मुसलमानों का सबसे बड़ा नुकसान उनके 'कथित रहनुमा' ही कर रहे हैं

कोरोना संकट के बीच भारत में जान बूझकर सांप्रदायिक दरार बढ़ाई जा रही है. तबलीगी जमात जैसे गुटों के साथ पूरे मुस्लिम समुदाय को जोड़ा जा रहा है. लेकिन इसके सबसे बड़े जिम्मेदार खुद वो लोग हैं, जो खुद को मुसलमानों का रहनुमा बताते हुए नहीं थकते हैं. ये लोग सहानुभूति दिखाने के नाम पर पूरे समुदाय की छवि बिगाड़ रहे हैं. इनकी राजनीति के चक्कर में गरीब मुसलमान पिसता जा रहा है. 

Written by - Anshuman Anand | Last Updated : Apr 25, 2020, 11:30 AM IST
    • मुसलमानों के नाम पर हो रही है राजनीति
    • विपक्षी दल मुसलमानों को भ्रमित कर रहे हैं
    • सांप्रदायिक राजनीति कर रहे हैं विपक्ष, रिटायर नौकरशाह
    • बौद्धिक आतंकी भी मुसलमानों को भरमाने में पीछे नहीं
    • देश में हिंदू मुसलमान के बीच खाई पैदा कर रहे हैं पीएम मोदी से नफरत करने वाले लोग
    • इस रस्साकशी में गरीब मुसलमानों का भारी नुकसान हो रहा है
    • गरीब मुसलमानों को मुख्यधारा से काटा जा रहा है
    • गरीबों की रोजी रोटी और आत्मसम्मान को दांव पर लगाया जा रहा है.
मुसलमानों का सबसे बड़ा नुकसान उनके 'कथित रहनुमा' ही कर रहे हैं

नई दिल्ली: एक तरफ देश जहां कोरोना त्रासदी से जूझ रहा है. वहीं कुछ लोगों को अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने की पड़ी है. ये लोग मुसलमानों का रहनुमा बनने की कोशिश में पूरे समुदाय को मुसीबत में डाल रहे हैं.

हमें ये समझने की जरुरत है कि कोरोना त्रासदी के बीच गैर जिम्मेदाराना हरकतें करने वाले लोगों की संख्या बेहद कम है. कट्टरपंथी हिंदू, मुसलमान, सिख सभी समुदायों में हैं. तो फिर सिर्फ मुसलमानों का ही नाम बदनाम क्यों हो रहा है. इसकी वजह है उनके वोट की राजनीति करने वाले अवसरवादी लोग. ये एक पूरा गैंग है- 

ध्रुवीकरण की कोशिश से देश का नुकसान
मुसलमानों के कथित रहनुमा तबलीगी जमात जैसे गलत तत्वों की गिनती पूरे मुस्लिम समुदाय के साथ कर रहे हैं. जिसका संदेश निचले स्तर पर बेहद 
घातक तरीके से प्रसारित हो रहा है. 

ये कथित राजनेता और बुद्धिजीवी मुस्लिम समुदाय के बहुसंख्यक अच्छे और अनुशासित लोगों के साथ निम्न स्तरीय  हरकतें करने वाले तबलीगी जमात जैसे कट्टरपंथी समुदाय के लोगों का ऐसा घालमेल तैयार कर रहे हैं. जिससे ये भ्रम पैदा हो रहा है कि पूरा मुस्लिम समुदाय ही कट्टरपंथी है और कोरोना संकट के समय भी देश के खिलाफ साजिश करने में जुटा है. जबकि ये बिल्कुल गलत है. 

देश में मुस्लिम आबादी लगभग 16 से 17 करोड़ है. अगर सभी लोग गलत होते तो शायद लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग के जरिए कोरोना के खिलाफ जंग बेहद मुश्किल हो जाती. देश कोरोना के खिलाफ जंग जीत रहा है. ये इस बात का सबूत है कि पीएम मोदी के पीछे देश में हर धर्म, जाति, संप्रदाय के लोग एकजुट हैं. 

यही बात राजनीतिक रोटियां सेंकने वालों से बर्दाश्त नहीं हो रही है. इसलिए इन लोगों ने दुष्प्रचार करके सांप्रदायिक उन्माद फैलाने की नई श्रृंखला शुरु की है. 

  

राजनीतिक हथियार बनाए जाने से मुसलमानों का भारी नुकसान
देश के कुछ राजनीतिक दल कई दशकों से मुस्लिम समुदाय को अपना वोटबैंक समझते रहे थे. वह इस कोरोना संकट के बीच भी वह अपनी हरकतों से बाज 
नहीं आ रहे हैं.  

देश में सांप्रदायिक राजनीति करने वालों में सबसे पहला नाम आता है कांग्रेस पार्टी का. जो अंग्रेजों की 'फूट डालो और राज करो' की नीति पर पिछले 125 सालों से काम करती आई है. 

