रवांडा में 6 अप्रैल 1994 का खूनी इतिहास, जहां आज भी लाखों बच्चे हैं 'हत्यारे के बेटे'

रवांडा में हुए इस भीषण नरसंहार में जिस सबसे खतरनाक हथियार का इस्तेमाल किया गया उसका नाम था ‘बलात्कार’.  यह हथियार इतना पैना था कि रवांडा के लोगों के जेहन में आज भी वे जख्म इतने गहरे हैं कि उनकी आंखों से आज भी आसुओं के रूप में खून रिसता है.

Written by - Zee Hindustan Web Team | Last Updated : Apr 6, 2021, 08:19 AM IST
  • 6 अप्रैल, 1994 को विमान दुर्घटना बनी थी हादसे की वजह
  • रवांडा के राष्ट्रपति और बुरुंडी के राष्ट्रपति की मौत हो गई थी
रवांडा में 6 अप्रैल 1994 का खूनी इतिहास, जहां आज भी लाखों बच्चे हैं 'हत्यारे के बेटे'

नई दिल्ली: परिवार में डर ऐसा कि पतियों ने अपनी पत्नियों को मार डाला, अपना वर्चस्व बचाने के लिए एक कबीले ने दूसरे कबीले की औरतों के साथ दुष्कर्म किया. 100 दिन के भीतर लाखों लोग मौत के घाट उतार दिए गए. जो बच गए वह आज तक उस दंश को जेहन में लिए जी रहे हैं.

6 अप्रैल की तारीख जब कभी पीछे मुड़कर देखती है, तो रावांडा के अपने इस दिन के इतिहास को खून में सना हुआ पाती है. 

वह इतिहास, जिसमें दमन की मानसिकता है, बदला है, क्षोभ है और बाकी है तो इससे उपजी बीमारियां. वह साल था 1994 जब रवांडा में दो कबीलों के बीच का संघर्ष ऐसे युद्ध में बदला जिसमें सिर्फ हथियारों से जख्म नहीं दिए गए, बल्कि इंसानी इज्जत को तार-तार कर देने के लिए दुष्कर्म को ही हथियार बना लिया गया. 
 
यह बात उस दौर की है, जब रवांडा में चरमपंथी हुतु कबीले की सरकार थी और इस कबीले ने देश में अल्पसंख्यक तुत्सी कबीले के आठ लाख लोगों को मौत के घाट उतार दिया.

क्या रहा नरसंहार का कारण
6 अप्रैल, 1994 को एक विमान दुर्घटना में रवांडा के राष्ट्रपति जुवेनाल हाबयारीमाना और बुरुंडी के राष्ट्रपति सिपयरिन इन्तारीयामी की मौत हो गई.

इस घटना के पीछे यह कारण बताया गया कि तुत्सी कबीले के लोगों ने इस विमान को मार गिराया. जबकि तुत्सी कबीले के लोगों का कहना था कि हुतु कबीले के लोगों ने हिंसा को अंजाम देने के लिए खुद ही इस घटना को अंजाम दिया.

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ऐसे हुई शुरुआत
हुतु कबीले के लोगों ने निर्वासन में रह रहे तुत्सी कबीले के गुट रवांडा पैट्रिओटिक फ्रंट (आरपीएफ ) को जिम्मेदार ठहराया.

यहीं से इस भयानक नरसंहार की शुरुआत हुई. हुतु कबीले के लोगों ने अल्पसंख्यक तुत्सी कबीले के लोगों को घरों में घुसकर मारा. तुत्सी लोगों के लिए इलाके से बाहर जाने के सभी रास्ते बंद कर दिए गए.

100 दिन में आठ लाख लोग मारे गए
सौ दिनों के भीतर ही आठ लाख लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया. हुतु चरमपंथियों का नेतृत्व रवांडा की सेना और इंटरनाहामवे नाम की एक मिलिशिया कर रही थी.

तुत्सी लोगों के खिलाफ रेडियो के जरिए नफरत का अभियान चलाया गया.

हुतु लोगों ने अपनी तुत्सी पत्नियों की हत्या की
हुतु लोगों ने अपने पड़ोसी तुत्सी लोगों की हत्या की. कई हुतु लोगों ने अपनी तुत्सी पत्नियों को भी मौत के घाट उतार दिया, क्योंकि उन्हें डर था कि अगर वे ऐसा नहीं करेंगे, तो उन्हें भी मार दिया जाएगा.
 
तुत्सी कबीले के लोगों ने बचने के लिए चर्चों में शरण ली, लेकिन चर्च से जुड़े लोगों ने अपनी जान बचाने के लिए मुखबिरी कर दी और वहां भी तुत्सी लोगों को जान से मार दिया गया अथवा पूरे चर्च को ही आग लगा दी गई.

हर दिन दस हजार तुत्सी मारे गए
इस दौरान लगभग हर दिन दस हजार तुत्सी लोगों को मारा गया. इस नरसंहार में तुत्सी कबीले की लगभग 70 फीसदी आबादी जान से मार दी गई. इस दौरान जिन हुतु लोगों ने तुत्सियों के प्रति उदारता दिखाई, उन्हें भी मौत के घाट उतार दिया गया.

