close

खास खबरें सिर्फ आपके लिए...हम खासतौर से आपके लिए कुछ चुनिंदा खबरें लाए हैं. इन्हें सीधे अपने मेलबाक्स में प्राप्त करें.

WTO के फैसले से भारत को शॉर्ट टर्म नुकसान, अब लांग टर्म फायदे की बारी

विश्व व्यापार संगठन ने भारत-अमेरिका व्यापार विवाद के एक मामले का निपटारा तो कर दिया, लेकिन भारत उस फैसले से खुश नहीं होगा. आयात-निर्यात को संतुलित करना और राजस्व घाटे को कम करने के लिहाज से भारत को ये झटका जरूर लगा है लेकिन सरकार इसका कोई विकल्प ढ़ूंढ़ने को तत्परता में है. 

WTO के फैसले से भारत को शॉर्ट टर्म नुकसान, अब लांग टर्म फायदे की बारी

नई दिल्ली: पिछले दिनों भारत को अमेरिका से विश्व व्यापार संगठन में राजनायिक हार का सामना करना पड़ा. ये मामला कुछ और नहीं, अपने निर्यात को बढ़ाने के लिए भारत की ओर से एक्सपोर्ट सब्सिडिज का था. सीधे शब्दों में कहें तो भारत दूसरे देशों में निर्यात होने वाले उत्पादों पर कई स्कीमों के सहारे रियायतें बरत रहा था ताकि किसी तरह भारतीय निर्यात को आयात के हिसाब से संतुलित किया जा सके. इसी को लेकर अमेरिका ने वैश्विक स्तर पर विश्व व्यापार संगठन यानी WTO में इस मामले की शिकायत की थी साल 2018 में ही. हाल ही में फैसला आया कि भारत का ये कदम वैश्विक बाजार के लिहाज से खासकर अमेरिका के लिहाज से सही नहीं. 

अमेरिकी उत्पादों को बड़ा नुकसान
दरअसल, अमेरिका ने WTO से शिकायत की थी कि भारत के सब्सिडी स्कीमों से उनका निर्यात तो बढ़ रहा है लेकिन रियायतें बरत कर भारत अमेरिका के उत्पादों को वैश्विक बाजार में कड़ी प्रतिस्पर्धा दे रहा है. इससे अमेरिकी उत्पादों को नुकसान उठाना पड़ रहा है. अमेरिका ने इसके बाद व्यापार संबंधी विवादों के निपटारे के लिए ही बनाए गए विश्व व्यापार संगठन के विवाद निपटारे वाली बॉडी को अर्जी डाली कि भारतीय स्कीम और रियायतें अमेरिकी कंपनियों को आर्थिक नुकसान की ओर धकेल रही हैं. WTO की विवाद निपटारे वाली बॉडी में संगठन की एक विशेष असेंबली है जिसमें सारे सदस्य देशों का प्रतिनिधित्व है. 

भारत का निर्यात ग्राफ लगातार बढ़ा

मालूम हो कि भारत ने अपने निर्यात को संतुलित करने को इन स्कीमों को लागू किया था. भारत 2018-19 में 507 बिलियन डॉलर के उत्पाद आयात किए जबकि निर्यात 331 बिलियन डॉलर पर ही रहा. कॉमर्स और उद्योग मंत्रालय की ओर से जारी किए गए आंकड़ों से पता चला कि भारत को इन निर्यात रियायतों से काफी फायदा हुआ है. 2015-16 में भारत का निर्यात 250 बिलियन के करीब था जिसमें 2018-19 के ग्राफ में बढ़ोत्तरी हुई है.  

शर्तों का किया उल्लंघन

गुरूवार को संगठन की तीन सदस्यीय विवाद निपटारे कमिटी ने कहा कि भारत ने निर्यात रियायतें देकर विश्व व्यापार संगठन के सब्सिडिज और काउंटरवेलिंग पैमाने की शर्तों को तोड़ा है. दरअसल, SCM  की शर्तों के अनुच्छेद 3.1 के तहत विकासशील देश जिसकी सालाना आय 1,000 डॉलर के जितनी हो यानी 71,000 रूपए के करीब उसे किसी भी तरह के निर्यात सब्सिडिज की इजाजत नहीं है. जबकि भारत की सालाना आय औसतन 2,000 डॉलर है यानी 1,42,000 रूपए. पैनल में मौजूद जोस एंटोनियो, लियोरा ब्लूमबर्ग, और सर्ज पैनशियर ने हालांकि भारत को 3 से 6 महीने का वक्त दिया है सारी रियायतों को खत्म करने के लिए.

5 अहम निर्यात रियायत स्कीम

हालांकि, भारत ने पहले ही स्कीमों को धीरे-धीरे खत्म करना शुरू कर दिया था. साल 2015 में और साल 2017 में बहुत सी स्कीमों को खत्म कर दिया गया है लेकिन 5 अहम स्कीम अब भी सक्रिय हैं. राजस्व घाटे को संतुलित करने के लिए भारत सरकार ने प्रोमोशन स्कीम्स को बढ़ावा देने की ठानी और 5 अहम रियायतें बरतनी शुरू की. 

  • इलेक्ट्रॉनिक्स और तकनीकी सामानों पर एक्सपोर्ट ओरिन्टेड यूनिट्स स्कीम
  • मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट्स
  • एक्सपोर्ट प्रोमोशन कैपिटल गुड्स स्कीम
  • स्पेशल इकोनॉमिक जोन्स
  • ड्यूटी फ्री इम्पोर्ट्स फॉर एक्सपोर्ट्स प्रोग्राम

अमेरिका को भी लगाई लताड़

ऐसा नहीं है कि भारत को सिर्फ फटकार मिली है. विश्व व्यापार संगठन ने अमेरिका के पक्षको भी लताड़ा है. अमेरिका ने अपील की थी कि पैनल भारत को उसके देसी सामानों से केंद्रीय एक्साइज ड्यूटी को माफ करे जिसे संगठन ने खारिज कर दिया. अब भारतीय राजनायिक इस फैसले के बाद समीक्षा में लगे हैं. पिछले दिनों विदेश मंत्रालय की ओर से एक बयान जारी हुआ जिसमें बताया कि इस फैसले से भारतीय कंपनियों के निर्यात पर तो असर जरूर पड़ेगा लेकिन भारत इसे संतुलित कर लेगा. स्टील प्रोडक्ट्स, फॉर्मास्यूटिकल्स, केमिकल्स, आईटी उत्पाद और कपड़ा उद्योग को इसका जरा खामियाजा भुगतना पड़ सकता है. 

हालांकि, इसके अलावा भारत चाहे तो अपीलियट बॉडी में शिकायत कर सकता है लेकिन उसके पास इन रियायतों के लिए कोई तर्क होना जरूरी है. अपीलियट बॉडी सबकुछ सुनने के बाद पैनल के पुराने फैसले को बदल तक सकती है.