जब पूरा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आह्वान पर कोरोना संकट से जूझने में लगा था. तब कांग्रेस को लग रहा था कि वह तो राजनीति में अप्रासंगिक होती जा रही है. जिसे देखते हुए 23 अप्रैल को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कांग्रेस वर्किंग कमिटी की बैठक बुलाई और आरोप लगाया कि 'जब हमें कोरोना वायरस से एकजुट होकर लड़ना चाहिए तब बीजेपी सांप्रदायिक भेदभाव और नफरत का वायरस फैला रही है. हमारे सामाजिक तानेबाने को बड़ा नुकसान पहुंचाया जा रहा है'.

कांग्रेस की विषैली राजनीति से जुड़ी पूरी खबर आप यहां पढ़ सकते हैं

कांग्रेस के ही नक्शेकदम पर चलने वाले दूसरे नेता हैं असदुद्दीन ओवैसी. जो पूरे देश के मुसलमानों के एकछत्र नेता बनने की ख्वाहिश रखते हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि 'कभी न कभी तो इंशाल्लाह कोविड-19 की दवा निकल जाएगी, मगर ये जो नफरत मुसलमानों के ताल्लुक से पैदा की जा रही है. इसकी कोई दवा नहीं है, खुदा न खास्ता मुल्क कमजोर न हो जाए. ये नफरत कितना नफरत पैदा करेंगे आप?'

इस तरह के विभाजनकारी बयान इस बात का संकेत हैं कि कैसे सांप्रदायिक राजनीति करने वाले राजनीतिक दल मजहबी वैमनस्य फैलाने में जुटे हैं. वह कोरोना संकट के बहाने अपनी राजनीति चमका रहे हैं. उनका एकमात्र मकसद मुस्लिम वोट बैंक का सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण करना है. लेकिन उनकी इस राजनीति के चक्कर में खुद मुस्लिम समुदाय को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है. 

कथित बुद्धिजीवी और नौकरशाह भाजपा से दुश्मनी साध रहे हैं
भाजपा से अपने राजनैतिक दुश्मनी साधने और अपने विदेशी आकाओं को खुश करने के लिए तथाकथित बुद्धिजीवियों ने फिर कलम निकाल ली है. सौ से 
अधिक पूर्व नौकरशाहों की पीएम और सभी सीएम को चिट्ठी लिखी है. देश में मुसलमानों के साथ कथित रुप से भेदभाव का आरोप लगाया है. 

इसमें पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्लाह, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी, दिल्ली के पूर्व लेफ्टिनेंट गवर्नर नजीब जंग और पूर्व राजनयिक शिवशंकर मेनन जैसे लोग शामिल हैं.

इस चिट्ठी में कोरोना को लेकर तबलीगी जमात की आलोचना पर सवाल उठाया गया है. साथ ही जमात मामले पर मीडिया कवरेज की आलोचना की गई.चिट्ठी में कहा गया है कि जमात की तरफ से दिल्ली सरकार की एडवाइजरी को दरकिनार कर आयोजन करना निंदनीय है. लेकिन, मीडिया कवरेज में मुद्दे को सांप्रदायिक बनाना और पूरे मुस्लिम समुदाय को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है. राज्य सरकारों से मुसलमानों के साथ भेदभाव पर रोक लगाने की अपील भी की गई. 

खास बात ये है कि इन नौकरशाहों ने सांप्रदायिकता का आरोप लगाती हुई चिट्ठी लिखने के लिए वही वक्त चुना है. जब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भाजपा पर सांप्रदायिकता फैलाने का आरोप लगाया. शायद इन नौकरशाहों को अपने राजनैतिक आकाओं के इशारे का इंतजार था. 

  
इन पूर्व नौकरशाहों के लहजे से ऐसा लगता है जैसे पूरे देश का मीडिया कवरेज सरकार कंट्रोल करती है. ये वो लोग हैं, जो सरकारी नौकरी से रिटायर होने के 
बाद यूपीए सरकार के शासनकाल में कई तरह के आयोगों और सरकारी कमीशनों पर कब्जा जमाकर सरकारी पैसे से मलाई चाट रहे थे. लेकिन केन्द्र में सत्ता परिवर्तन के बाद इनकी अतिरिक्त आय का वह स्रोत बंद हो गया है.  जिससे इस तरह के लोग बौखलाए हुए हैं और विपक्ष के राजनीतिक प्रोपगैंडा को बढ़ा रहे हैं. 

लेकिन इनकी हरकतों से सबसे ज्यादा नुकसान निचले स्तर पर सामाजिक ताने बाने को हो रहा है. जमीनी स्तर पर मजहबी स्तर पर खाई बढ़ती जा रही है.

इससे संबंधित पूरी खबर आप यहां पढ़ सकते हैं--कोरोना काल में '101 पूर्व नौकरशाहों' की चिट्ठी आई, 'तबलीगी जमात की आलोचना पर सवाल'
 

अरुंधति राय जैसे बौद्धिक आतंकी कोढ़ में खाज का काम कर रहे हैं
इन राजनीतिक दलों और नौकरशाहों ने जहां देश के सांप्रदायिक सद्भाव को तितर बितर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. वहीं अरुंधति रॉय जैसे कुख्यात 
बुद्धिजीवी भी अपने अलग नफरत भरे एजेन्डे को आगे बढ़ा रहे हैं. 

