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गैर-कांग्रेसवाद के अगुआ राममनोहर लोहिया की आज है पुण्यतिथि

सबसे बड़े समाजवादी नेता के रूप में लोहिया ने भारतीय राजनीति में अपनी एक अलग पहचान बनाई, बाद में उन्होंने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से अलग होकर सोशलिस्ट पार्टी(लोहिया) का गठन किया.

 गैर-कांग्रेसवाद के अगुआ राममनोहर लोहिया की आज है पुण्यतिथि

नई दिल्ली: आज समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया की पुण्य तिथि है. 23 मार्च 1910 को यूपी के अकबरपुर में जन्मे राममनोहर लोहिया वैश्य परिवार से ताल्लुक रखते थे.भारत की आजादी में समाजवादी नेता के तौर पर राममनोहर लोहिया ने अपना अहम योगदान दिया. वह कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक थे. उन्होंने अपनी अलग समाजवादी विचारधारा के चलते कांग्रेस से रास्ते अलग किए थे. 

प्रखर चिंतक और समाजवादी
राममनोहर लोहिया प्रखर चिंतक तथा समाजवादी राजनेता थे. उन्हें एक महान विचारक के रूप में जाना जाता है. देश की राजनीति में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान और स्वतंत्रता के बाद ऐसे कई नेता हुए, जिन्होंने अपने दम पर शासन का रुख बदल दिया उनमें से ही एक थे राममनोहर लोहिया. अपनी प्रखर देशभक्ति और समाजवादी विचारों के कारण डॉ. लोहिया ने अपने विरोधियों के बीच भी अपार सम्‍मान हासिल किया.

लंदन गए पढ़ने के लिए
1930 जुलाई को राममनोहर लोहिया पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए. वहां से वह बर्लिन गए. उन्होंने प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रो॰ बर्नर जेम्बार्ट को अपना प्राध्यापक चुना. 3 महीने में जर्मन भाषा सीखी. 1932 में लोहिया ने नमक सत्याग्रह विषय पर अपना शोध प्रबंध पूरा कर बर्लिन विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की.

सीटी बजाकर अपने विरोध प्रदर्शित किया
23 मार्च को लाहौर में भगत सिंह को फांसी दिए जाने के विरोध में राममनोहर लोहिया ने लीग ऑफ नेशन्स की बैठक में पहुंचकर सीटी बजाकर दर्शक दीर्घा से विरोध प्रकट किया इसके बाद सभागृह से उन्हें निकाल दिया गया. भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे बीकानेर के महाराजा द्वारा प्रतिनिधित्व किए जाने पर लोहिया ने रूमानिया की प्रतिनिधि को खुली चिट्ठी लिखकर उसे अखबारों में छपवाकर उसकी कॉपी बैठक में बंटवाई. गांधी इर्विन समझौते का लोहिया ने प्रवासी भारतीय विद्यार्थियों की संस्था "मध्य यूरोप हिन्दुस्तानी संघ" की बैठक में संस्था के मंत्री के तौर पर समर्थन किया.

जब रास्ते में उनका सामान जब्त किया गया
राममनोहर लोहिया 1933 में मद्रास पहुंचे. रास्ते में उनका सामान जब्त कर लिया गया. तब समुद्री जहाज से उतरकर हिन्दु अखबार के दफ्तर पहुंचकर दो लेख लिखकर 25 रुपया प्राप्त कर कलकत्ता पहुंचे. कलकत्ता से बनारस जाकर मालवीय जी से मुलाकात की. उन्होंने रामेश्वर दास बिड़ला से मुलाकात कराई जिन्होंने नौकरी का प्रस्ताव दिया, लेकिन दो हफ्ते साथ रहने के बाद लोहिया ने निजी सचिव बनने से इनकार कर दिया. तब पिता जी के मित्र सेठ जमुनालाल बजाज लोहिया को गांधी जी के पास ले गए तथा उनसे कहा कि यह लड़का राजनीति करना चाहता है.

सोशलिस्ट पार्टी का गठन किया
राममनोहर लोहिया उस वक्त सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य थे, जब किसान मजदूर पार्टी के साथ मिलकर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी बनाई गई. इससे नाराज लोहिया ने 1956 में सोशलिस्ट पार्टी (लोहिया) का गठन किया. 1962 के चुनाव में उन्हें नेहरू के हाथों हार मिली. 1963 के उपचुनाव में वह फर्रुखाबाद से जीते. 1965 में उन्होंने अपनी सोशलिस्ट पार्टी का विलय संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी में कर दिया. 1967 के चुनाव में वो कन्नौज सीट से जीते थे.

गैर-कांग्रेसवाद के अगुआ
राममनोहर लोहिया को देश में गैर-कांग्रेसवाद की अलख जगाने वाले नेता के तौर पर जाना जाता है. महान स्वतंत्रता सेनानी और समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया चाहते थे कि दुनियाभर के सोशलिस्ट एकजुट होकर मजबूत मंच बनाए. लोहिया भारतीय राजनीति में गैर कांग्रेसवाद के शिल्पी थे और उनके अथक प्रयासों का फल था कि 1967 में कई राज्यों में कांग्रेस की पराजय हुई, हालांकि केंद्र में कांग्रेस जैसे-तैसे सत्ता पर काबिज हो पाई. लोहिया ने जो गैर-कांग्रेसवाद की अलख जगाई थी, वह आगे चलकर 1977 में केंद्र में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार के रूप में फलीभूत हुई. लोहिया मानते थे किअधिक समय तक सत्ता में रहकर कांग्रेस अधिनायकवादी हो गई थी और वह उसके खिलाफ संघर्ष करते रहे.