अमेरिका में भड़की आग सालों के भेदभाव का नतीजा

अमेरिका की सड़कों पर फूटे अश्वेतों के गुस्से की वजह सिर्फ पुलिस की हैवानियत नहीं है. इस गुस्से का संबंध यहां अफ्रीकी अमेरिकी नागरिकों के साथ सालों से हो रहे भेदभाव से है. 

अमेरिका में भड़की आग सालों के भेदभाव का नतीजा

नई दिल्ली: अमेरिका की सड़कों पर फूटे अश्वेतों के गुस्से की वजह सिर्फ पुलिस की हैवानियत नहीं है. इस गुस्से का संबंध यहां अफ्रीकी अमेरिकी नागरिकों के साथ सालों से हो रहे भेदभाव से है. बीते कई दशकों में इसके खिलाफ कई आंदोलन हुए लेकिन हालात नहीं बदले हैं. आज भी अमेरिका में अश्वेतों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार जारी है. अब लोग इंसाफ के लिए आर-पार के आंदोलन पर उतर आए हैं.

अश्वेत नागरिक को पुलिसवाले ने मार डाला

अमेरिकी पुलिस की हैवानियत की तस्वीरें जिसने भी देखी, वो सिहर उठा.  25 मई को मिनीसोटा के मिनियापोलिस में अश्वेत नागरिक जॉर्ज फ्लॉएड की मौत हुई थी.
46 साल के जॉर्ज को 20 डॉलर का नकली नोट इस्तेमाल करने के आरोप में पुलिस ने हिरासत में लिया था. मिनियापोलिस के पावडरहोर्न इलाके से इसे कस्टडी में लिया गया था. इसके ठीक बाद उसे हथकड़ी भी लगा दी गई. लेकिन इतने से पुलिसवालों को चैन नहीं मिला. एक वायरल वीडियो से पुलिस का कातिल चेहरा सामने आया. इसके बाद लोग भड़क उठे. इंसाफ का आंदोलन हिंसक हो उठा.  वारदात के वीडियो में डेरेक शॉविन नाम का एक पुलिस अधिकारी जॉर्ज की गर्दन पर घुटने के बल बैठा दिखा. मौके पर कुल 4 पुलिसवाले थे, इनमें दूसरे पुलिसकर्मी ने जॉर्ज की पीठ तो तीसरे ने उसके पांव को जकड़ रखा था. जबकि चौथा पुलिसवाला बगल में खड़ा होकर जॉर्ज की टूटती सांसों का तमाशबीन बना था.

हैवानियत के वीडियो ने खोली पुलिस की पोल

वीडियो में 8 मिनट 46 सेकेंड तक पुलिस ऑफिसर डेरेक शॉविन आरोपी जॉर्ज की गर्दन को घुटने से दबाता नजर आया. इस दौरान जॉर्ज बार-बार कहता सुनाई दे रहा था कि उसे सांस लेने में दिक्कत हो रही है. उसने बार-बार कहा कि मुझे मत मारो. लेकिन पुलिसकर्मी का दिल नहीं पसीजा. गर्दन पर पुलिसकर्मी का घुटना होने से जॉर्ज का दम घुटता रहा लेकिन कातिल को जरा भी तरस नहीं आई.  वायरल वीडियो के 2 मिनट 53 सेकेंड का हिस्सा ऐसा है जिसमें जॉर्ज फ्लॉएड के शरीर में कोई हरकत नहीं हो रही, बावजूद इसके पुलिस ऑफिसर डेरेक शॉविन उसकी गर्दन को घुटने से दबाए नजर आ रहा है. कहा जा रहा है कि सांस लेने में दिक्कत की वजह से जॉर्ज बेहोश हो गया और फिर उसकी मौत हो गई.

अब चारों पुलिस अधिकारियों को बर्खास्त कर इन पर हत्या का आरोप लगाया गया है. लेकिन इतने भर से अफ्रीकी अमेरिकी समुदाय का गुस्सा शांत होता नहीं दिख रहा. सालों से सीने में दबी भेदभाव की आग शोला बनकर धधक उठी. नतीजा कई शहरों में भारी आगजनी और हिंसा के रूप में सामने आया.

पूरे अमेरिका में भीषण आगजनी, सड़कों पर अश्वेत

5 दिन के भीतर विरोध की आग वाशिंगटन डीसी तक पहुंच गई. प्रदर्शनकारियों ने व्हाइट हाउस के सामने खड़े होकर नारेबाजी की. जिन्हें यहां से हटाने में पुलिस के साथ ही सीक्रेट सर्विस के कमांडो के पसीने छूट गए.  मिनियापोलिस से वाशिंगटन डीसी की दूरी 1500 किलोमीटर है लेकिन न्याय मांगने सड़कों पर उतरे लोगों के लिए ये दूरी कोई मायने नहीं रखती. सबकी जुबान पर एक ही सवाल है कि आखिर अफ्रीकी अमेरिकी नागरिकों के साथ ऐसी बेरहमी कब रुकेगी ?  मिनिसोटा से लेकर न्यूयॉर्क और वाशिंगटन से लेकर लॉस एंजिलिस तक में जबर्दस्त प्रदर्शन हुआ. कई जगहों पर भीषण आगजनी की गई. हिंसा में कई पुलिसकर्मी और प्रदर्शनकारी जख्मी हुए हैं.