अरुंधति रॉय ने बेहद भड़काऊ बयान दिया है. उऩ्होंने कहा कि 'भारत में मुस्लिमों के खिलाफ कोरोना महामारी का फायदा उठाया जा रहा है. कोरोना के बहाने मुसलमानों का दमन किया जा रहा है. भारत के हालात मुस्लिमों के जनसंहार की ओर बढ़ रहे हैं. कोरोना का इस्तेमाल हिंदू-मुस्लिमों को भड़काने के लिए किया जा रहा है. भाजपा और RSS की विचारधारा ही भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना है'. 

अरुंधति राय का यह बयान राष्ट्र द्रोह की श्रेणी में आता है. ऐसा लगता है कि वह देश में गृहयुद्ध भड़काने की साजिश में लगी हुई हैं. खास बात ये है कि अरुंधति ने ये बयान एक विदेशी टीवी चैनल को इंटरव्यू के दौरान दिया है. जिससे उनकी मंशा पर संदेह और गहरा हो जाता है. 

अरुंधति के राष्ट्रद्रोही बयान से जुड़ी पूरी खबर आप यहां पढ़ सकते हैं. 

क्या है सबसे बड़ा नुकसान?
कोरोना संकट के बीच तबलीगी जमात के लोगों की वजह से समस्या बढ़ी. ये बात सभी जानते हैं. लेकिन मुसलमानों के कथित रहनुमा तबलीगी जमात के 
लोगों को अलग करने की बजाए पूरे मुस्लिम समुदाय से उसे जोड़ रहे हैं. जिसकी वजह से निचले स्तर पर ये भ्रम फैल रहा है कि पूरा मुस्लिम समुदाय ही तबलीगियों की तरह कोरोना के बहाने कट्टरपंथ फैला रहा है. 

जबकि ये सच नहीं है. तबलीगी जमात पूरे हिंदुस्तान के मुस्लिम समुदाय का 2 फीसदी भी नहीं है. लेकिन मुसलमानों के कथित रहनुमा तबलीगियों को अलग करके उनकी कटु आलोचना करने की बजाए उनका बचाव करने के चक्कर में पूरे मुस्लिम समुदाय को देश की बहुसंख्यक आबादी की निगाहों में गिराने का गुनाह कर रहे हैं.

ये भ्रम जानबूझकर मुसलमानों की कथित रहनुमाई करने वाले राजनीतिक दलों, नौकरशाहों और बौद्धिक लोगों द्वारा फैलाया जा रहा है. लेकिन इसका सबसे बड़ा नुकसान देश के सामाजिक ताने बाने को हो रहा है. 

इसका नतीजा ये है कि जमीनी स्तर पर मुस्लिम समुदाय का बहिष्कार हो रहा है. उन्हें कदम कदम पर मजहब पूछकर अपमानित किया जा रहा है. उनकी रोजी रोटी छिन रही है. 

ये एक पाप है. जिसका खमियाजा मुसलमानों के नाम पर राजनीति करने वालों को चुकाना ही पड़ेगा. 

सभी मजहबों में होते हैं कट्टरपंथी
कोरोना संकट के दौरान देखा गया कि सभी मजहबों के कट्टपंथियों ने सोशल डिस्टेंसिंग और लॉकडाउन के दौरान तांडव मचाया. 

- 12 अप्रैल को पटियाला में सिख समुदाय के निहंगों ने एक सब इंस्पेक्टर का हाथ काट डाला और जमकर हंगामा किया. लेकिन किसी सिख नेता ने इस कृत्य का बचाव नहीं किया. उन निहंगों को उनके कारनामों की सजा मिल रही है.  

-लॉकडाउन के दौरान 4 अप्रैल को महाराष्ट्र के सोलापुर में धार्मिक यात्रा निकाली गई. जिसमें सैकड़ों लोगों ने हिस्सा लिया. इसे रोकने गई पुलिस टीम पर पथराव किया गया.

पुलिस ने भी सख्त कार्रवाई की 100 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया और 22 लोगों को गिरफ्तार कर लिया. किसी भी हिंदू नेता ने पुलिस की कार्रवाई का विरोध नहीं किया. 

फिर क्या वजह है कि मुसलमानों के रहनुमा बनने वाले लोगों ने तबलीगी जमात जैसे कट्टरपंथी समुदाय के कुकृत्यों का विरोध न करते हुए उसे पूरे मुस्लिम 

समुदाय से जोड़ दिया. इसकी वजह से इस्लाम को मानने वाले सभी लोगों की बदनामी हो रही है. 

सबसे ज्यादा घाटे में है देश का गरीब मुसलमान. जिसकी रोजी रोटी से लेकर आत्मसम्मान तक दांव पर है. लेकिन राजनीति करने वालों को उनकी चिंता ही नहीं.

क्या मुस्लिम समुदाय को एक होकर इन मजहबी ठेकेदारों के विरोध में आवाज नहीं उठानी चाहिए?

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