दुष्कर्म को भी बनाया हथियार
रवांडा में हुए इस भीषण नरसंहार में जिस सबसे खतरनाक हथियार का इस्तेमाल किया गया उसका नाम था ‘दुष्कर्म’.  यह हथियार इतना पैना था कि रवांडा के लोगों के जेहन में आज भी वे जख्म इतने गहरे हैं कि उनकी आंखों से आज भी आंसुओं बनकर खून रिसता है.

ढाई लाख महिलाएं बनीं शिकार
इस नरसंहार के दौरान, हुतु सरकार के सैनिकों और साथी सेनाओं ने योजनाबद्ध तरीके से तुत्सी कबीले की महिलाओं का बलात्कार किया.

इस दौरान लगभग ढाई लाख महिलाएं इस हैवानियत का शिकार बनी. ढाई लाख महिलाओं की जान भी ले ली और उन्हें जिंदा भी छोड़ दिया. 

वे बच्चे जो अब 'हत्यारे के बेटे' कहलाते हैं
इन महिलाओं पर हुए अत्याचार तब और गहरे हुए, जब इन अपराधियों का शिकार हुई महिलाओं के पेट में इनके बच्चे ठहर गए. इस दौरान जो बच्चे पैदा हुए, आज वे जवान हो गए हैं.

आज से लगभग 27 साल पहले हुई इस वीभत्स घटना के गवाह के रूप में आज भी ये बच्चे हमारे बीच मौजूद हैं.

हुतु कबीले की सेनाओं ने भी घर-घर घुसकर तुत्सी महिलाओं के साथ दुष्कर्म किया, ताकि तुत्सी महिलाएं आने वाले समय में तुत्सी बच्चों को जन्म न दे पाएं. उन्होंने उनके यौन अंगो को भी नुकसान पहुंचाया ताकि आने वाले समय में वे कभी गर्भ धारण न कर सकें.

एड्स संक्रमित तुत्सी महिलाओं के अस्पताल में छोड़ दी गईं. यहां भी उनके साथ दुष्कर्म हुआ और जिंदा बची महिलाएं जीवन भर एड्स से जूझती रहीं.

ये दंश अब भी बरकरार है
इस दुष्कर्म से पैदा हुआ बच्चे या तो अनाथ छोड़ दिए गए या फिर समाज से कभी अपनाए ही नहीं गए. जबकि वे केवल निर्दोष थे. लेकिन 1994 के 6 अप्रैल को हुए इस नरसंहार का असर ऐसा है कि 27 साल के वे बच्चे आज एक लाचार जवान बन गए हैं. डीडब्ल्यू हिंदी वेबसाइट के अनुसार,  साल 1994 में रवांडा में हुए नरसंहार के दौरान बलात्कार से जन्मे पैट्रिक अपने जीवन के बारे में बताते हुए कहते हैं कि उनका देश और समाज आज तक उन्हें नहीं अपना पाया है.

इस एक दास्तान से समझिए कैसा है दर्द
पैट्रिक की मां होनरिने ने बताया कि 1994  में हुए नरसंहार के दौरान, उन्हें चार दिनों तक जेल में रखा गया था.
नरसंहार के बाद जब सैनिक लौटकर आते थे, तो हर रोज उनके साथ बलात्कार किया जाता था.

एक दिन एक सैनिक की मदद से वह जेल से भाग निकलीं, लेकिन वीभत्स्ता ने उनका पीछा नहीं छोड़ा, रास्ते में भी उनके साथ कई बार बलात्कार किया गया.

होनरिने बताती हैं कि इस दौरान ही वे गर्भवती हो गईं. उन्होंने कई बार इस बच्चे को गिराने के बारे में सोचा, लेकिन आखिर में उन्होंने इस बच्चे को जन्म दिया.

उन्होंने आगे चलकर शादी की, लेकिन उनके पति ने पैट्रिक को अपनाने से इनकार कर दिया. वह कहती हैं कि उन्हें जीवन भर मलाल रहेगा कि वे अपने बेटे को मां का प्यार नहीं दे पाईं.

होनरिने की तरह ही कई ऐसी महिलाएं हैं, जो इस तरह के अपराध का शिकार बनीं.

अस्तित्व की तलाश में भटक रहे हैं नौजवान
रवांडा में बड़ी संख्या में पैट्रिक जैसे बच्चे मौजूद हैं, जो आज भी अपने अस्तित्व की तलाश में भटकते नजर आते हैं.

इन बच्चों को जो जख्म अपनी माओं से विरासत में मिले हैं, वक्त का मरहम उन्हें भर नहीं पाया है.
इनमें से अधिकतर बच्चे मानसिक अवसाद का शिकार हैं.

पैट्रिक बताते हैं कि वे अपने जीवन में दो बार आत्महत्या का प्रयास कर चुके हैं.

पैट्रिक का कहना है कि अब मेरे देश ने धीरे-धीरे मुझे अपनाना शुरू कर दिया है. अब मुझे लोगों से अपनी कहानी साझा करने में पहले जितनी दिक्कत नहीं होती है.
मेरे लिए लोगों से घुलना-मिलना लगातार जारी रहने वाली प्रक्रिया है.  

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