.चप्पे-चप्पे पर 'BLACK LIVES MATTER'के नारे

प्रदर्शनकारियों ने हाथों में 'BLACK LIVES MATTER' लिखी तख्तियां ले रखी हैं. इसके जरिए वो अपनी जान को सस्ती समझनेवालों से पूरा हिसाब वसूलने को तैयार हैं. ये हिसाब पुराना है. वजहें अलग-अलग रहीं लेकिन हैवानियत में फर्क नहीं रहा. कभी गुलामी तो कभी लिंचिंग और कभी पुलिस की क्रूरता ने अश्वेतों की जान ली. आज भी हालात नहीं बदले हैं इसका सबूत अमेरिका का एक सरकारी आंकड़ा है. जिसके मुताबिक 2019 में हिंसा रोकने के नाम पर चलाई गई पुलिस की गोली से 1099 लोगों की मौत हुई थी. इनमें  24% अश्वेत थे.  अमेरिका में अफ्रीकी अमेरिकी नागरिकों की आबादी के अनुपात से ये संख्या दोगुनी थी. लोगों के गुस्से को शांत करने के लिए मिनियापोलिस के मेयर जैकब फ्रे ने यहां तक कहा कि अमेरिका में अश्वेत होने का मतलब ये नहीं कि उन्हें सजा ए मौत दे देनी चाहिए, ये घटना अमानवीय है. लेकिन ये सिर्फ कहने भर की बातें लगती हैं. ऐसी हर घटना पर इसी तरह के बयान आते हैं लेकिन जिस पुलिस पर रंगभेद रोकने की जिम्मेदारी है, वही आरोपों के घेरे में रही है. बीते 6 सालों में ही आधा दर्जन से ज्यादा अश्वेतों को पुलिस बिना अपराध के मार चुकी है.

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6 साल पहले एरिक गार्नर की ऐसे ही हुई थी हत्या

2014 में इसी तरह एक अश्वेत नागरिक एरिक गार्नर की भी हत्या हुई थी. तब भी हत्या का आरोप श्वेत पुलिसकर्मियों पर लगा था. 17 जुलाई 2014 को न्यूयॉर्क के स्टेटेन आइलैंड में ये वारदात हुई थी. न्यूयॉर्क सिटी पुलिस डिपार्टमेंट के ऑफिसर ने तब एरिक को गिरफ्तार करने की कोशिश की थी. एरिक पर बिना स्टैम्प के सिगरेट बेचने का आरोप था. एरिक ने हथकड़ी लगाने के लिए हाथ आगे बढ़ाने से मना कर दिया था. इसके बाद एक पुलिस ऑफिसर ने उसे जमीन पर गिराकर उसकी गर्दन को कोहनी से दबा दिया था.

जबकि दो पुलिसकर्मियों ने उसके हाथ को जकड़ लिया था. वहीं एक पुलिसवाले ने एरिक के पांव को दबा रखा था. जॉर्ज फ्लॉएड की तरह ही तब एरिक भी बार-बार चीख रहे थे कि मैं सांस नहीं ले पा रहा हूं. लेकिन पुलिसवालों ने तरस खाने की कोशिश नहीं की. एरिक ने 11 बार चीख-चीखकर कहा कि मैं सांस नहीं ले पा रहा और फिर बेसुध हो गए. पुलिस वालों ने एरिक को इसी हालत में 7 मिनट तक जमीन पर पड़ा रहने दिया. बाद में अस्पताल ले जाने पर एरिक को डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया. 6 साल बाद फिर से एरिक की तरह ही पुलिसवालों ने जॉर्ज फ्लॉएड की जान ली है. जिसके बाद पूरे अमेरिका में 6 साल पहले ही तरह ही विरोध में हिंसा भड़क उठी है.

माइकल ब्राउन, तामिर राइस, वॉल्टर स्कॉट की हत्या बनी थी सुर्खियां

9 अगस्त 2014 को मिसौरी के फर्ग्युसन शहर में माइकल ब्राउन जूनियर को एक श्वेत पुलिसकर्मी ने गोली मार दी थी. 18 साल के माइकल की मौके पर ही मौत हो गई थी. आरोप डेरेन विल्सन नाम के पुलिसकर्मी पर लगा था. पुलिस ने माइकल पर कार रोके जाने पर झगड़े का आरोप लगाया था. जबकि माइकल के साथी ने इसे झूठा बताते हुए कहा था कि विल्सन ने कार से खींचकर माइकल को सामने से गोली मार दी. माइकल ब्राउन को सामने से 6 गोलियां मारी गई थी. वो भी तब जबकि उसके पास कोई हथियार नहीं था. 22 नवंबर 2014 को 12 साल के अश्वेत तामिर राइस को पुलिस ने गोली मार दी थी. ओहियो को क्लीवलैंड में हुई इस वारदात से भी तब अमेरिका सुलग उठा था. 12 साल का तामिर एक खिलौना गन लेकर रोड पर निकला था. उसे रोककर पूछताछ की बजाय 46 साल के श्वेत पुलिसकर्मी टिमोथी लेमैन ने तामिर को सीधे गोली मार दी थी. आरोपी पुलिसवाले का कहना था कि उसे कॉल मिली थी कि एक अश्वेत लड़का गन लेकर रोड पर है और वो आते-जाते लोगों को निशाना बना सकता है.

