विकास के लिए चीन और अमेरिका की अंधी दौड़ से खतरे में दुनिया

वर्षों पहले नब्बे के दशक में दुनिया ने समेकित विकास का मॉडल अपनाया था जिसमें संसाधनों का जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल और उनकी बर्बादी सहित पर्यावरण संरक्षण के गोल को ध्यान में रखते हुए विकास की किसी भी योजना को शुरू करने की संकल्प लिया था. वो सारी बातें और वादे जुमले ही साबित हुए हैं. खासकर विस्तारीकरण की भयानक चाह रखने वाला देश चीन, जो फिलहाल पूरी दुनिया का लगभग एक चौथाई प्रदूषण खुद पैदा कर रहा है. 

Written by - Satyam Dubey | Last Updated : Nov 28, 2019, 05:25 PM IST
    • चीन और अमेरिका ने छोडी है हवा में सबसे ज्यादा जहरीली गैसें
    • भारत भी विकास की अंधी दौड़ में कर रहा है अपनी ही नुकसान
    • जी-20 देशों ने सबसे अधिक 78 फीसदी गैसों का किया उत्सर्जन
    • तप गई है पृथ्वी, चढ़ने लगा है तापमान

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विकास के लिए चीन और अमेरिका की अंधी दौड़ से खतरे में दुनिया

नई दिल्ली: पर्यावरण को होने वाले खतरे को लेकर UNEP(United Nation Environmental Programme)ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की है. इस रिपोर्ट के बाद दुनिया को कम से कम अब डरना चाहिए कि आतंकवाद से भी बड़ा खतरा अब दरवाजे पर दस्तक दे चुका है. अगर अब भी कुछ नहीं किया गया तो विनाश का रूप बड़ा भयंकर हो सकता है. यूएनईपी की रिपोर्ट के मुताबिक इसी रफ्तार से कार्बन उत्सर्जन होता रहा तो दुनिया 2100 तक 3.2 डिग्री ज्यादा गर्म हो जाएगी. पृथ्वी का ताप बढ़ेगा और कई देशों में औसतन तापमान 50 के पार तक जा सकता है. लाखों प्रजातियां तबाह हो जाएंगी और करोड़ों प्राणी विलुप्ती की कगार पर पहुंच चुके होंगे. यह सब विकास की अंधी दौड़ से होगा. 

चीन और अमेरिका ने छोडी है हवा में सबसे ज्यादा जहरीली गैसें

विकास की अंधी दौड़ इसलिए कि दुनिया के जितने भी देश खुद को विकसित देश बनाने की रेस में लगे हुए हैं, उनमें से ज्यादातर उन तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो प्रदूषण का दूसरा नाम बन गया है. कार्बन उत्सर्जन. यूएनईपी की रिपोर्ट कहती है कि 2017 में जहां दुनिया ने 53.5 गिगाटन ग्रीनहाउस गैसों का हवा में तैरते रहने को छोड़ दिया था, वहीं 2018 में और ज्यादा मेहनत कर के 55 गिगाटन जहरीली गैसें वायुमंडल में छोड़ दी और निश्चिंत हो कर इंतजार करने लगे. सबसे अधिक जहरीली गैसें ड्रैगन चीन ने तो इसके बाद शक्तिशाली देश अमेरिका ने हवा में तैरते रहने के लिए छोड़ दी है. रिपोर्ट में 2017 में सभी देशों के कार्बन उत्सर्जन को लेकर आंकड़ें हैं. 

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भारत भी विकास की अंधी दौड़ में कर रहा है अपनी ही नुकसान

चीन ने सबसे अधिक 26.8 फीसदी तो वहीं अमेरिका ने 13.1 फीसदी जहरीली गैसों का उत्सर्जन कराया है. फैक्ट्रियों और बड़े-बड़े ऊर्जा के स्त्रोत ज्यादातर परमाणु रिएक्टर्स ने पर्यावरण का सबसे अधिक बेड़ा गर्क किया है. चीन और अमेरिका के बाद यूरोपीयन यूनियन के देशों ने संयुक्त रूप से तकरीबन अमेरिका जितनी ही 13.1 फीसदी ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन किया है. इसके बाद अगला नंबर भारत का है.

भारत क्योंकि फिलहाल दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है तो पर्यावरण में जहरीली गैसों का उत्सर्जन करने में पीछे कैसे हो सकता है. विशालकाय उद्योग और उसके बाद चिमनी और भट्टे इन सबने पर्यावरण में सल्फर डाई ऑक्साइड, नाइट्रोजनिक गैसें और कार्बन मोनोऑक्साइड को वायुमंडल में वृहद मात्रा में छोड़ दिया है. 

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जी-20 देशों ने सबसे अधिक 78 फीसदी गैसों का किया उत्सर्जन 

देखा जाए तो कार्बन उत्सर्जन के मामले में जी-20 देशों का हिस्सा पूरे देश में सबसे ज्यादा है. कार्बन उत्सर्जन में जी-20 देशों का हिस्सा पूरे विश्व के हिस्से का 78 फीसदी है. दुनिया का अन्य हिस्सा जो जी-20 देशों में से नहीं है, उसका प्रतिशत 22 फीसदी ही है. भारत के बाद रूस (4.6 फीसदी), जापान (3 फीसदी) और ब्राजील (2.1 फीसदी) का नंबर है. इसके बाद अन्य विकासशील और समेकित विकास को भूल चुके देशों का नंबर आता है. इंडोनेशिया, दक्षिण कोरिया, कनाडा, मेक्सिको, सउदी अरब और आस्ट्रेलिया भी हैं. 

तप गई है पृथ्वी, चढ़ने लगा है तापमान

मालूम हो कि जहरीली गैसों के उत्सर्जन से पृथ्वी का आधे से अधिक भाग अब तक गर्म होता चला जा रहा है. इससे बर्फें और बड़े-बड़े हिम शिखर पिघल रहे हैं. प्राणी और जीव-जंतु मरते जा रहे हैं. इससे पहले यूएन की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए महासचिव एंटोनियो गुटेरस ने कहा था कि पर्यावरण में इतने बड़े बदलाव का खामियाजा भारत जैस पेन्नसुलर क्षेत्रों को ज्यादा भुगतना होगा. क्योंकि यह देश तीन तरफ से पानी से घिरे हैं और दक्षिणी भाग कुछ ज्यादा ही निचले हिस्से में हैं तो वहां खतरे का असर सबसे पहले और सबसे ज्यादा होगा.

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पर्यावरण में फैल रहे इन गैसों की वजह से जो तापमान में बड़ा फर्क आ रहा है वह सूर्य के अल्ट्रावायलेट तरंगों को पृथ्वी पर आने से रोकने वाले ओजोन की परतों को खत्म कर देगा. इसका सीधा असर हमारे स्कीन पर पड़ेगा और कई सारी बीमारियां घेर लेंगी. जरूरी है कि देश युद्धस्तर पर और प्रतिबद्धता के साथ इसके निपटारे में अभी से लग जाएं. 

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