अगर आप अपने बच्चों को 'मोबाइल' से बचाना चाहते हैं, तो ये तरीका जरूर आजमाएं

घर हो या ऑफिस खाते-पीते, सोते-जागते, उठते-बैठते हर जगह, फोन इंसान के साथ एक साए की तरह रहता है. दुनिया का शायद ही ऐसा कोई इंसान हो, जो सोशल मीडिया के दौर में खुद को मोबाइल से दूर रह सकता हो. 

अगर आप अपने बच्चों को 'मोबाइल' से बचाना चाहते हैं, तो ये तरीका जरूर आजमाएं

नई दिल्ली: मोबाइल से होने वाली खतरनाक बीमारियों के बारे में लोग जानकर भी अनजान बने हुए हैं. कई बार ऐसे दावे किए जाते रहे हैं कि मोबाइल की लत बच्चों और बड़ों को अपनी गिरफ्त में लेकर घातक बीमारी का शिकार बना रही है. रिश्तों में दूरियां बनने लगी है. बावजूद इसके लोग मोबाइल से दूरी नहीं बना पा रहे.

13 साल की बच्ची बन रही मिसाल

13 साल की एक बच्ची पूरी दुनिया को सिखा रही है कि कैसे आप मोबाइल डिक्शन से छुटकारा पा सकते हैं. एक ऐसा चैलेंज जो आपकी गैजेट्स की बुरी लत को छुड़ा सकता है. इस बच्ची का नाम तन्वी मैनकर है, जो एक विद्यार्थी है. तन्वी ने एक वन ऑवर चैलेंज दिया है, वो कहती है कि 'अगर आप चाहते हैं कि आपकी लाइफस्टाइल बदल जाए, तो आओ मिलकर हम और आप एक घंटे का चैलेंज लेते हैं.'

बेंगलुरु की रहने वाली तन्वी मैनकर, 8वीं क्लास की छात्रा है. तन्वी कुछ महीने पहले तक घंटों अपना समय मोबाइल पर गेम खेलकर, सोशल मीडिया पर बिताती थी. इंस्टाग्राम और ट्विटर पर उसके अच्छी-खासी संख्या में फोलोअर्स है. लेकिन फोन की इसी लत की वजह से तन्वी के एग्जाम में नंबर 80 परसेंट से घट कर 50 परसेंट हो गए. 

ऐसे हुई एडिक्शन को हराने की शुरुआत

खतरे की घंटी बजी तो तन्वी को ये समझने में जरा भी देर नहीं लगी कि उसके साथ ऐसा सिर्फ फोन के ज्यादा इस्तेमाल और सोशल मीडिया एडिक्शन की वजह से हुआ है. उसके मन में सवाल खड़े हुए कि मोबाइल की इस बुरी लत से कैसे निपटा जाए. और तन्वी ने अपने स्कूल में एक ऐसा प्रोजेक्ट चुना जो उसे इलेक्ट्रॉनिक गैजेट और सोशल मीडिया के एडिक्शन से उबरने में उसकी मदद करे. इस प्रोजेक्ट का नाम 'वन ऑवर चैलेंज' है. एक ऐसा चैलेंज, जिसे लेने वाले को एक घंटे के लिए इलेक्ट्रॉनिक गैजेट खासकर फोन और सोशल मीडिया से खुद को दूर रखना पड़ता है.

सबसे पहले तन्वी ने इस चैलेंज को खुद लिया. हालांकि ये राह इतनी आसान नहीं थी, क्योंकि फोन उस नशे की तरह है कि जिसे इसकी लत एक बार लग गई तो वो जल्दी से नहीं छूटती. आज हर तीसरा इंसान हर 5 मिनट पर मोबाइल में बिजी रहता है. लेकिन तन्वी के वन ऑवर चैलेंज से वो कर दिया जिसके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता है. वन ऑवर चैलेंज पूरा करने के लिए तन्वी ने एक घंटे के दौरान किताबें पढ़ी, अपने दोस्तों के साथ बैठकर जमकर बातें की, उनके साथ वक्त बिताया. पार्क में अपने भाई के साथ जमकर मस्ती की. धीरे-धीरे एक घंटे का चैलेंज काम करने लगा और आज की तारीख में तन्वी मोबाइल और सोशल मीडिया से काफी हद तक दूरी बना चुकी है. तन्वी के पिता आज अपनी बेटी पर बेहद गर्व महसूस कर रहे हैं. क्योंकि जो उसने किया है वो किसी मिसाल से कम नहीं है.

पिता ने बताई पूरी कहानी

तन्वी के पिता संदीप मैनकर कहते हैं कि 'हम एक ऐसे अस्पताल में गए, जैसे निमांस में गए, वहां पर हमने कुछ ऐसे लोगों को देखा, इसने भी देखा जो इसके कारण बहुत बुरे हाल में फंस गए थे. तब उस तरह से उसकी आंखें खुल गईं.' तन्वी के बाद उसके जैसे दूसरे बच्चों और लोगों की बारी थी. तन्वी का वन ऑवर चैलेंज उसके स्कूल के दूसरे बच्चों और घर के पास रहने वाले लोगों ने लिया. और वो इसमें कामयाब भी हुए.

दरअसल, अमेरिका की एक लेखक माइकेल वुकर ने साल 2016 में लिखी अपनी किताब 'ग्रे राहीनो' में गैजेट्स के खतरे के बारे में जानकारी दी थी, और इसे बेंगलुरु की 13 साल की तन्वी मैनकर ने वक्त रहते भांप लिया. तन्वी उस खतरे से ना सिर्फ खुद उबरी बल्कि अपने स्कूल के दोस्तों के साथ अपने अपार्टमेंट में रहने वाले परिवारों और सोशल मीडिया से जुड़े आम लोगों को भी इस खतरे से उबरने के लिए प्रेरित किया. 

स्कूल के एक प्रोजेक्ट के तौर पर तन्वी ने इस मिशन से कुछ ऐसी ऊंचाई को छुआ कि अमेरिकी राइटर माइकेल वुकर खुद उनकी फैन बन गईं. और अब अपनी इस कामयाब मुहिम के बाद 13 साल की तन्वी मैनकर यूनाइटेड नेशन्स के मंच से दुनिया को पाठ पढ़ाने जा रही है.