अब तो समझिए कितना जरुरी हैं पेड़, बुलबुल की कहर से कोलकाता को मैंग्रोव ने बचाया

सरकार और पर्यावरणविदों के जरिए पेड़ बचाओ को लेकर कई अभियान चलाए जाते रहे हैं लेकिन ये बस एक मुहिम बनकर ही रह जाती है. पता नहीं लोग कब पेड़ों की महत्व को समझेंगे और इसके बचाव को लेकर सजग होंगे. पेड़-पोधों से हमें फल-फूल जैसी वस्तुओं के अलावा जीवन के लिए उपयोगी ऑक्सीजन भी मिलती है. ये बात पता तो सबको है लेकिन इसपर सभी लोग अमल नहीं करते हैं. लेकिन ये खबर पढ़ने के बाद शायद लोगों का नजरिया बदल जाए. 

अब तो समझिए कितना जरुरी हैं पेड़, बुलबुल की कहर से कोलकाता को मैंग्रोव ने बचाया

कोलकाता: आज फिर पेड़ों ने पूरे विश्व के सामने अपने अस्तित्व के महत्व को उजागर किया है. पिछले हफ्ते बुलबुल का कहर पश्चिम बंगाल और ओडिशा में बरसा, लेकिन सुंदरवन के आसपास के क्षेत्रों में इसका विशेष प्रभाव देखने को नहीं मिला. इसकी वजह थी सुंदरबन के मैंग्रोव जंगल. 

सुंदरबन ने बचाई सैकड़ो जानें
पर्यावरणविदों का कहना है कि अगर सुंदरबन के मैंग्रोव जंगल नहीं होते तो कोलकाता में बुलबुल की तबाही का मंजर होता, सैकड़ों लोग मारे गए होते. मैंग्रोव के जंगलो में लगे पेड़ों ने हवा की गति को कम कर दिया था जिस वजह से चक्रवाती तूफान काफी हद तक कमजोर हो गई थी, जिससे कोलकाता व उसके आसपास के क्षेत्रों में भारी जान माल का नुकसान नहीं हुआ.

 

ये जंगल भारी बारिश के समय मिट्टी को मजबूती से बांधे रखने की क्षमता रखते हैं जिसके कारण तेज बारिश के चलते भी मिट्टी के कटाव से नुकसान नहीं होता.

इंसानियत का सुरक्षा कवच हैं वृक्ष
मैंग्रोव के जंगल सुरक्षा कवच का काम करती है. सुंदरबन लगभग 10 किलोमीटर में फैला हुआ है जिसका करीब 40 प्रतिशत हिस्सा भारत में है. सुंदरबन पूरी दुनिया में अपनी जैव विविधता के लिए पहचानी जाती है और इसमें करीब 102 छोटे-बड़े द्वीप हैं. 
इस डेल्टा में मैंग्रोव जंगल 4,263 वर्गकिलोमीटर में फैला हुआ है. लेकिन पिछले एक शताब्दी में लगभग 40 प्रतिशत मैंग्रोव जंगल साफ किया जा चुका है. 

खतरे में हैं मैंग्रोव के जंगल
2014 में ISRO  की सेटलाइट से एक तस्वीर ली गई थी जिससे पता चला था कि सुंदरबन का मैंग्रोव जंगल करीब 3.7 प्रतिशत खत्म किया जा चुका है. इसमें स्थानीय लोग भी रोजगार व जलावन के लिए अवैध पेड़ों की कटाई कर रहे हैं.

पर स्थानीय सरकार की तरफ से कोई विशेष कदम नहीं उठाया जा रहा है. लेकिन बुलबुल के कहर से बचाने के बाद अब राज्य सरकार की भी नींद खुलती हुई नजह आ रही है. सरकारी अधिकारियों का बयान आया है कि बुलबुल के कहर से मैग्रोव ने हमें बचा लिया है. पौधारोपण को जंगलों को बचाने के लिए सरकार काम कर रही हैं. साथ ही यह भी कहा कि 10 साल पहले से आयला तूफान के बाद ही सरकार पड़े पैमाने पर पौधारोपण का काम कर रही हैं.

पहले भी जान बचा चुके हैं मैंग्रोव
इससे पहले भी आइला तूफान के खतरे से मैंग्रोव के जंगल ने कोलकाता व उसके आसपास के क्षेत्रों को भारी नुकसान से बचाया था. उस समय भी स्थिति काफी गंभीर थी लेकिन मिट्टी की पकड़ मजबूत कर हवा की गति को रोक कर इन जंगलों ने जान माल की क्षति से पूरे कोलकाता का बचाव किया था. बावजूद इसके लोग पेड़-पोधों को कटाव जारी रखा है.पर्यावरणविदों ने कटते हुए पेड़ों और कम होते जंगल के फीसदी पर चिंता जताई हैं. साथ ही मैंग्रोव जंगल पर पर्यावरणविदों ने कहा कि जलवायु परिवरर्तन की मार झेलने वाले सुंदरबन में मैंग्रोव के पौधे लगाना ही काफी नहीं है. इन पौधों को जंगल में बदलने में वर्षों लग जाते हैं इसलिए इसके साथ इलाके में मैंग्रोव के हजारों साल पुराने घने जंगलों को बचाना भी जरूरी है.