4 अप्रैल 2015 को अमेरिका के साउथ कैरोलिना के नॉर्थ चार्ल्सटन में एक श्वेत पुलिसकर्मी ने अश्वेत नागरिक वॉल्टर स्कॉट को गोली मार दी थी. 50 साल के स्कॉट के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी हुआ था और पुलिसवाले उसे गिरफ्तार करने पहुंचे थे, यहां हल्की कहासुनी के बाद पुलिसकर्मी माइकल थॉमस स्लेगर ने उसे गोली मार दी थी. माइकल की तस्वीरें सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई थीं, जिसमें वो स्कॉट को गोली मारता हुआ दिख रहा था. इसे रंगभेद से प्रेरित वारदात माना गया और स्लेगर पर हत्या का मुकदमा चला.

समानता की शपथ भूल जाती है पुलिस

अमेरिका के हर पुलिसकर्मी को हर नागरिक को समान नजरिए से देखने की शपथ दिलाई जाती है. रंगभेद जैसी वारदातों को पूरी तरह खत्म करना ट्रेनिंग का एक हिस्सा होता है लेकिन अमेरिका की पुलिस बार-बार ये सबक भूल जाती है. इस तरह के तमाम मामलों में अफ्रीकी-अमेरिकी नागरिकों को लेकर श्वेत पुलिसकर्मियों के नजरिए पर सवाल उठे लेकिन इन सवालों का जवाब आज तक नहीं मिल पाया है. हर बार पुलिस ने इसे खारिज किया बावजूद इसके ऐसी घटनाएं जारी रहीं.

अश्वेतों के साथ अमेरिका में भेदभाव पुरानी समस्या

अमेरिका में अश्वेतों के साथ भेदभाव का इतिहास सैकड़ों साल पुराना है. इसकी शुरूआत 1600 में हुई थी जो बाद में बद से बदतर होती गई. 1889 से 1922 के बीच अमेरिका में कुल 3436 अश्वेतों को लिंचिंग में मार डाला गया था. 1918 से 1921 के बीच अमेरिका में 28 अफ्रीका मूल के अमेरिकी नागरिकों को भीड़ ने जलाकर मार डाला था. समय के साथ ऐसी घटनाएं कम होती गईं लेकिन पूरी तरह रुक नहीं पाईं. देश के अलग-अलग हिस्सों में नफरत की वजह से होनेवाली ये हिंसा जारी रही.

रंगभेद के खिलाफ 1950 और 1960 के दशक में मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने विशाल आंदोलन चलाया. समानता की मांग को लेकर चलाए गए सिविल राइट्स मूवमेंट में लाखों लोग शामिल हुए. इसने अश्वेतों को जगाने का काम किया. ये आंदोलन महात्मा गांधी की अहिंसा की विचारधारा से प्रेरित था. इस अहिंसक आंदोलन का बड़ा प्रभाव पड़ा.अमेरिका में अफ्रीकी अमेरिकी नागरिकों के हालात पहले से बेहतर हुए . सबसे बड़ा असर अश्वेतों के अपने अधिकारों को लेकर जागरूक होने के रूप में सामने आया. 1964 में समानता के लिए चलाए गए इस आंदोलन के लिए मार्टिन लूथर को नोबेल शांति पुरस्कार भी मिला.

श्वेत कट्टरपंथी ने मार्टिन लूथर किंग जूनियर को मार डाला

4 अप्रैल 1968 को मार्टिन लूथर किंग जूनियर की हत्या कर दी गई. हत्यारे का नाम जेम्स अर्ल रे था. जेम्स white supremacy की सोच से प्रभावित था और अफ्रीकी अमेरिकी नागरिकों को बराबर के अधिकार देने के खिलाफ था. मार्टिन लूथर किंग जूनियर के आंदोलन को लेकर उसमें बेहद गुस्सा था. जेम्स को लगता था कि अगर अश्वेतों के साथ अमेरिका में बराबरी का सलूक होने लगा तो फिर श्वेतों की कथित श्रेष्ठता खतरे में पड़ जाएगी. जेम्स पर हत्या का मुकदमा चला और उसे 99 साल की कैद की सजा सुनाई गई. 1998 में जेल में ही उसकी मौत हो गई. भले ही जेम्स की मौत हो गई हो लेकिन उसकी सोच अमेरिका में आज भी जिंदा है.