नवंबर 1828 को बनारस में जब इस दिव्य बालिका का जन्म हुआ था. ज्योतिषियों ने तभी इसे उज्ज्वल भविष्य की स्वामिनी बता दिया था. 

कवियत्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने रानी के जीवन चरित्र को अपनी कविता में बेहतरीन तरीके से रेखांकित किया है. उनकी प्रसिद्ध कविता "खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी" में वह रानी के बचपन का सुंदर वर्णन करती हैं.
वह लिखती हैं-
लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।

झांसी के राजा गंगाधर राव से हुआ विवाह
साल 1842 में मनु का विवाह झांसी के राजा गंगाधर राव नेवालकर के साथ हुआ. इसके बाद वह रानी लक्ष्मीबाई बनकर झांसी आ गईं. गंगाधार राव मराठा शासित राजा थे. सबकुछ ठीक चल रहा था. 1851 में रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया. लेकिन दुःखद की महज चार महीने बाद उस दुधमुंहे की मृत्यु हो गई.

यहीं से धीरे-धीरे दुर्भाग्य झांसी के महल में कदम बढ़ाता चला आया और रानी के जीवन पर छाता चला गया. पुत्र की मृत्यु के ठीक दो साल बाद 1853 में राजा गंगाधर राव की भी मृत्यु हो गई. इसके पहले उन्होंने एक पुत्र को गोद लिया था. इस दत्तक पुत्र का नाम दामोदर राव रखा गया था. राजा की मृत्यु होते ही अंग्रेज झांसी पर चढ़ आए थे.

फिर रानी बनीं रणचंडिका
लॉर्ड डलहौजी की राज्य हड़प नीति चरम पर थी. इससे पहले वह सतारा, जैतपुर, उदयपुर आदि राज्यों को हड़प चुका था. सर ह्यूरोज उसका अंग्रेजी सेना का सेनापति बनकर झांसी को घेरने की तैयारी कर चुका था. रानी न तो शोक मना सकीं और न ही वैधव्य को अपना सकीं. उन्होंने तुरंत ही अपनी साहसी सहेली झलकारी के नेतृत्व में महिला लड़ाकाओं की सेना तैयार की और उन्हीं की सहायता से सबसे पहले पड़ोसी राज्य ओरछा और दतिया के आक्रमण को विफल किया जो लक्ष्मीबाई को अकेली औरत समझकर झांसी को हथियाने आए थे.

1858 की जनवरी में अंग्रेजों ने झांसी पर आक्रमण कर दिया और दुर्ग को घेर लिया. रानी ने दानोदर राव को पीठ पर बांधा, घोड़े पर बैठीं और दोनों हाथों में तलवार लेकर अंग्रेजी सेना पर टूट पड़ीं. भयंकर मार काट मचाती हुई रानी आगे बढ़ते जा रही थीं. इस दौरान उन्होंने मुंह में घोड़े की लगाम दबा रखी थी. इस तरह रास्ता बनाते हुए लक्ष्मीबाई कालपी की ओर बढ़ीं. कालपी पहुंचने पर उनकी मुलाकात तात्याटोपे से हुई. तात्या की तोपों ने अंग्रेजी सेना में खूब खलबली मचाई. दोनों ने मिलकर ग्वालियर के एक किले पर कब्जा कर लिया. 

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लेकिन घिर ही गईं रानी
दो हफ्तों की इस लड़ाई में रानी जब एक बार घिरीं तो झलकारी बाई आगे आईं और ठीक उसी तरह युद्ध करने लगीं, जैसे रानी दोनों हाथों में तलवार लेकर मारकाट मचा रही थीं, इससे अंग्रेज सैनिक गफलत में पड़ गए और झलकारी को घेर लिया. रानी को मौका मिल गया और वह आगे बढ़ गईं, लेकिन इतने में जनरल ह्यूरोज आगे आ गया और उसके पीछे एक-एक कर दस लड़ाके थे. ग्वालियर के पास कोटा की सराय में रानी शत्रुओं से बुरी तरह घिर गईं. यहां उन्होंने वीरता से सामना किया और आगे बढ़ने लगी. उनका घोड़ा कुछ नया था और आगे नाला देखकर अड़ गया. रानी ने उसे जोर की एड़ लगाई. घोड़े ने नाला तो पार करा दिया, लेकिन गिरा तो फिर उठा नहीं. रानी अब तक बुरी तरह घायल हो चुकी थीं और इसी कोटा की सराय के पास उन्होंने वीरगति मिली.

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रानी लक्ष्मीबाई की कहानी भारतीय इतिहास की सबसे मूल्यवान कहानी है. जो यह बताती है कि गंगा-यमुना के इस देश में जितनी निर्मल नदियां बहती हैं, उससे कहीं अधिक वीर खून इसकी धमनियों में बहता है. लक्ष्मीबाई जैसी मर्दानियां अगर वीर लड़ाकों को जन्म देती हैं तो समय आने पर खुद भी रणचंडी बन किसी को भी धूल चटा सकती हैं. रानी की वीरगति को सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपनी एक और कविता में ढाला है.

इस समाधि में छिपी हुई है, एक राख की ढेरी ,
जल कर जिसने स्वतंत्रता की, दिव्य आरती फेरी |
यह समाधि यह लघु समाधि है, झाँसी की रानी की ,
अंतिम लीलास्थली यही है, लक्ष्मी मरदानी की |

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